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International Youth Day: चैन सिंह ने मोरी गांव को पर्यटन मानचित्र पर दिलाया स्थान

Wed, 12 Aug 2020 03:49 PM IST
देहरादून ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उत्तरकाशी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उत्तरकाशी Published by: देहरादून ब्यूरो Updated Wed, 12 Aug 2020 03:49 PM IST
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International Youth Day 2020: Chain Singh places Mori on the tourism map
चैन सिंह - फोटो : amar ujala

उत्तरकाशी में मोरी ब्लाक स्थित सांकरी गांव निवासी चैन सिंह रावत ने अपने जुनून व जज्बे से मोरी क्षेत्र को पर्यटन मानचित्र में विशेष स्थान दिलाया है। साथ ही स्थानीय युवाओं के लिए पर्यटन आधारित स्वरोजगार के नए अवसर भी खोले हैं।

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चैन सिंह (40) बताते हैं कि 16 साल की उम्र में कुछ पर्यटक मुझे रास्ता दिखाने के लिए अपने साथ केदारकांठा लेकर गए थे। तभी से पर्यटन के प्रति मेरी रुचि जागृत हुई। पिता भजन सिंह रावत व माता पवित्री देवी को यह पसंद नहीं था तो उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए उत्तरकाशी आ गया। चाचा भगत रावत के सुझाव पर नेहरू पर्वतारोहण संस्थान में कोर्स करने गया।
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मेरे प्रदर्शन को देखकर संस्थान ने मुझे स्कॉलरशिप दे दी। कोर्स समाप्त होने पर पढ़ाई के साथ उत्तरकाशी नगर की ट्रैकिंग एजेंसियों में पोर्टर का काम भी करने लगा। इस बीच नेहरू युवा केंद्र की तरफ से उत्कृष्ट स्वयंसेवी चुने जाने पर 30 हजार रुपये का पुरस्कार मिला, जिससे ट्रैकिंग का सामान खरीदा और पहली बार अपना ट्रैकिंग ग्रुप लेकर केदारताल गया।

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मोरी क्षेत्र के युवाओं को जोड़ा

इसके बाद हरकीदून प्रोटेक्शन एंड माउंटेनियरिंग एसोसिएशन का कार्यालय खोला, जिसमें पीजी कॉलेज में पढ़ने वाले मोरी क्षेत्र के युवाओं को जोड़ा। इसके बाद पूरा ध्यान मोरी क्षेत्र को पर्यटन मानचित्र में प्रसिद्ध करने पर लगाया।

टीम के साथ चाईंशील, देवक्यारा, सरुताल आदि नए ट्रैक रूट खोजे और साथ ही सांस्कृतिक पर्यटन को भी बढ़ावा दिया। आज स्थिति यह है कि मोरी क्षेत्र में हर साल 50 हजार से अधिक पर्यटक पहुंच रहे हैं। मुझसे जुड़े कई युवाओं ने अपनी अलग ट्रैकिंग एजेंसी खोल ली हैं। मोरी क्षेत्र में ही करीब 20 एजेंसियां चल रही हैं।

जिससे सांकरी, कासला, लिवाड़ी, फिताड़ी, सिरगा, ढाटमीर, ओसला आदि दूरस्थ गांवों के तीन-चार हजार ग्रामीणों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलता है। पर्यटन उद्योग में सफलता मिलने के बाद मैंने समाज सेवा के उद्देश्य से हरकीदून पब्लिक स्कूल भी खोला। जहां आसपास के गांवों के 90 बच्चे पढ़ते हैं। जिनमें से 50 प्रतिशत से अधिक गरीब परिवार के बच्चों को निशुल्क शिक्षा प्रदान की जाती है। मेरी सफलता का सारा श्रेय माता-पिता व चाचा के साथ ही डॉ. हर्षवंती बिष्ट व कर्नल अशोक अबे को जाता है।

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