'खून की बूंद' बताएगी कोरोना के मरीज को कितनी देखभाल की जरूरत
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कोरोना महामारी पर काबू पाने के लिए अलग अलग वैक्सीन पर काम चल रहा है, कइयों का काम लगभग पूरा हो चुका है। वहीं, इस महामारी को लेकर अलग अलग देशों के वैज्ञानिक और शोधकर्ता इस पर शोध कर रहे हैं।
ऐसे में एक शोध ब्रिटेन में हुआ है, जिसमें शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि उन्होंने एक ब्लड टेस्ट विकसित किया है, जो यह अनुमान लगा सकता है कि किस कोरोना मरीज को गहन देखभाल की आवश्यकता होगी या लक्षण विकसित होने के बाद भी उनके जीवित रहने की संभावना है।
बता दें कि अभी तक इस टेस्ट को 24 गंभीर रूप से बीमार कोरोना मरीजों पर आजमाया गया है। इस टेस्ट ने 19 में से 18 रोगियों के संबंध में सही परिणाम का पता लगाया, हालांकि इस दौरान बाकी बचे पांच मरीजों की मौत हो गई। हालांकि, अस्पताल के हिसाब से इस टेस्ट के अभी और परीक्षण किया जाना बाकी है।
अगर यह टेस्ट मान्य हो जाता है तो इससे अधिक से अधिक मरीजों की जान बचाई जा सकती है। यह टेस्ट डॉक्टरों के लिए सबसे ज्यादा कारगर हो सकता है। टेस्ट अधिक जरूरतमंद मरीजों तक पहुंचाने में मददगार हो सकता है, जिससे उनके बचने की संभावना बढ़ सकती है। यह मुश्किल फैसले लेने के लिए डॉक्टरों के आत्मविश्वास को भी बढ़ा सकता है।
बता दें कि मार्कस राल्सर और उनके सहयोगियों ने कोरोना मरीजों के रक्त में 27 प्रोटीनों की पहचान की जो उनके लक्षणों की गंभीरता के आधार पर विभिन्न स्तरों पर मौजूद थे। तब से उन्होंने 160 उन कोरोना मरीजों को फॉलो किया, जिन्हें ब्लड टेस्ट कराने के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था। ताकि यह पता चल सके कि क्या उनके प्रोटीन सिग्नेचर उनकी बीमारी की प्रगति की भविष्यवाणी कर सकते हैं? बता दें कि मार्कस राल्सर लंदन में फ्रांसिस क्रिक इंस्टीट्यूट और बर्लिन में चारिटे यूनिवर्सिटी मेडिसिन में बायोकेमिस्ट्री के प्रोफेसर हैं।