श्रीलंका संकट : राष्ट्रपति सिरिसेना के संसद भंग करने के फैसले पर सुनवाई शुरू
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श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना के संसद भंग करने के फैसले के खिलाफ मंगलवार को देश के उच्चतम न्यायालय में सुनवाई शुरू हो गई। सिरिसेना ने संसद भंग कर प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री पद से हटाने के बाद तुरंत चुनाव कराने का आह्वान किया था, जिससे देश में बड़ा संवैधानिक संकट पैदा हो गया।
सिरिसेना द्वारा 26 अक्टूबर को विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री पद से हटाए जाने और पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री बनाए जाने के बाद से ही श्रीलंका में राजनीतिक संकट बना हुआ है।
बाद में सिरिसेना ने संसद का कार्यकाल खत्म होने के 20 महीने पहले ही उसे भंग कर दिया और तुरंत चुनाव कराने का आदेश दिया। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने संसद भंग करने के सिरिसेना के फैसले को पलट दिया और तुरंत चुनाव कराने की तैयारियों पर रोक लगा दी थी।
सात सदस्यीय पीठ कर रही है सुनवाई
शीर्ष अदालत ने मंगलवार सुबह सिरिसेना के संसद भंग करने की राजपत्रित अधिसूचना के खिलाफ दायर मौलिक अधिकार याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की। अदालत के अधिकारियों ने बताया कि प्रधान न्यायाधीश नलिन पेरेरा की अध्यक्षता में सात सदस्यीय पीठ ने सुनवाई शुरू कर दी।
अदालत ने 13 नवंबर को एक राजपत्रित अधिसूचना को रद्द करते हुए अंतरिम आदेश जारी किया था जिससे सिरिसेना का संसद भंग करने का आदेश अस्थायी रूप से अवैध हो गया। मामले में गुरुवार तक सुनवाई चलेगी। सोमवार को अदालत ने राजपक्षे को बतौर प्रधानमंत्री कामकाज करने से रोक दिया था।
कोर्ट फैसले के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय पहुंचे राजपक्षे
श्रीलंकाई नेता और राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना द्वारा नवनियुक्त पीएम महिंदा राजपक्षे ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है। निचली अदालत ने विवादित सरकार के खिलाफ 122 सांसदों की याचिका पर सोमवार को सुनवाई करते हुए राजपक्षे और उनकी कैबिनेट को उनके पद पर काम करने से रोक दिया है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख 12 और 13 दिसम्बर तय की है।
सांसद गामिनी लोकजी ने राजपक्षे के सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने की पुष्टि की है। राजपक्षे ने कहा था कि वे ‘अपीलीय अदालत द्वारा जारी उस अंतरिम आदेश से सहमत नहीं हैं जिसमें कैबिनेट को निलंबित कर दिया गया है।’ उन्होंने कहा कि संविधान की व्याख्या करने की शक्ति उच्चतम न्यायालय के पास है।