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मुश्किल में चीन: यूरोप ने भी दिखाए तेवर, राष्ट्रपति जिनपिंग को अब नहीं मिलेगा समर्थन

Sun, 20 Sep 2020 07:09 AM IST
Kuldeep Singh वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, न्यूयॉर्क
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, न्यूयॉर्क Published by: Kuldeep Singh Updated Sun, 20 Sep 2020 07:09 AM IST
सार

  •   -62 फीसदी यूरोपीय लोगों के दिमाग में चीन की छवि बुरी
  •  - यूरोपीय नेताओं से बैठक में जिनपिंग को नहीं मिला ज्यादा भाव
  •   -चीनी विदेश मंत्री को यूरोप दौरे पर झेलनी पड़ा जनाक्रोश
  •   -कोरोना के बाद यूरोप से उम्मीद लगाए चीन को झटका
  •   -विशेषज्ञों ने कहा, यूरोप का बदलता रुख जिनपिंग के लिए कड़ी चुनौती

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Europe also shows attitude now against Chinese President Xi Jinping will not longer get support
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

विस्तार

अमेरिका और भारत से बिगड़ते संबंधों के बीच चीन की यूरोप को साधने की कोशिशें अब नाकाम होती दिख रही हैं। पिछले हफ्ते पांच यूरोपीय देशों के दौरे पर गए न सिर्फ  चीनी विदेश मंत्री वांग यी को जनाक्रोश का सामना करना पड़ा बल्कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग की यूरोपीय राष्ट्राध्यक्षों से ऑनलाइन मुलाकात भी फीकी ही रही। विशेषज्ञों का कहना है कि पहले निवेश साझेदारी को लेकर जिनपिंग को काफी ‘फेवर’ मिल रहा था लेकिन अब उनकी नीतियों और मानवाधिकार उल्लंघन के खिलाफ यूरोप के कमोबेश हरेक देश में बड़ा रोष है।

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वहां के लोग, नेता और बुद्धिजीवी तबका न सिर्फ हांगकांग और ताइवान का खुलकर समर्थन कर रहा है बल्कि चीनी नेताओं की जमकर आलोचना भी की जा रही है। ऐसे में अमेरिका से तल्ख रिश्तों के बाद यूरोप के साथ साझेदारी बढ़ाकर अर्थव्यवस्था सुधारने का जिनपिंग का सपना चकनाचूर हो सकता है।
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खुद लताड़ का शिकार चीनी विदेश मंत्री
इस माह ताइवान दौरे पर गए चेक गणराज्य के एक नेता को फटकार लगाने के बाद जब चीनी विदेश मंत्री वांग यी यूरोप पहुंचे तो खुद लोगों की लताड़ के शिकार हो गए। यूरोप निवासियों ने उनके लिए भद्दी भाषा तक लिख डाली। इससे पता लगता है कि चीन के यूरोप के साथ रिश्तों में कितनी गिरावट आ चुकी है। पराग्वे के जिला मेयर पावेल नोवोत्नी ने यी के लिए लिखा कि आपको शर्म आनी चाहिए। नोवोत्नी ने चीनियों को विचारहीन और जोकर तक करार दे दिया। साथ ही उन्हें दुनिया से माफी मांगने की भी नसीहत दी।
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टूटेगी जिनपिंग की महत्वाकांक्षा
विश्लेषक कहते हैं कि यूरोप का बदलता रुख जिनपिंग के लिए कड़ी चुनौती साबित हो सकता है। इससे लघु अवधि में उनकी अर्थव्यवस्था को उबारने की जुगत कमजोर पड़ सकती है क्योंकि अमेरिका यूरोप को चीन में निवेश न करने के लिए पाबंद कर रहा है। वहीं, दीर्घावधि में दुनिया में व्यापार और प्रशासन क्षेत्र में अमेरिका का विकल्प बनने की जिनपिंग की महत्वाकांक्षा भी टूट सकती है।

