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तालिबान की चीन से दोस्ती: दहशत में जी रहे हैं अफगानिस्तान में मौजूद उइगर मुसलमान

Mon, 06 Sep 2021 05:12 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 06 Sep 2021 05:12 PM IST
सार

उइगर मुसलमानों के दमन पर किताब लिखने वाले अमेरिका के जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सीन रॉबर्ट्स के मुताबिक अफगानिस्तान में लगभग तीन हजार उइगर मुसलमान हैं। उनमें से कई के पूर्वज तो 1949 में उस समय ही भाग कर यहां आ गए थे, जब कम्युनिस्ट पार्टी ने चीन में अपनी सत्ता कायम की। बाकी कई परिवार 1970 के दशक में यहां आए। इनमें से कई उइगर मुसलमों के पास अब अफगान नागरिकता है। लेकिन कुछ परिवारों का दर्जा अभी भी चीनी शरणार्थी का है...

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fear among Uyghurs Muslims in afghanistan that the Taliban government may forcibly deport them back to China
उइगर मुस्लिम - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

अफगानिस्तान में रहने वाले उइगर मुसलानों में भय समा गया है। ऐसा तालिबान के चीन के प्रति दोस्ताना रुख के कारण हुआ है। इन मुसलमानों में ये डर समया हुआ है कि तालिबान सरकार चीन को खुश करने के लिए उन्हें जबरन वापस चीन भेज सकती है। जबकि इनमें से कई मुसलमानों का कहना है कि वे सरकारी दमन से बचने के लिए चीन के शिनजियांग प्रांत से भाग कर अफगानिस्तान आए थे।

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अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन ने एक महिला तुहान (असली नाम नहीं) की कहानी दिखाई है। तुहान का परिवार 45 साल पहले दमन से बचने के लिए अफगानिस्तान आ गया था। तुहान ने सीएनएन से कहा कि तालिबान चीन का समर्थन पाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है। ऐसे में उनका परिवार डरा हुआ है कि कहीं उन्हें वापस शिनजियांग न भेज दिया जाए। सीएनएन के मुताबिक चीन से अफगानिस्तान आए ज्यादातर लोगों की सोच अभी तुहान जैसी ही है।
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सीएनएन के मुताबिक इन लोगों ने उससे बातचीत में कहा कि उन लोगों को शिनजियांग प्रांत में जबरन कम्युनिस्ट बनाने की कोशिश की गई, उनसे जबरन मजदूरी कराई गई और यातना भी दी गई। चीन ऐसे आरोपों का खंडन करता रहा है। चीन का कहना है कि वह शिनजियांग से इस्लामी चरमपंथ और आतंकवाद को मिटाने में लगा हुआ है।
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उधर तुहान का कहना है कि वे सात साल की उम्र में अपने परिवार के साथ यहां आ गई थीं। ये पूरा समय दिक्कतों में गुजरा। फिर भी उनके परिवार को डर है कि अगर उन्हें शिनजियांग भेजा गया, तो उनकी जान को खतरा हो सकता है।

उइगर मुसलमानों के दमन पर किताब लिखने वाले अमेरिका के जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सीन रॉबर्ट्स के मुताबिक अफगानिस्तान में लगभग तीन हजार उइगर मुसलमान हैं। उनमें से कई के पूर्वज तो 1949 में उस समय ही भाग कर यहां आ गए थे, जब कम्युनिस्ट पार्टी ने चीन में अपनी सत्ता कायम की। बाकी कई परिवार 1970 के दशक में यहां आए। इनमें से कई उइगर मुसलमों के पास अब अफगान नागरिकता है। लेकिन कुछ परिवारों का दर्जा अभी भी चीनी शरणार्थी का है।

जानकारों का कहना है कि उइगर मुसलमानों के भयभीत होने की वजहें हैं। उनमें सबसे ज्यादा डर तब पैदा हुआ, जब पिछले जुलाई में तालिबान नेताओं के एक दल ने चीन की यात्रा की। वहां तालिबान और चीन दोनों ने एक दूसरे की तारीफ की। तालिबान ने चीन को अपना ‘अच्छा दोस्त’ बताया और कहा कि वह अपनी जमीन का कभी भी चीन के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होने देगा। पिछले हफ्ते तालिबान के प्रवक्ता जबिहुल्लाह मुजाहिद ने चीन के टीवी चैनल सीजीटीएन को दिए इंटरव्यू में कहा- ‘चीन हमारे पड़ोस में एक महत्वपूर्ण और मजबूत देश है। चीन के साथ हमारे सकारात्मक और अच्छे संबंध रहे हैं। अब हम इन संबंधों को और मजबूत करना चाहते हैं और आपसी विश्वास के स्तर में बढ़ोतरी करना चाहते हैं।’

इन बातों को उइगर मुसलमानों ने अपने खतरे का संकेत माना है। सीन रॉबर्ट्स ने कहा- ‘ऐसे बहुत सी वजहें हैं, जिनके कारण तालिबान चीन की शर्तों को मानते हुए उससे संबंध गहरा करने की कोशिश करेगा। खासकर उस समय उसके सामने ऐसा करने की मजबूरी भी है, जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उसकी वित्तीय सहायता रोक दी है।’

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