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ट्रंप को झटका: ट्रांसजेंडर सैनिकों पर प्रतिबंध को अदालत ने बताया अवैध, रक्षा नीति की नीयत पर उठे सवाल

Tue, 02 Jun 2026 12:55 AM IST
राकेश कुमार पीटीआई, वाशिंगटन।
पीटीआई, वाशिंगटन। Published by: राकेश कुमार Updated Tue, 02 Jun 2026 12:55 AM IST
सार

अमेरिकी कोर्ट ने ट्रांसजेंडर सैनिकों पर लगे प्रतिबंध को अवैध करार दिया है। अदालत ने साफ किया है कि अभी सेना में काम कर रहे ट्रांसजेंडर कर्मचारियों को पद से नहीं हटाया जाएगा। हालांकि, नए लोगों की भर्ती पर रोक जारी रहेगी और सरकार इस फैसले के खिलाफ दोबारा अपील कर सकती है।
 

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us court rules transgender military ban illegal Donald Trump
डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिकी राष्ट्रपति - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

अमेरिकी सेना को लेकर एक बहुत बड़ा फैसला आया है। अदालत ने ट्रंप प्रशासन की एक नीति को अवैध घोषित कर दिया है। इस नीति के तहत ट्रांसजेंडर सैनिकों के सेना में काम करने पर रोक लगाई गई थी। तीन जजों की एक पीठ ने सोमवार को यह बड़ा आदेश सुनाया। इस फैसले से सरकार को तगड़ा झटका लगा है।
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जिला अदालत के फैसले का समर्थन
यह नया फैसला मार्च 2025 के एक पुराने आदेश का समर्थन करता है। तब जिला न्यायाधीश एना रेयेस ने इस प्रतिबंध को गलत बताया था। उन्होंने कहा था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह आदेश संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ है। इसके बाद सरकार ने इस फैसले के खिलाफ अपील की थी। यह पूरी कानूनी लड़ाई छह सेवारत ट्रांसजेंडर सैनिकों और दो नए आवेदकों की याचिका से शुरू हुई थी।
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किसे मिलेगी राहत और किसे नहीं
अदालत ने अपने आदेश के दायरे को थोड़ा छोटा कर दिया है। राहत सिर्फ उन ट्रांसजेंडर सैनिकों को मिलेगी जो अभी सेना में अपनी सेवा दे रहे हैं। जो नए लोग सेना में भर्ती होना चाहते हैं, उन्हें अभी राहत नहीं मिली है। यह आदेश अभी तुरंत लागू नहीं होगा। सरकार को इस मामले में आगे अपील करने का समय दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल इस प्रतिबंध को लागू रखने की अनुमति दी थी।

नीति की नीयत पर उठे सवाल
राष्ट्रपति ट्रंप ने जनवरी 2025 में इस बैन से जुड़े आदेश पर दस्तखत किए थे। उनका कहना था कि ट्रांसजेंडर होना सेना के अनुशासन के खिलाफ है। इसके बाद रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने एक नई नीति बना दी। इसके तहत जेंडर डिस्फोरिया से पीड़ित लोगों को सेना के अयोग्य मान लिया गया। इस पर जज रॉबर्ट विल्किंस ने कहा कि यह नीति सिर्फ एक खास समूह को नुकसान पहुंचाने के लिए बनी दिखती है। वहीं दूसरे जज जस्टिन वाकर इससे सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि सेना से जुड़ा फैसला लेने का हक सिर्फ संसद और राष्ट्रपति को है।
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