{"_id":"67c821f7a32c7a4a19089947","slug":"us-reciprocal-tariff-india-president-donald-trump-pm-narendra-modi-trade-war-deficit-china-canada-explained-2025-03-05","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"क्या है जवाबी आयात शुल्क: ट्रंप ने अप्रैल से भारत पर लगाने की धमकी क्यों दी, इससे कितना होगा नुकसान? जानें","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
क्या है जवाबी आयात शुल्क: ट्रंप ने अप्रैल से भारत पर लगाने की धमकी क्यों दी, इससे कितना होगा नुकसान? जानें
Wed, 05 Mar 2025 04:24 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Wed, 05 Mar 2025 04:24 PM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
Please wait...
अमेरिका का टैरिफ युद्ध।
- फोटो :
अमर उजाला।
विस्तार
"भारत हमसे 100% ऑटो टैरिफ वसूलता है, चीन हमसे दोगुना टैरिफ वसूलता है, दक्षिण कोरिया चार गुना टैरिफ लगाता है। यह दोस्त और दुश्मन दोनों की तरफ से हो रहा है। यह प्रणाली अमेरिका के लिए उचित नहीं है, यह कभी नहीं थी।"अमेरिकी संसद के संयुक्त सत्र में अपने पहले संबोधन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को सीधे तौर पर न सिर्फ चेतावनी दी है, बल्कि 2 अप्रैल से हमारे उत्पादों पर जवाबी आयात शुल्क यानी रेसिप्रोकल टैरिफ यानी 'जैसे को तैसा टैरिफ' लगाने का एलान भी कर दिया। ट्रंप ने कहा, "अन्य देशों ने दशकों से हमारे खिलाफ टैरिफ का इस्तेमाल किया है। अब उन अन्य देशों के खिलाफ उनके हथियार का ही इस्तेमाल करने की हमारी बारी है। औसतन यूरोपीय संघ, चीन, ब्राजील, भारत और अनगिनत अन्य देश हमसे बहुत अधिक टैरिफ वसूलते हैं। उनकी तुलना में हम उनसे कम टैरिफ लेते हैं। यह बिल्कुल अनुचित है।
चौंकाने वाली बात यह है कि ट्रंप का यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे के बाद आया है। ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर यह जवाबी टैरिफ क्या हैं, जिन्हें डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर लगाने की धमकी दी है? भारत के खिलाफ लगाए गए इन टैरिफ की गणना कैसे होगी? भारत को अपना सहयोगी बताने वाले ट्रंप यह कदम उठा क्यों रहे हैं? इसके अलावा भारत पर इस कदम का क्या असर होगा? आइये जानते हैं...
पहले जानें- क्या होते हैं टैरिफ?
रेसिप्रोकल टैरिफ यानी परस्पर और जवाबी टैरिफ को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर टैरिफ, जिन्हें आयात शुल्क भी कहा जाता है, वह क्या होते हैं? आसान भाषा में समझें तो टैरिफ वह शुल्क होता है, जो कोई देश किसी अन्य देश से आयात होने वाले सामान पर लगाता है।
