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फलस्तीन शरणार्थियों को भारत की मदद, यूएन सहायता एजेंसी को देगा 50 लाख डॉलर
Tue, 02 Jul 2019 02:43 PM IST
Priyesh Mishra
वर्ल्ड डेस्क, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, वाशिंगटन
Published by: Priyesh Mishra
Updated Tue, 02 Jul 2019 02:43 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : सोशल मीडिया
भारत ने संयुक्त राष्ट्र फलस्तीन शरणार्थी एजेंसी को 2019 में 50 लाख डॉलर देने का वादा किया है। यह एजेंसी पश्चिम एशिया में फलस्तीनी शरणार्थियों की मदद करती है। भारत ने एजेंसी की वित्तीय स्थिति पर चिंता जताई और एजेंसी के कार्यों के लिए राजकोषीय समर्थन सुनिश्चित करने का आह्वान किया है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के उप स्थायी प्रतिनिधि के. नागराज नायडू ने कहा कि भारत सरकार ने यूएनआरडब्ल्यूए के बजट में अपने वार्षिक वित्तीय योगदान को चार गुना बढ़ा दिया है। 2016 में 12.5 लाख डॉलर से बढ़ाकर 2018 में 50 लाख डॉलर किया गया है।
नायडू ने कहा कि हमने 2019 में 50 लाख डॉलर का योगदान करने का वादा किया है। यह 2018 के योगदान के बराबर ही है। वह पश्चिम एशिया में फलस्तीन शरणार्थियों के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र राहत एवं कार्य एजेंसी (यूएनआरडब्ल्यूए) के स्वैच्छिक योगदान के लिए आयोजित महासभा एड हॉक कमेटी की बैठक में पिछले सप्ताह बोल रहे थे।
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नायडू ने जोर दिया कि एजेंसी के ज्यादातर संसाधन स्वैच्छिक योगदान से आते हैं। इनका दायरा बहुत ही सीमित है। यह व्यवस्था अनिश्चितताओं से भरी है और वर्तमान की तरह कभी भी अचानक संकट पैदा कर सकती है।
नायडू ने जोर दिया कि एजेंसी की वित्तीय स्थिति चिंता का विषय है और इसने शरणार्थियों को एजेंसी की तरफ से मिलने वाली मदद को जोखिम में डाल दिया है। यह मदद शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी है। भारत ने सभी पारंपरिक देशों से अपने वित्तीय योगदान को बढ़ाने को विचार करने का आग्रह किया है।
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संयुक्त राष्ट्र में भारत के उप स्थायी प्रतिनिधि के. नागराज नायडू ने कहा कि भारत सरकार ने यूएनआरडब्ल्यूए के बजट में अपने वार्षिक वित्तीय योगदान को चार गुना बढ़ा दिया है। 2016 में 12.5 लाख डॉलर से बढ़ाकर 2018 में 50 लाख डॉलर किया गया है।
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नायडू ने कहा कि हमने 2019 में 50 लाख डॉलर का योगदान करने का वादा किया है। यह 2018 के योगदान के बराबर ही है। वह पश्चिम एशिया में फलस्तीन शरणार्थियों के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र राहत एवं कार्य एजेंसी (यूएनआरडब्ल्यूए) के स्वैच्छिक योगदान के लिए आयोजित महासभा एड हॉक कमेटी की बैठक में पिछले सप्ताह बोल रहे थे।
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नायडू ने जोर दिया कि एजेंसी के ज्यादातर संसाधन स्वैच्छिक योगदान से आते हैं। इनका दायरा बहुत ही सीमित है। यह व्यवस्था अनिश्चितताओं से भरी है और वर्तमान की तरह कभी भी अचानक संकट पैदा कर सकती है।
नायडू ने जोर दिया कि एजेंसी की वित्तीय स्थिति चिंता का विषय है और इसने शरणार्थियों को एजेंसी की तरफ से मिलने वाली मदद को जोखिम में डाल दिया है। यह मदद शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी है। भारत ने सभी पारंपरिक देशों से अपने वित्तीय योगदान को बढ़ाने को विचार करने का आग्रह किया है।