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कोरोना वायरस का ब्लैक होल: गुप्त पुलिसकर्मियों और कम्युनिस्टों ने किया गुफाओं पर नियंत्रण, पत्रकार और अनुसंधानकर्ताओं पर रोक
Thu, 31 Dec 2020 12:55 AM IST
देव कश्यप
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग
Published by: देव कश्यप
Updated Thu, 31 Dec 2020 12:55 AM IST
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चमगादड़ों की गुफाएं (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो : iStock
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चीन भले ही लगातार इस बात से इनकार करता रहा है कि कोरोना वायरस की उत्पत्ति उसके वुहान शहर से नहीं हुई है, लेकिन पूरी दुनिया इस बात को मानती है। अब एक आठ साल पुराना मामला सामने आया है जिसने चीन के दावों की पोल खोल दी है।
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दक्षिणी चीन के हरे-भरे पहाड़ी घाटियों में एक गहरी खदान का प्रवेश द्वार है जो चमगादड़ों का बसेरा बन चुका था, जिसके बारे में कहा जाता है कि इन्हीं जगहों से कोविड-19 वायरस की उत्पत्ति हुई होगी।
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यह क्षेत्र वैज्ञानिकों के लिए दिलचस्प है क्योंकि इन गुफाओं से कोरोना वायरस की उत्पत्ति का सुराग मिल सकता है, जिसने दुनिया भर में 17 लाख से ज्यादा लोगों की जान ले ली है। फिर भी वैज्ञानिकों और पत्रकारों के लिए, यह राजनीतिक संवेदनशीलता और गोपनीयता के कारण बिना किसी सूचना के एक ब्लैक होल बन गया है।
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एक नई रिपोर्ट ने चीन की साजिशों और सच्चाई को बाहर आने से रोकने की उसकी कोशिशों को उजागर किया है। रिपोर्ट में चीन की असलियत उजागर करते हुए बताया गया है कि हाल ही में बैट रिसर्च टीम ने इन खदानों का दौरा किया था और वो नमूने लेने में कामयाब भी रही, लेकिन अधिकारियों ने वो नमूने छीन लिए। चीनी सरकार ने अपने कोरोना वायरस विशेषज्ञों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि इस संबंध में मीडिया से कोई बात न की जाए। इस वजह से अधिकांश राज दुनिया के सामने नहीं आ पाते।
चीन में चमगादड़ों की गुफाओं को कोरोना वायरस का ब्लैक होल कहा जाता है। दक्षिणी चीन में स्थित इन गुफाओं में मौजूद चमगादड़ों की वजह से निकले कोरोना वायरस से दुनिया भर में 17 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है। जिस पहाड़ी खदान में 12 साल पहले तीन मजदूर रहस्यमयी निमोनिया से मरे थे, वहां से मिले सबूत ये बताते हैं कि आज के कोरोना वायरस से उस समय का वायरस मिलता-जुलता था।
आज से करीब 12 साल पहले चीन के एक गांव में मौजूद पहाड़ी खदान में रहस्यमयी निमोनिया की वजह से तीन खनन कर्मियों की मौत हो गई थी। इसके बाद से लगातार इस खदान को चीन ने बंद करके रखा है। यहां जाना संभव ही नहीं है। कुछ अंतरराष्ट्रीय पत्रकार यहां जाना चाहते थे ताकि कोरोना को लेकर रिसर्च की जा सके, लेकिन चीन की सरकार इन गुफाओं तक किसी को जाने नहीं देती। समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस (एपी) के पत्रकारों ने भी वहां जाने की कोशिश की लेकिन जा नहीं पाए। उन्हें गुप्त पुलिसकर्मियों और गांव के लोगों ने आगे जाने नहीं दिया। यहां तक कि सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों ने एपी के पत्रकारों की गाड़ी का पीछा भी किया।
इतना ही नहीं चीन की सरकार ने कोरोना वायरस के स्थानीय एक्सपर्ट्स को मीडिया से बात करने से मना कर दिया है। साथ ही कोरोना वायरस से संबंधित अध्ययन और रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों पर चीन सरकार की पूरी नजर रहती है। अगर कुछ सरकार के विपरीत होता है तो तुरंत उसे बंद करवा दिया जाता है। फिर इन वैज्ञानिकों को कहा जाता है कि लोगों से ये कहो कि कोरोना वायरस चीन के बाहर से फैला है।
चीन की सरकार करोड़ों रुपये का ग्रांट चीन के वैज्ञानिकों को दे रही है ताकि वे कोरोना वायरस पर रिसर्च कर सकें, लेकिन इन वैज्ञानिकों को चीन की सेना के साथ जोड़ दिया गया है। इनकी हर हरकत पर चीन की सेना नजर रखती है। चीन में हुए किसी भी रिसर्च को पब्लिश कराने से पहले चीन की सरकार के कैबिनेट से पास कराना होता है। कैबिनेट को अगर सबकुछ सही लगता है तो ही रिसर्च पेपर सामने आता है।
कोरोना वायरस को लेकर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में एक टास्क फोर्स भी बनाई गई है। यह टास्क फोर्स पूरे चीन में होने वाली सारी गतिविधियों पर नजर रखती है। कोरोना वायरस को लेकर किसी भी तरह का आदेश यहीं से आता है। एपी के पत्रकारों को चीन की सरकार और स्थानीय लोगों ने उस गुफा तक नहीं जाने दिया जहां पर 12 साल पहले रहस्यमयी निमोनिया से मजदूरों की मौत हुई थी।
उन्हें किसी भी तरह के रिसर्च पेपर हासिल नहीं करने दिए गए। चीन के वैज्ञानिकों को कहा गया कि वे एपी के पत्रकारों की टीम से बात नहीं करेंगे। जिस जगह कोरोना वायरस का सबसे नजदीकी संस्करण था, उस पहाड़ी खदान तक तो पहुंचने से काफी पहले ही पत्रकारों को रोक दिया गया। इसी पहाड़ी खदान में बने शैफ्ट की सफाई करते समय साल 2012 में छह मजदूर रहस्यमयी निमोनिया से बीमार हुए थे और तीन की मौत हो गई थी।