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इस्राइल में सरकार पर संकट: क्या पीएम नेतन्याहू की सत्ता खतरे में? अति-रूढ़िवादी सैन्य कानून ने बढ़ाई परेशानी

Tue, 10 Jun 2025 11:35 AM IST
बशु जैन वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: बशु जैन Updated Tue, 10 Jun 2025 11:35 AM IST
सार

इस्राइल की बेंजामिन नेतन्याहू सरकार अति रूढ़वादी सैन्य कानून लागू करने जा रही है। इस कानून के तहत देश की सबसे सशक्त आबादी के लिए सैन्य सेवा अनिवार्य कर दी गई है। इस समुदाय को अब तक अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट थी। आइए जानते हैं इसका सरकार पर क्या असर पड़ने वाला है?

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Crisis on govt in Israel Is PM Netanyahu's power in danger? Ultra-conservative military law increases problems
बेंजमिन नेतन्याहू, इस्राइली पीएम - फोटो : ANI

विस्तार

हमास के साथ युद्ध के बीच इस्राइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू सरकार संकट में फंस गई है। अति-रूढ़िवादी सैन्य कानून लागू करने के चलते उनके गठबंधन के सहयोगियों ने सरकार का साथ छोड़ने का एलान किया है। इस्राइल में बुधवार को संसद भंग करने के लिए मतदान हुआ। विपक्ष का कहना है कि अगर गठबंधन के साझेदार सरकार से नाता तोड़ लेंगे तो संसद भंग हो जाएगी। अभी यह साफ नहीं है कि कौन-कौन सहयोगी सरकार का साथ देंगे।
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क्या है कानून
इस्राइल में अब तक यहूदी पुरुषों को लगभग तीन साल की सैन्य सेवा करनी होती है। इसके बाद कई साल रिजर्व ड्यूटी करनी होती है। वहीं यहूदी महिलाओं को दो वर्ष अनिवार्य सेवा करनी होती है। जबकि इस्राइल में राजनीतिक रूप से सशक्त अति-रूढ़िवादी समुदाय को इससे छूट थी। यह समुदाय धार्मिक कार्य संभालता है और इसके युवाओं को 26 साल की उम्र तक सरकार वजीफा देती है। अब इस्राइल की सरकार ने अति-रूढ़िवादी सैन्य कानून के तहत इस समुदाय के लोगों को भी सेना में काम करना अनिवार्य कर दिया। इस्राइल की सुप्रीम कोर्ट ने भी 2017 में अति रूढ़िवादी को सैन्य सेवा से मिलने वाली छूट को अवैध करार दिया था। 
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इसलिए लागू किया जा रहा कानून
सैन्य सेवा में अति रूढ़िवादियों को शामिल करने का फैसला इसलिए लिया गया है क्योंकि हमास के हमले के बाद से सैनिकों की बड़ी जरूरत महसूस हुई है। इस्राइल ने 360,000 रिजर्व सैनिकों को सक्रिय किया है। हालात यह हैं कि कई रिजर्व सैनिकों ने गाजा में सैकड़ों दिनों की कई बार ड्यूटी की है। कुछ रिजर्व सैनिक नए बुलावे को अस्वीकार कर रहे हैं। रिजर्व ड्यूटी के लिए रिपोर्ट करने वाले इस्राइलियों की संख्या इतनी कम हो गई है कि सेना ने सेवा जारी रखने के लिए लोगों को भर्ती करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया है।
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इस्राइल का झंडा - फोटो : एएनआई
अति-रूढ़िवादी पार्टियों का रुख क्या
नेतन्याहू सरकार के कानून लागू करने की तैयारी और सरकार गिराने के लिए विपक्ष ने आह्वान किया है कि अगर सरकार में शामिल अति-रूढ़िवादी साझेदार अपने समुदाय को सैन्य सेवा से छूट देने वाला कानून पारित करने में विफल रहते हैं तो उनके साथ नाता तोड़ लेंगे। नेतन्याहू के लिए हरेदीम या हिब्रू में दो पार्टियां बेहद जरूरी हैं। दोनों को सरकार को भंग करने के लिए मतदान करना होगा। 

इसमें नेतन्याहू की सबसे बड़ी समर्थक पार्टी शास भी शामिल है। शास के प्रवक्ता ने कहा कि पार्टी वर्तमान में विघटन के पक्ष में मतदान करने की योजना बना रही है। जब तक कि वार्ता में कोई सफलता नहीं मिलती। दूसरी पार्टी डेगेल हाटोरा भी पिछले सप्ताह से सरकार छोड़ने की धमकी दे रही है। धर्म और राज्य मामलों के विशेषज्ञ शुकी फ्राइडमैन ने कहा कि हाटोरा युद्ध और राज्य की आर्थिक स्थिति और किसी भी अन्य चीज की परवाह नहीं करते हैं, लेकिन उनके सांप्रदायिक हित हैं। इस सांप्रदायिक हित का ध्यान सेना में सेवा करने से छूट प्राप्त करना है। हालांकि माना जा रहा है कि पीएम नेतन्याहू सरकार को बचाने के लिए कोई समझौता कर सकते हैं।




संसद भंग हो जाती है तो क्या होगा
अगर इस्राइल की संसद भंग हो जाती है तो सरकार को कई प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। हिब्रू विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर गायिल तलशीर ने कहा कि यदि संसद भंग हो जाती है तो भी सरकार को अतिरिक्त मतदान सहित नौकरशाही की कई प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ेगा।  यह एक बंदूक की तरह होगा जिसे स्थिति में रखा गया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि गठबंधन खत्म हो गया है। इस्राइल में चुनाव 2026 में होने हैं। तलशीर का मानना है कि संसद भंग होना असंभव है। तलशीर ने कहा कि अगर एक अति-रूढ़िवादी पार्टी अनुपस्थित है, तो वोट पास नहीं होगा और छह महीने तक कोई दूसरा प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता।

गाजा में युद्ध और बंधक संकट पर क्या असर होगा?
नेतन्याहू कहते हैं कानून लागू करने का मकसद मौजूदा युद्ध है। तलशीर ने कहा कि अति-रूढ़िवादी दल गठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन वे चाहते हैं कि युद्ध जल्द से जल्द खत्म हो जाए। हरेदीम को लगता है कि एक बार युद्ध समाप्त हो जाने पर उन पर से दबाव हट जाएगा और वे अपनी सैन्य छूट कानून प्राप्त कर सकेंगे।
 
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