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ब्रिटेन: संसदीय उपचुनाव में ब्रिटिश लेबर पार्टी की करारी हार, क्या पकड़ेगी फ्रेंच सोशलिस्ट पार्टी की राह?

Sat, 08 May 2021 06:52 PM IST
कुमार संभव डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, लंदन
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, लंदन Published by: कुमार संभव Updated Sat, 08 May 2021 06:52 PM IST
सार

दरअसल, फ्रांस की सोशलिस्ट पार्टी 2017 तक सत्ता में थी, लेकिन राष्ट्रपति फ्रांस्वां ऑलोंद के जमाने में अपनाई गई मध्यमार्गी नीतियों का नतीजा यह हुआ कि 2017 के चुनाव में उसे सिर्फ 8 फीसदी वोट मिले।

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British Labor Party defeat in britain parliamentary by-elections
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

विस्तार

ब्रिटेन के स्थानीय और एक संसदीय उपचुनाव में विपक्षी लेबर पार्टी की बुरी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद सवाल उठ रहा है कि क्या लेबर पार्टी फ्रांस की सोशलिस्ट पार्टी की राह पर जा रही है? दरअसल, फ्रांस की सोशलिस्ट पार्टी 2017 तक सत्ता में थी, लेकिन राष्ट्रपति फ्रांस्वां ऑलोंद के जमाने में अपनाई गई मध्यमार्गी नीतियों का नतीजा यह हुआ कि 2017 के चुनाव में उसे सिर्फ 8 फीसदी वोट मिले। धुर वामपंथी और धुर दक्षिणपंथी पार्टियों के बीच पिसते हुए सोशलिस्ट पार्टी आज फ्रांस की राजनीति में लगभग अप्रसांगिक हो गई है। विश्लेषकों का कहना है कि लेबर पार्टी भी उसी दिशा में जाती नजर आ रही है।

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बता दें कि हार्टपुल निर्वाचन क्षेत्र में हुए संसदीय उपचुनाव के नतीजे ने लेबर पार्टी को झकझोर दिया है। यह वो सीट है, जहां से वह 50 साल से भी ज्यादा समय से कभी नहीं हारी थी, लेकिन इस बार उसे सिर्फ 29 फीसदी वोट मिले, जबकि सत्ताधारी कंजरवेटिव पार्टी ने तकरीबन 52 प्रतिशत वोट हासिल किए। देश भर से आए स्थानीय चुनावों के नतीजे भी लेबर पार्टी के लिए बेहद निराशाजनक रहे। स्थानीय परिषद चुनावों में उसे 170 सीटों का नुकसान हुआ, जबकि कंजरवेटिव पार्टी को 179 और ग्रीन पार्टी को 50 सीटों का फायदा हुआ।
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विश्लेषकों के मुताबिक, लेबर पार्टी के ज्यादातर युवा और प्रगतिशील समर्थकों ने इस बार ग्रीन पार्टी को अपना समर्थन दिया, जबकि उसके ब्रेग्जिट समर्थक मतदाता कंजरवेटिव पार्टी या फिर लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ चले गए। इन नतीजों को लेबर पार्टी के नेता कियर स्टार्मर के लिए बड़ा झटका बताया गया है। बता दें कि 2019 के चुनाव में लेबर पार्टी ने सोशलिस्ट नेता जेरमी कॉर्बिन के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था। ब्रेग्जिट (यूरोपियन यूनियन से ब्रिटेन के अलगाव) के मुद्दे पर हुए उस चुनाव में लेबर पार्टी हार गई। उसके बाद पार्टी ने मध्यमार्गी स्टार्मर को अपना नेता चुना। बीते एक साल में स्टार्मर ने पार्टी को वामपंथी नीतियों से हटाकर टोनी ब्लेयर के जमाने वाली मध्यमार्गी नीतियों की तरफ लाने की कोशिश की। हालांकि, उनका यह दांव बुरी तरह नाकाम रहा।
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ब्रिटिश अखबार द गार्जियन के मुताबिक, चुनाव नतीजों के बाद स्टार्मर अब पार्टी के मुख्यालय को लंदन से हटाकर किसी दूसरी जगह पर ले जाने का विचार कर रहे हैं। इसका मकसद यह संदेश देने का है कि लेबर पार्टी लंदन के इलीट वर्ग की नहीं, बल्कि सारे देश के आम लोगों की पार्टी है। इसके अलावा वह पार्टी के पदाधिकारियों में बड़े पैमाने पर फेरबदल की योजना भी बना रहे हैं।

गौरलतब है कि हार के बाद लेबर पार्टी में अंदरूनी झगड़े फिर उभर आए हैं। कॉर्बिन के समर्थकों ने इस हार को वामपंथी नीतियों से पार्टी को हटाने का परिणाम बताया। बर्मिंघम से लेबर पार्टी के सांसद खालिद महमूद के मुताबिक, चुनाव नतीजों से साफ है कि लेबर पार्टी ने अपने परंपरागत समर्थकों का भरोसा खो दिया। उन्होंने कहा, 'सोशल मीडिया के युग में लंदन के पूंजीपतियों ने पार्टी पर कब्जा जमा लिया। वे भला चाहते हैं, लेकिन उनकी नीतियां अस्मिता, विभाजन और तकनीक आधारित कल्पनाओं से भरी हैं, जिनका उन लोगों से कोई तालमेल नहीं है, जो इस चुनाव में वोट डालने गए।'

कॉर्बिन समर्थक नेता डायना एबॉट ने कहा है कि स्टार्मर को अब अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। अब पार्टी की मुश्किलों के लिए जेरमी कॉर्बिन को दोषी ठहराना संभव नहीं है, जिनके नेतृत्व में पार्टी ने दो बार हार्टपुल की सीट जीती थी। कॉर्बिन समर्थक नौजवानों के आंदोलन मोमेंटम ने कहा, 'अब साफ हो गया है कि लेबर पार्टी को स्टार्मर की नाकाम रणनीति पर चलने से अब कोई फायदा नहीं होगा।'


चौतरफा हार के बीच लेबर पार्टी के लिए राहत की खबर सिर्फ वेल्स से आई, जहां प्रांतीय असेंबली में पार्टी बहुमत हासिल करने के करीब है। स्कॉटलैंड की प्रांतीय अंसेबली के पूरे चुनाव नतीजे शनिवार देर शाम तक मालूम होंगे, जिस पर पूरे देश की निगाहें लगी हुई हैं। अगर वहां स्कॉटिश नेशनल पार्टी (एसएनपी) जीती तो स्कॉटलैंड की आजादी के मुद्दे पर फिर जनमत संग्रह कराने मांग तेज हो जाएगी। शुरुआती नतीजे एसएनपी के लिए उत्साहवर्धक दिख रहे हैं। 

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