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ट्रंप बनाम सुप्रीम कोर्ट: जन्मसिद्ध नागरिकता से टैरिफ तक, US राष्ट्रपति के किन फैसलों पर अदालत ने लगाई रोक?

Tue, 30 Jun 2026 09:46 PM IST
निर्मल कांत वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन।
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन। Published by: निर्मल कांत Updated Tue, 30 Jun 2026 09:46 PM IST
सार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को दूसरे कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट से लगातार कानूनी झटके मिलते दिख रहे हैं। जन्मसिद्ध नागरिकता से लेकर टैरिफ और अन्य बड़े फैसलों में अदालत ने कई अहम आदेशों पर रोक लगाई है। किन-किन मामलों में ट्रंप की नीतियां कोर्ट में टिक नहीं पाईं? पढ़िए रिपोर्ट-

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डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिकी राष्ट्रपति - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक

विस्तार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उनके दूसरे कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट से लगातार कानूनी झटके मिल रहे हैं। मंगलवार को अदालत ने जन्म के आधार पर नागरिकता (बर्थराइट सिटिजनशिप) सीमित करने से जुड़े उनके कार्यकारी आदेश को रद्द कर दिया। यह पहली बार नहीं है, जब सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के किसी अहम फैसले पर रोक लगाई हो या उसे खारिज किया हो। इससे पहले भी कई अदालतें उनकी प्रमुख नीतियों और कार्यकारी आदेशों के खिलाफ फैसले दे चुकी हैं। आइए जानते हैं, सुप्रीम कोर्ट ने अब तक ट्रंप के किन-किन फैसलों को झटका लगा है। 
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टैरिफ आदेश रद्द हुआ
टैरिफ यानी विदेशों से आने वाले सामान पर लगाया जाने वाला आयात शुल्क के मामले में डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा था। 20 फरवरी 2026 को अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन की ओर से लगाए गए कई आयात शुल्कों (टैरिफ) पर फैसला सुनाते हुए कहा कि राष्ट्रपति को इस तरह व्यापक स्तर पर टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं है। ट्रंप ने एक पुराने कानून का सहारा लेकर कई देशों से आने वाले सामान पर भारी टैरिफ लगा दिया था। उनका कहना था कि इससे अमेरिका के हितों की रक्षा होगी और व्यापार घाटा कम होगा। लेकिन कोर्ट ने कहा कि कर और टैरिफ लगाने का अधिकार मुख्य रूप से संसद के पास है।राष्ट्रपति अपनी कार्यकारी शक्ति से इतना बड़ा आर्थिक फैसला अकेले नहीं ले सकते।

कोर्ट ने माना कि जिस कानून का इस्तेमाल ट्रंप ने किया था, उसमें राष्ट्रपति को इतने बड़े स्तर पर टैरिफ लगाने की साफ अनुमति नहीं दी गई थी। इस फैसले के बाद ट्रंप की व्यापार नीति को बड़ा कानूनी झटका लगा और उनकी ओर से लगाए गए कई टैरिफ की वैधता खत्म हो गई। हालांकि, कोर्ट ने यह नहीं कहा कि अमेरिका कभी भी टैरिफ नहीं लगा सकता, बल्कि यह कहा कि इसके लिए सही कानूनी अधिकार और संसद की मंजूरी जरूरी है।
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जन्मसिद्ध नागरिकता पर सरकारी आदेश रद्द
20 फरवरी 2025 को अमेरिका की संघीय अदालतों ने ट्रंप के उस कार्यकारी आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें उन्होंने अमेरिका में जन्म लेने वाले कुछ बच्चों को अपने आप अमेरिकी नागरिकता मिलने के अधिकार को खत्म करने की कोशिश की थी। ट्रंप के आदेश में कहा गया था कि अगर बच्चे के माता-पिता अमेरिकी नागरिक या स्थायी निवासी नहीं हैं, तो उसे जन्म के आधार पर नागरिकता नहीं मिलेगी। अदालतों ने कहा कि यह आदेश अमेरिका के संविधान के 14वें संशोधन से टकराता है, जिसके अनुसार अमेरिका में जन्म लेने वाले अधिकांश लोगों को नागरिकता का अधिकार मिलता है। 

बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने भी ट्रंप प्रशासन की इस कोशिश को सीमित कर दिया। फैसले में यह साफ किया गया कि राष्ट्रपति अकेले कार्यकारी आदेश के जरिये संविधान में दिए गए नागरिकता के अधिकार को खत्म नहीं कर सकते। इस फैसले से ट्रंप की आव्रजन नीति को बड़ा कानूनी झटका लगा।
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डीईआई विरोधी आदेश के हिस्सों पर रोक
विविधता, समानता और समावेशन (डीईआई) कार्यक्रमों पर रोक के मामले में भी ट्रंप प्रशासन को अदालत से झटका लगा। ट्रंप ने जनवरी 2025 में एक कार्यकारी आदेश जारी कर संघीय सरकार के भीतर चल रहे कई डीईआई कार्यक्रमों को खत्म करने और सरकारी संस्थानों में ऐसी नीतियों पर रोक लगाने का निर्देश दिया। इसके तहत सरकारी विभागों में विविधता से जुड़े प्रशिक्षण, योजनाओं और कुछ प्रकार की नीतियों को बंद करने की कोशिश की गई। इसके खिलाफ कई संगठनों और राज्यों ने अदालत का रुख किया। 

21 फरवरी 2025 को अमेरिका की संघीय अदालत ने ट्रंप के आदेश के कुछ हिस्सों पर अस्थायी रोक लगा दी। अदालत ने कहा कि सरकार कुछ कार्यक्रमों को खत्म करने के लिए अपने अधिकारों से आगे नहीं जा सकती और कुछ प्रावधान कानून के खिलाफ हो सकते हैं। अदालत के इस फैसले से ट्रंप प्रशासन को झटका लगा क्योंकि उसका आदेश तुरंत पूरी तरह लागू नहीं हो पाया। हालांकि, बाद में इस मामले में अलग-अलग अदालतों में कानूनी लड़ाई जारी रही और कुछ हिस्सों पर अलग-अलग फैसले आए।

चुनाव संबंधी आदेश के हिस्सों पर रोक
डाक मतपत्र मतदान और चुनाव संबंधी आदेश के मामले में भी ट्रंप प्रशासन को अदालत से झटका लगा। ट्रंप ने 2025 में एक कार्यकारी आदेश जारी कर डाक के जरिये मतदान (मेल-इन वोटिंग) और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े कुछ नियमों में बदलाव करने की कोशिश की। इस आदेश के जरिये संघीय स्तर से चुनावों पर ज्यादा नियंत्रण और कुछ मतदाताओं की पहचान संबंधी शर्तें बढ़ाने की कोशिश की गई। इसके खिलाफ कई राज्यों और संगठनों ने अदालत में चुनौती दी। 31 मार्च 2025 को अमेरिका की संघीय अदालत ने ट्रंप के आदेश के कुछ हिस्सों पर रोक लगाते हुए कहा कि राष्ट्रपति के पास अकेले कार्यकारी आदेश के जरिए राज्यों की चुनाव प्रक्रिया में इतना बड़ा बदलाव करने का अधिकार नहीं है। 

अदालत ने माना कि अमेरिका के संविधान के अनुसार चुनावों के संचालन में राज्यों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है और ऐसे बदलावों के लिए उचित कानूनी प्रक्रिया जरूरी है। इस फैसले से ट्रंप प्रशासन की चुनाव नीति को झटका लगा और यह साफ हुआ कि राष्ट्रपति अपनी कार्यकारी शक्ति से चुनाव व्यवस्था में मनमाने बदलाव नहीं कर सकते।

इलिनॉय/शिकागो में नेशनल गार्ड की तैनाती पर रोक
इलिनॉय और शिकागो में नेशनल गार्ड की तैनाती रोकने के मामले में भी अदालत का फैसला ट्रंप प्रशासन के खिलाफ गया। ट्रंप प्रशासन ने आव्रजन कार्रवाई और संघीय अधिकारियों की सुरक्षा के नाम पर शिकागो क्षेत्र में नेशनल गार्ड भेजने का फैसला किया था। इसके खिलाफ इलिनॉय राज्य और शिकागो शहर ने अदालत में चुनौती दी और कहा कि राष्ट्रपति राज्य की अनुमति के बिना इस तरह सैन्य बल तैनात नहीं कर सकते। 