उदाहरण के तौर पर अगर कोई अमेरिकी नागरिक भारत में उत्पादकों से नागपुरी संतरे मंगाता है, तो उसे न सिर्फ उन संतरों का भुगतान करना होगा, बल्कि उसे एक अतिरिक्त शुल्क भी चुकाना पड़ेगा। यह शुल्क उस देश की सरकार लगाती है, जहां यह उत्पाद आयात किया जा रहा है। इसे ही आयात शुल्क कहा जाता है। अलग-अलग देशों की सरकारें अपने यहां आयात होने वाले सामानों पर अलग-अलग शुल्क लगाती हैं और अपने खजाने को भरती हैं।
कहते हैं कि प्यासा कुएं के पास जाता है, न कि कुआं प्यास बुझाने के लिए प्यासे के पास। यह कहावत दो देशों के बीच व्यापार में भी लागू होती है। मसलन अगर अमेरिकी नागरिकों को भारत के उत्पाद की जरूरत है तो वह इन चीजों का आयात भारत से करेंगे। इतना ही नहीं वे इन उत्पादों पर अपनी सरकार की तरफ से लगाए गए आयात शुल्क को भी चुकाएंगे, ताकि उत्पाद उनके पास पहुंच सके। यह मांग और आपूर्ति का नियम है।
रेसिप्रोकल टैरिफ यानी परस्पर और जवाबी टैरिफ को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर टैरिफ, जिन्हें आयात शुल्क भी कहा जाता है, वह क्या होते हैं? आसान भाषा में समझें तो टैरिफ वह शुल्क होता है, जो कोई देश किसी अन्य देश से आयात होने वाले सामान पर लगाता है।
उदाहरण के तौर पर अगर कोई अमेरिकी नागरिक भारत में उत्पादकों से नागपुरी संतरे मंगाता है, तो उसे न सिर्फ उन संतरों का भुगतान करना होगा, बल्कि उसे एक अतिरिक्त शुल्क भी चुकाना पड़ेगा। यह शुल्क उस देश की सरकार लगाती है, जहां यह उत्पाद आयात किया जा रहा है। इसे ही आयात शुल्क कहा जाता है। अलग-अलग देशों की सरकारें अपने यहां आयात होने वाले सामानों पर अलग-अलग शुल्क लगाती हैं और अपने खजाने को भरती हैं।
कहते हैं कि प्यासा कुएं के पास जाता है, न कि कुआं प्यास बुझाने के लिए प्यासे के पास। यह कहावत दो देशों के बीच व्यापार में भी लागू होती है। मसलन अगर अमेरिकी नागरिकों को भारत के उत्पाद की जरूरत है तो वह इन चीजों का आयात भारत से करेंगे। इतना ही नहीं वे इन उत्पादों पर अपनी सरकार की तरफ से लगाए गए आयात शुल्क को भी चुकाएंगे, ताकि उत्पाद उनके पास पहुंच सके। यह मांग और आपूर्ति का नियम है।
एक-दूसरे पर अलग-अलग दर से टैरिफ क्यों लगाते हैं देश?
दूसरे युद्ध के बाद से ही कई देशों ने अपने उत्पादों के आयात-निर्यात पर शुल्क न लगाने का फैसला किया था और उत्पादों पर टैरिफ न लगाकर व्यापार को अधिकतर मुफ्त रखा। यानी अगर कोई दो देश एक-दूसरे पर आयात शुल्क नहीं लगाते तो उनके नागरिकों को कोई उत्पाद एक-जैसी कीमत पर ही मिलेंगे। इसमें ज्यादा से ज्यादा उत्पाद को पहुंचाने का शुल्क (डिलीवरी फीस) ही जुड़ सकती है।
हालांकि, यह नियम अधिकतर विकसित देशों पर लागू होते हैं, क्योंकि इन देशों के पास पहले से ही मजबूत अर्थव्यवस्था और औद्योगिक क्षमताएं मौजूद रहीं। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) ने आपसी सहमति से यह निर्णय लिया कि चूंकि विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे बढ़ रही है और इनमें उद्योगों को भी विकसित करने की जरूरत है, इसलिए इन्हें आयात शुल्क लगाने की छूट दी जा सकती है।
