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शरणार्थियों का जीवन जी रहे आपदा पीड़ित
Updated Sat, 16 Jan 2016 08:32 PM IST
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सरकार ने अगस्त 2012 में आई बाढ़ के पीड़ितो को दो-दो लाख रुपये मुआवजा और जून 2013 के पीड़ितों को दो-दो लाख रुपये और मकान बनाने के लिए पांच-पांच लाख रुपये की अतिरिक्त सहायता दी थी।
जिससे पीड़ितों को छत मिल गई, लेकिन पर्याप्त सहायता नहीं मिलने से अगस्त 2012 के बाढ़ पीड़ित आज भी शरणार्थियों का जीवन जीने को मजबूर हैं।
अगस्त 2012 में असी गंगा, भागीरथी, यमुना एवं हनुमानगंगा में आई बाढ़ में करीब डेढ़ सौ परिवारों के घर मय सामान के बह गए थे। तब सरकार ने पीड़ित परिवारों को दो-दो लाख रुपये मुआवजा बांटा, जो नाकाफी थी।
इतनी कम राशि में मकान तो दूर, जमीन भी नहीं मिल पाई है। आपदा पीड़ित मुआवजे की मांग कर ही रहे थे कि जून 2013 में दोबारा बाढ़ आई, तो सरकार इनको भूलकर नए सिरे से राहत के मानक बनाकर जून 2013 के पीड़ितों को 2-2 लाख रुपये सहायता व मकान बनाने के लिए पांच-पांच लाख रुपये की सहायता दी गई।
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इसमें 396 परिवारों का चयन किया गया।
अब स्थिति यह है कि वर्ष 2012 के आपदा पीड़ित दर्जनों परिवार आज भी गंगोरी स्थित जल विद्युत निगम की कालोनी, चीवां के पास जंगलात की जमीन में शरणार्थियों का जीवन जीने को मजबूर हैं। उन्हें अब भी सरकार से नए मानकों के अनुसार राहत सहायता का इंतजार है।
केस 1-
शूरवीर सिंह ने गंगोरी में मकान बनाने के साथ ही दस नाली जमीन पर नर्सरी तैयार की थी। अगस्त 2012 की बाढ़ में सब बह गया। सरकार से सिर्फ दो लाख रुपये मुआवजा मिला। अब वह चीवां के पास जंगलात की जमीन पर मकान बनाकर जीवन यापन कर रहे हैं।
केस 2-
गंगोरी निवासी केशर सिंह पंवार की रवाड़ा में खेती की जमीन तथा गंगोरी के खरादी तोक में घर और चक्की अगस्त 2012 की बाढ़ में बही। उन्हें दो लाख रुपये ही मुआवजा मिला, जबकि खेत, चक्की और दुकान आज तक कुछ नहीं मिला। अब वे गंगोरी स्थित जल विद्युत निगम की कालोनी में शरण लिए हुए है।
कोट........
सरकार की ओर से अगस्त 2012 के आपदा पीड़ितों के लिए 2-2 लाख रुपये सहायता अनुमन्य की गई थी, जबकि जून 2013 के बाढ़ पीड़ितों को दो-दो लाख सहायता तथा घर बनाने के लिए विश्व बैंक की योजना में 5-5 लाख रुपये अतिरिक्त दिए गए।
देवेंद्र पटवाल, जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी उत्तरकाशी।
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जिससे पीड़ितों को छत मिल गई, लेकिन पर्याप्त सहायता नहीं मिलने से अगस्त 2012 के बाढ़ पीड़ित आज भी शरणार्थियों का जीवन जीने को मजबूर हैं।
अगस्त 2012 में असी गंगा, भागीरथी, यमुना एवं हनुमानगंगा में आई बाढ़ में करीब डेढ़ सौ परिवारों के घर मय सामान के बह गए थे। तब सरकार ने पीड़ित परिवारों को दो-दो लाख रुपये मुआवजा बांटा, जो नाकाफी थी।
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इतनी कम राशि में मकान तो दूर, जमीन भी नहीं मिल पाई है। आपदा पीड़ित मुआवजे की मांग कर ही रहे थे कि जून 2013 में दोबारा बाढ़ आई, तो सरकार इनको भूलकर नए सिरे से राहत के मानक बनाकर जून 2013 के पीड़ितों को 2-2 लाख रुपये सहायता व मकान बनाने के लिए पांच-पांच लाख रुपये की सहायता दी गई।
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इसमें 396 परिवारों का चयन किया गया।
अब स्थिति यह है कि वर्ष 2012 के आपदा पीड़ित दर्जनों परिवार आज भी गंगोरी स्थित जल विद्युत निगम की कालोनी, चीवां के पास जंगलात की जमीन में शरणार्थियों का जीवन जीने को मजबूर हैं। उन्हें अब भी सरकार से नए मानकों के अनुसार राहत सहायता का इंतजार है।
केस 1-
शूरवीर सिंह ने गंगोरी में मकान बनाने के साथ ही दस नाली जमीन पर नर्सरी तैयार की थी। अगस्त 2012 की बाढ़ में सब बह गया। सरकार से सिर्फ दो लाख रुपये मुआवजा मिला। अब वह चीवां के पास जंगलात की जमीन पर मकान बनाकर जीवन यापन कर रहे हैं।
केस 2-
गंगोरी निवासी केशर सिंह पंवार की रवाड़ा में खेती की जमीन तथा गंगोरी के खरादी तोक में घर और चक्की अगस्त 2012 की बाढ़ में बही। उन्हें दो लाख रुपये ही मुआवजा मिला, जबकि खेत, चक्की और दुकान आज तक कुछ नहीं मिला। अब वे गंगोरी स्थित जल विद्युत निगम की कालोनी में शरण लिए हुए है।
कोट........
सरकार की ओर से अगस्त 2012 के आपदा पीड़ितों के लिए 2-2 लाख रुपये सहायता अनुमन्य की गई थी, जबकि जून 2013 के बाढ़ पीड़ितों को दो-दो लाख सहायता तथा घर बनाने के लिए विश्व बैंक की योजना में 5-5 लाख रुपये अतिरिक्त दिए गए।
देवेंद्र पटवाल, जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी उत्तरकाशी।