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परंपरा का पालन करते तो न आती आपदा
सुधाकर भट्ट
Updated Sat, 13 Jul 2013 09:08 AM IST
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भ्यूंदार गांव के 83 साल के विक्रम सिंह अब जोशीमठ में एक यूथ होस्टल में गांव के99 परिवारों के साथ दो कमरों में रहने के लिए विवश हैं। पूरा गांव इस बार 16 और 17 जून को भारी बरसात के कारण आपदा की भेंट चढ़ गया।
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इस बुजुर्ग की यादों में एक से एक खौफनाक मंजर हैं पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि पूरा गांव विस्थापन होने की कगार पर पहुंच गया हो। बतौर विक्रम सिंह सयानों की बातों को अनसुना करने का अंजाम भी इसी तरह का होता है।
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बरसात कुछ जल्दी ही आ गई
आपदाएं हिमालयी क्षेत्रों के लिए कोई नई बात नहीं। बिरही की बाढ़ से लेकर आठ के स्केल तक के भूकंपों से गुजरने वाले लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि आपदाओं से कैसे बखूबी लड़ा जाता है। भ्यूंदार निवासी उनमें से हैं जो बरसात के समय में ऊपर के इलाकों में चले जाते हैं। फूलों की घाटी से आने वाली लक्ष्मण गंगा से ये बरसात के समय दूरी बना लेते हैं। इस बार भी यही करने की तैयारी थी पर बरसात कुछ जल्दी ही आ गई।
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आपदा से कैसे निपटा जाए यह पहले गांव के लोग अच्छी तरह जानते थे। भारी बरसात में नुकसान को कैसे कम किया जाए इसका भी इल्म था। ये लोग अपनी इसी संपदा के बलबूते बिना किसी सहायता के सदियों से कुदरत से लड़ने में कामयाब रहे। आपदा प्रबंधन का तकनीकी ज्ञान का भी जोर भी परंपरागत तौर-तरीकों पर है।
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गांवों के बुजुर्गों के पास ज्ञान की यह थाती अब भी सुरक्षित है। उसे बहुधा हंसी-खेल में उड़ा दिया जाता है। नदियों और गाड-गदेरों की प्रवृत्ति को गांव का बच्चा-बच्चा जानता था। कितनी बरसात के बाद इन नदियों और नालों में कितना पानी आएगा सब जानते थे। गांवों के खेत भले ही नदियों के किनारे हों पर घर और मकान ऊंचे और पर्याप्त सुरक्षित जगह पर हुआ करते थे। नदियों और नालों के आसपास के जंगल को कितना सुरक्षित रखा जाना है कि यह भी देखा जाता था।
पहले श्रमदान की परंपरा थी
टिहरी जिला पंचायत सदस्य जोत सिंह बिष्ट के मुताबिक गांवों में पहले श्रमदान की परंपरा थी। भू स्खलन वाले क्षेत्रों में पेड़ पौधे सुरक्षित ही रखे जाते थे। सिंचित खेतों को जिन्हें सेरा कहा जाता है, गांव के नीचे ही बनाया जाता था। ऐसे खेत नदी किनारे भी हो सकते थे। नदी अगर खेत को बहा कर ले भी जाए तो इन खेतों को वापस बनाने की कोशिश होती थी।
परंपरागत ज्ञान पर ही आधारित डीएमएमसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक मंदाकिनी घाटी में ऐसी भी संरचनाएं मौजूद हैं जिनमें पहाड़ पर बरसात के पानी को नदियों तक पहुंचाने के लिए गांव के लोगों ने नालों को बनाया। चाल और खाल सामान्य परंपरा का हिस्सा थी।
जोत सिंह बिष्ट के मुताबिक इन परंपराओं को सहेज कर रखे जाने की जरूरत है। लोग जानते थे कि बरसात का पानी जहां गिरे वहीं से इकट्ठा कर लिया जाए। पहाड़, जंगल और पानी का रिश्ता बखूबी समझा जाता था। विक्रम सिंह के मुताबिक आजादी से पहले भी इसी तरह की आपदा आई थी। पर गांव के लोगों ने समझदारी दिखाई और खुद को बचा लिया। अब गांव के नीचे ही एक जल विद्युत परियोजना बन रही है। इस परियोजना के बैराज में पानी भरा और गांव के नीचे की जमीन को काटकर ले गया।
क्या रहती थी कोशिश
रिहायश के लिए ऊंची और सुरक्षित जगह का चुनाव किया जाए
नदियों से दूरी बनाकर रखी जाए। जरूरी हो तो बरसात के समय में पूरा गांव ही किसी सुरक्षित दूसरी जगह चला जाए