दूसरे युद्ध के बाद से ही कई देशों ने अपने उत्पादों के आयात-निर्यात पर शुल्क न लगाने का फैसला किया था और उत्पादों पर टैरिफ न लगाकर व्यापार को अधिकतर मुफ्त रखा। यानी अगर कोई दो देश एक-दूसरे पर आयात शुल्क नहीं लगाते तो उनके नागरिकों को कोई उत्पाद एक-जैसी कीमत पर ही मिलेंगे। इसमें ज्यादा से ज्यादा उत्पाद को पहुंचाने का शुल्क (डिलीवरी फीस) ही जुड़ सकती है।
हालांकि, यह नियम अधिकतर विकसित देशों पर लागू होते हैं, क्योंकि इन देशों के पास पहले से ही मजबूत अर्थव्यवस्था और औद्योगिक क्षमताएं मौजूद रहीं। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) ने आपसी सहमति से यह निर्णय लिया कि चूंकि विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे बढ़ रही है और इनमें उद्योगों को भी विकसित करने की जरूरत है, इसलिए इन्हें आयात शुल्क लगाने की छूट दी जा सकती है।
भारत और अमेरिका के मामले में भी यही नियम लागू होता है। जहां अमेरिकी अर्थव्यवस्था 19वीं सदी में ही मजबूत हो चुकी थी, वहीं भारत की आर्थिक स्थिति 20वीं सदी के अंत में बेहतर होना शुरू हुई। इसलिए विकसित देश- अमेरिका के मुकाबले विकासशील देश- भारत को ज्यादा आयात शुल्क वसूलने की छूट दी जाती है। इसका एक कारण यह भी है कि इन शुल्कों के जरिए भारत और अन्य विकासशील देश अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकते हैं और अपना विदेशी मुद्रा भंडार भी भर सकते हैं।
अमेरिका का कोई व्यक्ति अगर भारत से कार मंगाता है तो 10 लाख कीमत वाली कार के लिए उसे आयात शुल्क के साथ करीब 12 लाख 50 हजार रुपये का भुगतान करना पड़ सकता है। दूसरी तरफ अगर भारत का कोई शख्स अमेरिकी कार खरीदता है तो उसे ज्यादा आयात शुल्क की वजह से 20 लाख रुपये चुकाने पड़ेंगे। यह कीमतें इन उत्पादों को पहुंचाने की कीमत (डिलीवरी फीस) को जोड़े बिना है।
अब तक इस तरह की व्यवस्था को डब्ल्यूटीओ ने मान्यता दी है। यह व्यवस्था काफी हद तक सही भी रही है। इसे कृषि क्षेत्र के उदाहरण से समझ सकते हैं।
- अमेरिका में बड़े स्तर पर कृषि उत्पाद पैदा होते हैं। वहीं, भारत एक कृषि प्रधान देश है। अगर अमेरिकी कृषि उत्पादों- गेहूं, धान, आदि पर भारत उच्च दरों पर आयात शुल्क लगाना बंद कर दे तो यह उत्पाद भारत में सस्ते हो जाएंगे। ऐसे में भारत के किसानों के उत्पादों की भारत में ही खरीद कम होने की आशंका रहेगी। इससे भारतीय किसानों का घाटा काफी ज्यादा हो सकता है।
- वहीं, अगर अमेरिका भारत से आने वाले कृषि उत्पादों पर निम्न स्तर के आयात शुल्कों को बढ़ा दे तो अमेरिका में भारतीय किसानों की उपज की कीमत भी ज्यादा हो जाएगी। ऐसे में वहां भारतीय उत्पादों की मांग घटने का खतरा पैदा हो जाएगा। इससे भारतीय किसानों को घाटा उठाना होगा और देश की अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
ट्रंप आखिर बराबरी के टैरिफ लगा क्यों रहे हैं?
