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Identifying decomposed and mutilated bodies in Nepal is difficult; is DNA the only remaining recourse?
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नेपाल में सड़े अंग क्षत-विक्षत शवों को पहचानना मुश्किल, DNA ही बचा आखिरी सहारा?
वीडियो डेस्क अमर उजाला डॉट कॉम
Published by: Bhaskar Tiwari
Updated Sun, 06 Sep 2026 06:30 AM IST
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नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने हजारों परिवारों को गहरे संकट में डाल दिया है। बाढ़ के कारण बड़ी संख्या में लोगों की जान चली गई, जबकि हजारों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। इस प्राकृतिक आपदा के बाद सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक मृतकों के शवों की पहचान करना है। बाढ़ के तेज बहाव में बहकर आए कई शव क्षत-विक्षत, सड़े हुए या अधूरे हालत में मिले हैं, जिसके कारण चेहरा, कपड़े या व्यक्तिगत सामान देखकर उनकी पहचान करना बेहद मुश्किल हो गया है। अधिकारियों के अनुसार, लंबे समय तक पानी, कीचड़ और मलबे में पड़े रहने के कारण शवों की पहचान से जुड़ी महत्वपूर्ण विशेषताएं भी नष्ट हो सकती हैं। ऐसे हालात में वैज्ञानिक तरीके से पहचान सुनिश्चित करने के लिए डीएनए जांच को सबसे भरोसेमंद माध्यम माना जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, बाढ़ में अब तक 1,300 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि करीब 5,000 लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। पुलिस ने मृतकों और उनके परिजनों की पहचान प्रक्रिया के लिए अब तक कुल 2,272 डीएनए सैंपल जुटाए हैं।
इनमें 1,260 सैंपल शवों से और 1,012 सैंपल लापता लोगों के परिजनों से लिए गए हैं। अधिकारियों के मुताबिक, डीएनए सैंपल लेने और पहचान से जुड़ी अन्य आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी करने के बाद 1,030 शवों को दफनाया जा चुका है। इनमें 222 महिलाओं, 355 पुरुषों और 453 ऐसे शव शामिल हैं, जिनका लिंग निर्धारित नहीं किया जा सका है। हालांकि, अब तक केवल 96 शवों की पहचान सुनिश्चित होने के बाद उन्हें उनके परिवारों को सौंपा गया है। बाकी शवों की पहचान की प्रक्रिया अभी जारी है। पुलिस के अनुसार, डीएनए जांच के दौरान शव से लिए गए जैविक नमूने की तुलना उसके करीबी रक्त संबंधियों से लिए गए नमूनों से की जाती है। यदि दोनों नमूनों में पर्याप्त आनुवंशिक समानता मिलती है, तो मृतक की पहचान की पुष्टि करने में मदद मिलती है। इस पूरी प्रक्रिया में समय लग सकता है, खासकर तब जब शव बाढ़ और मलबे के कारण काफी क्षतिग्रस्त हो चुके हों। ऐसे में डीएनए तकनीक उन परिवारों के लिए उम्मीद की किरण बनी हुई है, जो अपने लापता परिजनों के बारे में निश्चित जानकारी का इंतजार कर रहे हैं। अधिकारियों के सामने एक ओर बड़ी संख्या में शवों की पहचान करने की चुनौती है, तो दूसरी ओर लापता लोगों के परिजनों से नमूने जुटाकर उनका मिलान करने की जिम्मेदारी भी है। प्राकृतिक आपदा के बाद पहचान की यह प्रक्रिया न केवल प्रशासनिक और वैज्ञानिक चुनौती है, बल्कि हजारों परिवारों के लिए भावनात्मक रूप से भी बेहद कठिन समय है। डीएनए जांच के जरिए शवों की सही पहचान होने से परिवारों को अपने प्रियजनों के बारे में अंतिम और प्रमाणिक जानकारी मिल सकेगी तथा उनके अंतिम संस्कार की प्रक्रिया भी उचित तरीके से पूरी की जा सकेगी।
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