पहाड़ पर पानी अधिक जमा न होने दिया जाए। बरसात केअतिरिक्त पानी को नदियों और नालों तक पहुंचाने की व्यवस्था की जाए।
-गांव ऊपर और सिंचित खेत नीचे और सीढ़ीनुमा हों। उनकी ढलान इस तरह की हो कि पानी इकट्ठा न हो।
- हल का फाल इस तरह का होता था कि बहुत अधिक गहरी जुताई न हो। हल गोल-गोल लगाने के बजाय सीधे नालीनुमा लगाया था।
-मिट्टी को बांध कर रखने वाले पेड़-पौधों को सुरक्षित रखा जाए।
-जंगल में होने वाले पेड़ पौधों का पूरा ज्ञान रखा जाए। जंगल में किन फलों को खाकर जिंदा रहा जा सकता है और किनको नहीं खाना चाहिए।
-पैसे कमाने और सुविधा से ज्यादा जरूरी है सुरक्षा। सुरक्षा को देखते हुए गांव से नीचे बनाए गए खेतों से अनाज ऊपर ढोकर लाना मंजूर किया गया।
-आसपास के जरूरी जंगल को बचा कर रखा जाए। परंपरा में इसके लिए धार्मिक मान्यताओं को बढ़ावा दिया गया। जंगलों को देवताओं, क्षेत्रपाल और आछरियों के नाम किया गया। इन जंगलों के रखरखाव का काम पूरा गांव ही करता था।
विकास ने तोड़ दी परंपराओं की बुनियाद
इन पंरपराओं को विकास की दौड़ ने तिरोहित भी कर दिया। पहाड़ में सड़क ने गांवों की आर्थिकी भी बदली और रहने सोचने का तरीका भी। नदियों को अलाइन कर सड़कें बनी और पैसे कमाने के फेर में लोग गांवों से उतर कर सड़कों के किनारे चले आए। ऋषिकेश से लेकर बदरीनाथ और केदारनाथ तक सारा राजमार्ग नदियों के किनारे हैं और अधिकतर कस्बे भी यहीं बसे।
लोग पहले सड़क के नजदीक आए और फिर सड़क से उतर नदी की गोद में जा पहुंचे। पूरा रामबाड़ा नदी के किनारे बसा हुआ था। नदी के किनारे बारह महीनों न रहने का सबक भुला दिया गया। गांवों के खेतों में पुश्ता लगाने के लिए सीमेंट का कोई उपयोग नहीं होता था। मिट्टी और पत्थर की आधार दीवार बनती थी और इस पर घास और झाड़-झंखाड़ का साम्राज्य हुआ करता था। पत्थर और मिट्टी के इन आधारभूत ढांचों की जगह अब सीमेंट ने ले ली। पानी मिट्टी में बैठने की बजाय बहता हुआ जाता है।
मिट्टी की जल संग्रहण क्षमता को नुकसान हुआ तो कटाव में तेजी आई। नुकसान बढ़ गया और आपदा की भयावहता भी। नदी, नालों और गदेरों में भी पक्के मकान-दुकान बनाने से परहेज नहीं किया जा रहा है। जंगल वन विभाग का हुआ तो लोगों का जंगल से भी नाता टूटा। जंगल अब इमारती लकड़ी का जरिया है। मिट्टी को बांधे रखने वाली किंगोड़, हिंसर, टेमरू, बुरांस, घिंघर आदि साफ हो रहे हैं। अधिक पानी वाली जगहों पर उदीस के पेड़ हुआ करते थे। हर गांव का एक बांज का जंगल होता था। इसकी जगह या तो चीड़ ने ले ली या फिर रेस्टहाउसों ने।
हूटर पर भरोसा करना पड़ा भारी
गोविंदघाट से ही कुछ किलोमीटर आगे की खूबसूरत सी जगह है पांडुकेश्वर। इस गांव में अलकनंदा ने जम कर तबाही मचाई। 16 और 17 जून को लोग अपनी तरफ से सचेत न रहते तो यहां दर्जन भर मकानों के साथ कई लोगों की जान भी जाती। इस गांव के लोगों के मुताबिक नदी का पानी बढ़ने पर गांव के लोगों की पुरानी परंपरा रही है कि सीटी बजाकर एक दूसरे को सचेत किया जाए।
गांव में सीटी तो नहीं बजती पर इस गांव से कुछ दूरी पर अलकनंदा में बने जेपी के बैराज का हूटर जरूर बजता रहा है। लोग इस हूटर के इतने आदी हो चुके हैं कि हूटर न बजे तो आधे लोगों की नींद ही नहीं टूटती। 16-17 जून की रात को यहां जेपी के बैराज का लगा हूटर बजा ही नहीं। भारी बरसात के कारण गांव के लोग खुद ही चौकन्ने थे लिहाजाकिसी तरह से जान बचा पाए।
तीन दिन से बिजली नहीं थी
इलाके में पिछले तीन दिन से बिजली नहीं थी लिहाजा मोबाइल से भी एक दूसरे को खबर नहीं हो पाई। नदी का व्यवहार भी लोग भूल गए। नदी से कितना पानी छोड़ा जाना है कि यह जेपी के बैराज से तय होता था। लिहाजा एक साथ इतना पानी आने की कल्पना किसी ने नहीं की थी। कहना न होगा कि यह इस आपदा में यह बैराज ही बह गया था।
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