चौंकाने वाली बात यह है कि डोनाल्ड ट्रंप के इस कदम की वजह सिर्फ और सिर्फ उनकी 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का प्रचार करना है। ट्रंप खुद कई मौकों पर कह चुके हैं कि दुनिया के कई देश ज्यादा आयात शुल्क वसूलते हैं, जिससे अमेरिका को घाटा होता है। इसलिए अमेरिकी सरकार उन देशों से ज्यादा टैरिफ वसूलेगा, जिससे अमेरिकी खजाने में बढ़ोतरी होगी। हालांकि, जैसा कि पहले ही कहा जा चुका- उत्पादों पर टैरिफ का शुल्क उस देश के नागरिकों-व्यापारियों को ही चुकाना पड़ता है, जहां की सरकार ने आयात शुल्क लागू किया है।
इतना ही नहीं एक व्यापारी होने की वजह से डोनाल्ड ट्रंप व्यापार घाटे (ट्रेड डेफिसिट) के खिलाफ रहे हैं। भारत और अमेरिका के बीच कारों के आयात-निर्यात का उदाहरण ले लें तो
चौंकाने वाली बात यह है कि डोनाल्ड ट्रंप के इस कदम की वजह सिर्फ और सिर्फ उनकी 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का प्रचार करना है। ट्रंप खुद कई मौकों पर कह चुके हैं कि दुनिया के कई देश ज्यादा आयात शुल्क वसूलते हैं, जिससे अमेरिका को घाटा होता है। इसलिए अमेरिकी सरकार उन देशों से ज्यादा टैरिफ वसूलेगा, जिससे अमेरिकी खजाने में बढ़ोतरी होगी। हालांकि, जैसा कि पहले ही कहा जा चुका- उत्पादों पर टैरिफ का शुल्क उस देश के नागरिकों-व्यापारियों को ही चुकाना पड़ता है, जहां की सरकार ने आयात शुल्क लागू किया है।
इतना ही नहीं एक व्यापारी होने की वजह से डोनाल्ड ट्रंप व्यापार घाटे (ट्रेड डेफिसिट) के खिलाफ रहे हैं। भारत और अमेरिका के बीच कारों के आयात-निर्यात का उदाहरण ले लें तो
- भारत से 10 लाख रुपये की एक कार को आयात करने के लिए अमेरिकी नागरिक को 12.5 लाख चुकाने पड़ते हैं। वहीं, अमेरिका में बनी इसी कीमत की कार को भारत में खरीदने के लिए 20 लाख देने पड़ते हैं।
- यानी भारत को ज्यादा आयात शुल्क की वजह से अमेरिका से आई कार पर 7.5 लाख रुपये का अतिरिक्त लाभ हुआ। भारत का यही लाभ अमेरिका के लिए व्यापार घाटा कहा जाता है।
तो क्या व्यापार घाटा बुरी चीज है?
दो देशों के बीच जब व्यापार होता है, तो किसी एक देश का व्यापार हमेशा दूसरे से ज्यादा होगा। इसकी वजह ज्यादा आयात या निर्यात हो सकता है।
सीधे शब्दों में अमेरिका ने भारत से ज्यादा उत्पादों और सेवाओं की खरीद की, जबकि भारत ने अमेरिका से कम उत्पाद-सेवाएं खरीदीं। इसके चलते अमेरिकी नागरिकों की मुद्रा ज्यादा खर्च हुई। वहीं भारतीय नागरिकों की मुद्रा का खर्च कम रहा।
दो देशों के बीच जब व्यापार होता है, तो किसी एक देश का व्यापार हमेशा दूसरे से ज्यादा होगा। इसकी वजह ज्यादा आयात या निर्यात हो सकता है।
सीधे शब्दों में अमेरिका ने भारत से ज्यादा उत्पादों और सेवाओं की खरीद की, जबकि भारत ने अमेरिका से कम उत्पाद-सेवाएं खरीदीं। इसके चलते अमेरिकी नागरिकों की मुद्रा ज्यादा खर्च हुई। वहीं भारतीय नागरिकों की मुद्रा का खर्च कम रहा।
भारत पर ट्रंप के फैसले का क्या असर होगा?
