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14 बीट के चार फॉरेस्ट गार्डों के भरोसे गंगोत्री नेशनल पार्क की सुरक्षा
Updated Fri, 29 Sep 2017 10:07 PM IST
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उत्तरकाशी। देश के पांच सबसे बड़े वन्य विहारों में से एक गंगोत्री नेशनल पार्क, कर्मचारियों की किल्लत से जूझ रहा है। सरकार की अनदेखी के चलते बहुमूल्य वन संपदा से भरपूर पार्क की सुरक्षा कुछ हिम्मती वन रक्षकों के भरोसे ही चल रही है। हालात ये हैं कि पार्क की 14 बीटों में सिर्फ 4 स्थाई फॉरेस्ट गार्ड ही तैनात हैं, जबकि क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों और इसके महत्व को देखते हुए पार्क में फील्ड और ऑफिस स्टॉफ मिलाकर लगभग 60-70 कर्मचारी होने चाहिए।
उच्च हिमालयी क्षेत्र में करीब 2390 वर्ग किमी हिस्से में फैले गंगोत्री पार्क की स्थापना वर्ष 1989 में की गई थी। शुरुआती वर्षों में उत्तरकाशी वन प्रभाग का हिस्सा रहने के बाद वर्ष 2009 में इसे स्वतंत्र प्रभाग घोषित किया गया था, जिसके बाद से ही वन प्रभाग को कर्मचारियों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। स्नो लैपर्ड, हिमालयी भालू, रेड फॉक्स आदि दुर्लभ प्रजातियों के वास स्थल की सुरक्षा व शोध पर देश-विदेश के कई वन संस्थान भारी भरकम बजट खर्च करते हैं, लेकिन केंद्र व राज्य सरकारों की ओर से कर्मचारियों की कमी को दूर करने के लिए प्रयास नहीं किया गया।
सहायक वन कर्मचारी संघ के अध्यक्ष बीरी लाल भारती के अनुसार पार्क की निगरानी कई किमी लंबे ट्रैक रूटों से ही होती है, जिसके लिए पार्क में न तो कर्मचारी हैं और न ही उपकरण। पार्क में 1 उप निदेशक, 1 रेंजर, 1 बाबू, 3 फॉरेस्टर व 4 गार्ड के अलावा 25-30 संविदा कर्मचारी मौजूद हैं। जबकि यहां पर लगभग 60-70 स्थाई कर्मचारी होने चाहिए थे। इससे पार्क अधिकारियों को कई बार उत्तरकाशी वन प्रभाग के कर्मचारियों की मदद लेनी पड़ती है। संगठन द्वारा कई बार मांग करने के बाद भी विभाग की ओर से कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है।
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कोट:
पार्क में स्थाई कर्मचारियों की थोड़ी कमी है, लेकिन संविदा कर्मचारियों की मदद से कार्यों को पूरा कर लिया जाता है। कर्मचारियों की ट्रेनिंग और सुविधाओं के लिए उचित व्यवस्था की गई है। नई नियुक्तियों के लिए उच्चस्तर पर बात चल रही है, जल्द ही कर्मचारियों की कमी दूर हो जाएगी और संसाधन भी बेहतर हो जाएंगे। - श्रवण कुमार, उप निदेशक, गंगोत्री नेशनल पार्क।
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उच्च हिमालयी क्षेत्र में करीब 2390 वर्ग किमी हिस्से में फैले गंगोत्री पार्क की स्थापना वर्ष 1989 में की गई थी। शुरुआती वर्षों में उत्तरकाशी वन प्रभाग का हिस्सा रहने के बाद वर्ष 2009 में इसे स्वतंत्र प्रभाग घोषित किया गया था, जिसके बाद से ही वन प्रभाग को कर्मचारियों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। स्नो लैपर्ड, हिमालयी भालू, रेड फॉक्स आदि दुर्लभ प्रजातियों के वास स्थल की सुरक्षा व शोध पर देश-विदेश के कई वन संस्थान भारी भरकम बजट खर्च करते हैं, लेकिन केंद्र व राज्य सरकारों की ओर से कर्मचारियों की कमी को दूर करने के लिए प्रयास नहीं किया गया।
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सहायक वन कर्मचारी संघ के अध्यक्ष बीरी लाल भारती के अनुसार पार्क की निगरानी कई किमी लंबे ट्रैक रूटों से ही होती है, जिसके लिए पार्क में न तो कर्मचारी हैं और न ही उपकरण। पार्क में 1 उप निदेशक, 1 रेंजर, 1 बाबू, 3 फॉरेस्टर व 4 गार्ड के अलावा 25-30 संविदा कर्मचारी मौजूद हैं। जबकि यहां पर लगभग 60-70 स्थाई कर्मचारी होने चाहिए थे। इससे पार्क अधिकारियों को कई बार उत्तरकाशी वन प्रभाग के कर्मचारियों की मदद लेनी पड़ती है। संगठन द्वारा कई बार मांग करने के बाद भी विभाग की ओर से कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है।
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पार्क में स्थाई कर्मचारियों की थोड़ी कमी है, लेकिन संविदा कर्मचारियों की मदद से कार्यों को पूरा कर लिया जाता है। कर्मचारियों की ट्रेनिंग और सुविधाओं के लिए उचित व्यवस्था की गई है। नई नियुक्तियों के लिए उच्चस्तर पर बात चल रही है, जल्द ही कर्मचारियों की कमी दूर हो जाएगी और संसाधन भी बेहतर हो जाएंगे। - श्रवण कुमार, उप निदेशक, गंगोत्री नेशनल पार्क।