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नेपाल: गहराते आर्थिक संकट के बीच चीन की ‘कर्ज जाल कूटनीति’ पर उठे सवाल

Thu, 21 Apr 2022 04:10 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 21 Apr 2022 04:10 PM IST
सार

नेपाल में विदेशी मुद्रा के गहराते संकट के कारण सोना, कार, कॉस्मेटिक्स आदि जैसी लग्जरी वस्तुओं के आयात को सीमित किया गया है। नेपाल के विदेशी मुद्रा भंडार में बीते अगस्त से इस साल फरवरी के मध्य तक 16 फीसदी की गिरावट आ चुकी थी। फिलहाल अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि नेपाल के सामने पैदा हुआ विदेशी मुद्रा का संकट अल्पकालिक है...

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After Sri Lanka and Pakistan, now one aspect behind Nepal economic trouble is that of China debt trap policy
पुष्प कमल दहाल के साथ नेपाल के पीएम शेर बहादुर देउबा - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

श्रीलंका और पाकिस्तान के बाद अब नेपाल की बिगड़ती आर्थिक स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का ध्यान केंद्रित होने लगा है। इस ओर ध्यान खींचा जा रहा है कि इन तीनों देशों की आर्थिक मुसीबत के पीछे एक पहलू चीन का है। तीनों देशों ने चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) में शामिल होने का फैसला किया था और चीन से कर्ज लिया। अब ये उन पर भारी पड़ रहा है।

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लग्जरी वस्तुओं के आयात को सीमित किया

नेपाल में विदेशी मुद्रा के गहराते संकट के कारण सोना, कार, कॉस्मेटिक्स आदि जैसी लग्जरी वस्तुओं के आयात को सीमित किया गया है। नेपाल के विदेशी मुद्रा भंडार में बीते अगस्त से इस साल फरवरी के मध्य तक 16 फीसदी की गिरावट आ चुकी थी। फिलहाल अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि नेपाल के सामने पैदा हुआ विदेशी मुद्रा का संकट अल्पकालिक है। लेकिन ये चिंता भी जताई जा रही है कि चीन की इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए नेपाल ने जो कर्ज लिए हैं, उसका बोझ बढ़ता रहा, तो हालात बेकाबू हो सकते हैं।

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नेपाल के बीआरआई में शामिल होने के लिए चीन के साथ उसका समझौता 2017 में हुआ था। चीन ने इसी तरह के समझौते श्रीलंका, कंबोडिया, पाकिस्तान और मलेशिया के साथ भी किए हुए हैं। हांगकांग के अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट में छपे एक विश्लेषण के मुताबिक बीआरआई में शामिल देशों के कर्ज जाल में फंसने को लेकर चिंता काफी समय से जताई जा रही है। अब इस समस्या ने फिर से दुनिया का ध्यान खींचा है।
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चीन का कहना है कि इस परियोजना का मकसद मध्यम आय वाले उन देशों में बुनियादी ढांचे का विकास करना है, जिनके पास खुद ऐसा करने की वित्तीय क्षमता नहीं है। चीन का दावा है कि इस परियोजना के कारण होने वाले विकास की वजह से साल 2040 तक विश्व अर्थव्यवस्था सात ट्रिलियन डॉलर की हो जाएगी। लेकिन पश्चिमी देश इसे चीन की डेट-ट्रैप डिप्लोमैसी (कर्ज जाल में फंसाने की कूटनीति) का हिस्सा मानते हैं।

नेपाल में श्रीलंका को लेकर बहस

आरोप है कि श्रीलंका आज जिस मुश्किल में है, उसका एक कारण बीआरआई के लिए लिया गया कर्ज भी है। जबकि श्रीलंका में चीन समर्थकों गुटों का कहना है कि श्रीलंका पर कुल जितना कर्ज है, उसका 10 फीसदी हिस्सा ही उसने चीन से लिया है। यानी अगर ये कर्ज न होता, तब भी श्रीलंका की हालत खास बेहतर नहीं होती। नेपाल के अंदर अब इस मसले पर तीखी बहस चल रही है। नेपाल की सियासत भी चीन और अमेरिका समर्थक दलों में बंटी हुई है।

हाल में नेपाल ने अमेरिकी संस्था मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (एमसीसी) से 50 करोड़ डॉलर की सहायता स्वीकार की है। इस डील के समर्थकों की राय है कि इससे नेपाल पर चीन के बढ़े प्रभाव को संतुलित करने में मदद मिलेगी। चीन समर्थक दलों के विरोध के कारण ये डील पांच साल तक अटकी रही। उधर अब बीआरआई से जुड़ी परियोजनाओं को लेकर भी ये शिकायत की जा रही है कि मौजूदा नेपाल सरकार इनमें दिलचस्पी नहीं ले रही है।



इसी बीच नेपाल में आर्थिक संकट खड़ा होने के संकेत मिल रहे हैं। इससे उबरने में चीन कितना सहायक साबित होता है, इस पर पर्यवेक्षकों की नजर है। शायद उसी से बीआरआई का आगे का रास्ता तय होगा।

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