(i) अमेरिकी उत्पादों की कीमतों पर
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रेसिप्रोकल टैरिफ के फैसले को लेकर भारत में पहले से ही चिंताएं हैं।
- इसके चलते भारत ने अमेरिका से आयात होने वाले कई उत्पादों- मोटरबाइक, शराब व कुछ कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क घटाने का फैसला किया है।
- ट्रंप के संसद में किए गए एलान के मद्देनजर व्यापार युद्ध से बचने के लिए भारत अभी कुछ और अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ घटा सकता है।
- इतना ही नहीं भारत ने व्यापार में आ रहे अंतर को कम करने के लिए अमेरिका से रक्षा उत्पादों, तेल और गैस को ज्यादा खरीदने की बात कही है, ताकि दोनों देशों के आयात-निर्यात के अंतर को कम किया जा सके।
(ii) रुपये की कीमत पर
आने वाले समय में इसका असर यह होगा कि आयात शुल्क घटने के बाद भारत में अमेरिकी उत्पादों की कीमतें कम हो जाएंगी। हालांकि, इससे रुपया कमजोर होना शुरू हो जाएगा, क्योंकि उसकी मांग कम हो जाएगी। इसी तरह मांग बढ़ने की वजह से डॉलर और मजबूत होता जाएगा। (यहां पढ़ें व्यापार का मुद्रा पर असर)
(i) अमेरिकी उत्पादों की कीमतों पर
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रेसिप्रोकल टैरिफ के फैसले को लेकर भारत में पहले से ही चिंताएं हैं।
- इसके चलते भारत ने अमेरिका से आयात होने वाले कई उत्पादों- मोटरबाइक, शराब व कुछ कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क घटाने का फैसला किया है।
- ट्रंप के संसद में किए गए एलान के मद्देनजर व्यापार युद्ध से बचने के लिए भारत अभी कुछ और अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ घटा सकता है।
- इतना ही नहीं भारत ने व्यापार में आ रहे अंतर को कम करने के लिए अमेरिका से रक्षा उत्पादों, तेल और गैस को ज्यादा खरीदने की बात कही है, ताकि दोनों देशों के आयात-निर्यात के अंतर को कम किया जा सके।
(ii) रुपये की कीमत पर
आने वाले समय में इसका असर यह होगा कि आयात शुल्क घटने के बाद भारत में अमेरिकी उत्पादों की कीमतें कम हो जाएंगी। हालांकि, इससे रुपया कमजोर होना शुरू हो जाएगा, क्योंकि उसकी मांग कम हो जाएगी। इसी तरह मांग बढ़ने की वजह से डॉलर और मजबूत होता जाएगा। (यहां पढ़ें व्यापार का मुद्रा पर असर)
(iii). भारत की जीडीपी-अर्थव्यवस्था पर
भारत में हाल ही में पेश हुए बजट में केंद्र सरकार ने इनकम टैक्स स्लैब में बदलाव किए हैं और अब 12 लाख रुपये से कम कमाने वालों पर नई कर व्यवस्था के तहत आयकर नहीं लगेगा। केंद्र का यह फैसला मुख्यतः इसलिए आया था, ताकि भारतीयों के हाथ में पैसा बढ़ जाए और वह इस बचे हुए धन का इस्तेमाल घरेलू खर्चों में बढ़ा सकें। इससे भारत का सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) तेजी से बढ़ती।
भारत में हाल ही में पेश हुए बजट में केंद्र सरकार ने इनकम टैक्स स्लैब में बदलाव किए हैं और अब 12 लाख रुपये से कम कमाने वालों पर नई कर व्यवस्था के तहत आयकर नहीं लगेगा। केंद्र का यह फैसला मुख्यतः इसलिए आया था, ताकि भारतीयों के हाथ में पैसा बढ़ जाए और वह इस बचे हुए धन का इस्तेमाल घरेलू खर्चों में बढ़ा सकें। इससे भारत का सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) तेजी से बढ़ती।
- हालांकि, अगर अमेरिकी उत्पादों पर आयात शुल्क घटता है तो भारतीय आयकर के दायरे से बची हुई रकम को सस्ते होने वाले अमेरिकी उत्पादों पर खर्च कर सकते हैं।
- इससे भारतीयों का धन अमेरिकी व्यापारियों को फायदा पहुंचाएगा और अमेरिकी जीडीपी तेजी से बढ़ना शुरू हो जाएगी।
- वहीं, घरेलू उत्पादों की मांग कम होने से देश की जीडीपी पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
- इसका असर आत्मनिर्भर भारत कार्यक्रम पर भी पड़ सकता है, क्योंकि कम दर पर उपलब्ध होने की वजह से उपभोक्ता अमेरिकी उत्पादों में ज्यादा रुचि दिखा सकते हैं।