9 अक्तूबर 2025 को अमेरिका की संघीय अदालत ने ट्रंप प्रशासन के नेशनल गार्ड तैनाती आदेश पर अस्थायी रोक लगा दी। अदालत ने कहा कि सरकार यह साबित नहीं कर पाई कि ऐसी स्थिति थी जिसके आधार पर राष्ट्रपति इतनी बड़ी सैन्य तैनाती कर सकें। इस फैसले से ट्रंप प्रशासन की योजना पर रोक लग गई और यह स्पष्ट हुआ कि राष्ट्रपति की शक्तियां भी संविधान और कानून की सीमाओं के भीतर हैं।

निर्वासन मामलों में कार्रवाई पर रोक लगी
एलियन एनिमीज एक्ट (1798) के तहत कुछ निर्वासन मामलों में अदालत ने ट्रंप प्रशासन की कार्रवाई पर रोक लगाई और उचित कानूनी प्रक्रिया (ड्यू प्रोसेस) का पालन जरूरी बताया। ट्रंप प्रशासन ने 1798 के एलियन एनिमीज एक्ट नाम के पुराने कानून का इस्तेमाल करते हुए कुछ विदेशी नागरिकों को तेजी से देश से बाहर भेजने की कोशिश की। सरकार का तर्क था कि यह कानून राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे की स्थिति में विदेशी नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति देता है। इसके खिलाफ प्रभावित लोगों और संगठनों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और कहा कि बिना सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया के किसी को निर्वासित नहीं किया जा सकता। 

अप्रैल 2025 में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में आदेश देते हुए कहा कि सरकार एलियन एनिमीज एक्ट के तहत किसी को देश से बाहर भेजने से पहले उन्हें अदालत में अपनी बात रखने का उचित अवसर दे। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति के पास आपातकालीन शक्तियां हो सकती हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल संविधान में दिए गए अधिकारों को नजरअंदाज करके नहीं किया जा सकता।  

ये भी पढ़ें:  ट्रंप को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका: जन्म के आधार पर नागरिकता रोकने वाला आदेश रद्द; क्या है 14वां संशोधन?

फेडरल रिजर्व गवर्नर मामला
फेडरल रिजर्व की गवर्नर लीसा कुक को हटाने के मामले में अदालत ने ट्रंप प्रशासन की कार्रवाई पर रोक लगा दी। ट्रंप ने अगस्त 2025 में अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की गवर्नर लीसा कुक को हटाने की कोशिश की थी। ट्रंप प्रशासन ने उन पर घर के कर्ज से जुड़ी गड़बड़ी के आरोप लगाए थे। हालांकि कुक ने इन आरोपों से इनकार किया। कुक ने अदालत में कहा कि उन्हें बिना उचित सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया के पद से हटाया जा रहा है। 9 सितंबर 2025 को अमेरिका की संघीय अदालत ने ट्रंप के फैसले पर अस्थायी रोक लगाते हुए लीसा कुक को पद पर बने रहने की अनुमति दी। अदालत ने कहा कि फेडरल रिजर्व की स्वतंत्रता अहम है और राष्ट्रपति किसी गवर्नर को बिना उचित कारण और प्रक्रिया के नहीं हटा सकते।

बाद में मामला आगे बढ़ा और 29 जून 2026 को अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने भी ट्रंप की तत्काल हटाने की कोशिश पर रोक लगा दी। कोर्ट ने कहा कि फेडरल रिजर्व के अधिकारियों को हटाने से पहले उन्हें आरोपों का जवाब देने और अपनी बात रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए। इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ कि राष्ट्रपति की शक्ति भी स्वतंत्र संस्थाओं के मामले में कानून की सीमाओं के अधीन है।
 
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