घटिया मास्क कूटनीति से लेकर अधिनायकवाद निशाने पर
जानकारों के मुताबिक, यूरोप में कोरोना के बाद चीन के खिलाफ लोगों का गुबार फूटने लगा है। पहले, चीन की महामारी रोकने में विफलता और फिर घटिया मास्क कूटनीति उलटी पड़ गई है। खासतौर पर नीदरलैंड और स्पेन जैसे देशों को दोयम दर्जे के मास्क और सुरक्षा उपकरण बेचने के बाद तो वहां सरकार और लोगों की भावनाएं भड़की हुई हैं। इस वक्त यूरोप में यह भाव जौर पकड़ने लगा है कि चीन का अधिनायकवाद यूरोप के राजनीतिक मूल्यों से मेल नहीं खा सकता। यही वजह है कि यूरोप में कई देश हांगकांग में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू करने के बाद चीन के खिलाफ काफी मुखर हो रहे हैं।  

दोगलेपन पर उठने लगे सवाल
विदेश संबंधों की यूरोपीय परिषद में एशिया कार्यक्रम की निदेशक जांका ओएरतेल का कहना है कि एक ओर चीन सहयोग, शांति और सौहार्दपूर्ण समाज के संदेश दे रहा है वहीं हांगकांग की सड़कों पर स्कूली छात्राओं को उसकी पुलिस जमकर पीट रही है। यह दोगलापन साथ-साथ नहीं चल सकता। गौरतलब है कि जिनपिंग ने सोमवार को यूरोपीय नेताओं से हुई बैठक में सहयोगात्मक रणनीतिक साझेदारी का मंत्र दिया था।

सफल नहीं जिनपिंग की बैठक, मतभेद हुए उजागर
जिनपिंग की यूरोपीय राष्ट्राध्यक्षों से हुई ताजा बैठक को सफल नहीं माना जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि पहले दोनों पक्षों के बीच घनिष्ठ आर्थिक संबंध पनप रहे थे लेकिन मौजूदा सूरतेहाल में निवेश के मोर्चे पर कोई खास तरक्की नहीं हुई है। उलटे पिछले कुछ समय में यूरोप और चीन के बीच मतभेद ज्यादा उजागर हुए है। अमेरिका से तल्खी और कोरोना काल में यूरोप ने जिनपिंग को मिल रहा फेवर अब खटाई में पड़ता दिख रहा है। जिनपिंग की इस बैठक के बाद यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष चाल्र्स माइकल ने खुलकर कहा कि चीन और यूरोप में वास्तविक मतभेद से कोई इनकार नहीं है और हम इन्हें ढंक नहीं सकते।

केवल सात फीसदी ने जताया चीन पर भरोसा
विदेश संबधों पर यूरोपीय परिषद के करीब डेढ़ हफ्ते पहले प्रकाशित एक सर्व के मुताबिक, केवल सात फीसदी यूरोप निवासी ही मानते हैं कि चीन कोरोना महामारी से लड़ाई में उपयोगी साझेदार है। वहीं, 62 फीसदी लोगों के दिमाग में चीन की बुरी छवि है।

अहम मुद्दों पर बढ़ती आलोचना
यूरोप ने पिछले कुछ समय में चीन पर जलवायु परिवर्तन से लेकर हांगकांग और तिब्बत में अत्याचार का आरोप लगाया है। वहीं, स्वीडिश पुस्तक विक्रेता को जेल में डालने, दो कनाडाई लोगों की गिरफ्तारी और दक्षिण चीन सागर में उसकी मनमानी पर आलोचना भी की है। 


ड्रैगन के खिलाफ लामबंद होता यूरोप
फ्रांस और स्लोवनिया ने अमेरिका की तर्ज पर हुवावे के निवेश पर पाबंदी लगा दी है। वहीं, इटली की संसद ने हांगकांग प्रदर्शनकारियों के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया है। यूरोप में चीन के साथ सबसे ज्यादा व्यापार करने वाले जर्मनी में भी अविश्वास बढ़ रहा है। खुद चांसलर एंगेला मर्केल ने जिनपिंग के साथ बैठक के बाद उन्हें संदेश देते हुए कहा कि यूरोप बहुपक्षीय सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है। बीजिंग में स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषक वु कियांग के मुताबिक, यूरोप से निकल रही मुखर आवाज ने तनाव को बढ़ा दिया है। कोरोना महामारी के बाद चीन के प्रति हर चीज बदल चुकी है।
 

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