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Russia Ukraine War: इतने प्रतिबंधों के बाद भी युद्ध तेज करने का फैसला कैसे कर लिया पुतिन ने?

Thu, 22 Sep 2022 05:30 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, मास्को
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, मास्को Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 22 Sep 2022 05:30 PM IST
सार

Russia Ukraine War: पिछले दिनों खारकीव इलाके में यूक्रेन के जबरदस्त जवाबी हमले के कारण रूसी सेनाओं को पीछे हटना पड़ा था। अब उसी के जवाब में रूसी राष्ट्रपति ने ‘सैनिकों की आंशिक गोलबंदी’ करने का एलान किया है। इससे यह संदेश गया है कि युद्ध जारी रखने की रूस की आर्थिक क्षमता बरकरार है...

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Russia Ukraine War: russia wants to show sanctions imposed by Western countries have been ineffective
Russia Ukraine War: Vladimir Putin - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

यूक्रेन में सैनिकों की नई कुमक भेजने के रूस के फैसले के पीछे एक बड़ा कारण इस बात को माना जा रहा है कि पश्चिमी देशों की तरफ से रूस पर लगाए गए ज्यादातर प्रतिबंध बेअसर रहे हैं। उलटे इन प्रतिबंधों के कारण खास कर यूरोप में ऊर्जा का अभूतपूर्व संकट खड़ा हो गया है। साथ ही इनकी वजह से यूरोप और अमेरिका समेत सारी दुनिया में महंगाई तेजी से बढ़ी है।

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बीते फरवरी में यूक्रेन के खिलाफ रूस के विशेष सैनिक कार्रवाई शुरू होने के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस पर कई तरह के सख्त प्रतिबंध लगाए। उन्होंने तब कहा था कि इन प्रतिबंधों के कारण रूस की युद्ध जारी रखने की क्षमता खत्म हो जाएगी। तब पश्चिमी मीडिया में ये चर्चा आम थी कि अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने के बाद रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सैनिक कार्रवाई के लिए संसाधन जुटाने में असमर्थ हो जाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

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पिछले दिनों खारकीव इलाके में यूक्रेन के जबरदस्त जवाबी हमले के कारण रूसी सेनाओं को पीछे हटना पड़ा था। अब उसी के जवाब में रूसी राष्ट्रपति ने ‘सैनिकों की आंशिक गोलबंदी’ करने का एलान किया है। इससे यह संदेश गया है कि युद्ध जारी रखने की रूस की आर्थिक क्षमता बरकरार है। इसी महीने व्लादीवोस्तोक में हुए ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम को संबोधित करते हुए पुतिन ने दावा किया था कि ‘पश्चिम के आर्थिक आक्रामण’ का सामना करने में उनका देश कामयाब रहा है। उन्होंने कहा था के उलटे इन प्रतिबंधों के कारण यूरोप में लोगों का जीवन स्तर घट रहा है और गरीब देशों में खाद्य संकट पैदा हो गया है।

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जबकि यूरोपियन कमीशन की प्रमुख उरसुला वॉन डेर लियेन ने पिछले हफ्ते दावा किया था कि प्रतिबंध प्रभावी रहे हैं और इनके कारण रूस का वित्तीय क्षेत्र मरणासन्न होकर लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर पहुंच गया है। स्ट्रॉसबर्ग में दिए अपने भाषण में उन्होंने कहा कि रूस पर इस किस्म के प्रतिबंध लगाए गए हैं, जैसा मानव समाज ने इसके पहले कभी नहीं देखा या सुना था।

लेकिन विश्लेषकों के मुताबिक जो आंकड़े मौजूद हैं, वे वॉन डेर लियेन के दावों की पुष्टि नहीं करते। ऑस्ट्रेलियाई यूनिवर्सिटी यूएनएसडब्लू में एसोसिएट प्रोफेसर क्रिस्टोफर माइकलसन ने वेबसाइट द कन्वर्सेशन में प्रकाशित एक विश्लेषण में लिखा है कि रूसी जीडीपी की वृद्धि दर और मुद्रास्फीति आदि के बारे में जो आंकड़े उपलब्ध हैं, उनसे प्रतिबंधों का असर साबित कर पाना मुश्किल मालूम पड़ता है।

रूस के प्रथम उप प्रधानमंत्री आंद्रेई बेलोसोव ने कहा है कि इस वर्ष रूस में मद्रास्फीति की दर अधिक 12-13 फीसदी रहेगी। यानी यह उस तरह बेकाबू नहीं हुई है, जिससे संकेत मिले कि प्रतिबंधों का मारक असर हुआ है। रूस के विमानन उद्योग और कारों की बिक्री जरूर प्रभावित हुई है, लेकिन मोटे तौर पर अर्थव्यवस्था की गति बनी हुई है। उधर तेल और गैस की कीमतों में भारी बढ़ोतरी से रूस की अधिक आमदनी हुई है। इसलिए रूस सरकार का खजाना भरा हुआ है।

विश्लेषकों ने कहा है कि पुतिन युद्ध को लंबा खींचने की रणनीति पर चल रहे हैं। उनकी गणना यह है कि इससे प्रतिबंधों का यूरोप पर हो रहे गंभीर प्रभाव से वहां सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल मचेगी। तब पश्चिमी देश बातचीत से यूक्रेन मसले का हल निकालने पर मजबूर हो जाएंगे।

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