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नस-नस में नशा है, तू क्यों नशे में फंसा है

Sat, 13 Jan 2018 12:51 AM IST
विपिन खर्कवाल/अमर उजाला ब्यूरो, ऊध्ामसिंह नगर
विपिन खर्कवाल/अमर उजाला ब्यूरो, ऊध्ामसिंह नगर Updated Sat, 13 Jan 2018 12:51 AM IST
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 Stay away from drugs
kailash kher - फोटो : अमर उजाला

क्रोध, गुस्सा और बेहाली किसके पास नहीं होती। मैं भी इनसे दो चार हुआ हूं, लेकिन अपने अंदर की ऊर्जा को सृजन में लगा दो न यारो! गुस्सा है तो कोई किताब लिख डालो, हालातों से परेशान हो गए हो तो इस पर एक गीत लिख डालो, कोई फिल्म बना डालो। दुनिया को मजबूर कर दो कि वो तुम्हारी काबिलियत की कायल हो जाए। कुछ इस अंदाज में अमर उजाला से विशेष बातचीत में मशहूर गायक कैलाश खेर ने युवाओं को राष्ट्रीय युवा दिवस पर संदेश दिया। उन्होंने उत्तराखंड के युवाओं से जोर देकर कहा कि इस शरीर की नसों में जब पहले से ही काबिलियत का नशा दौड़ रहा है तो तुम क्यों नशे के फेर में पड़कर अपना जीवन बर्बाद कर रहे हो। अपनी ऊर्जा और क्षमताओं को पहचानो और जुट जाओ। नशा हो तो काम का हो, अपनी ऊर्जा के सृजन का हो, अपनी हार से सीखने का हो। कैलाश खेर गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर में युवा दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में अपनी प्रस्तुति देने आए थे। इस कार्यक्रम का मीडिया पार्टनर अमर उजाला है। कैलाश खेर से हुई बातचीत के अंश-

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1- उत्तराखंड के युवाओं को क्या संदेश देंगे?

- नसों में तो पहले से ही नशा है। ऊपर से आप और कुछ ले रहे हैं तो आपका दिमाग फंसा है। इस देवभूमि से सीखिए आप तो सौभाग्यशाली हैं। विचार ऐसा हो कि मुझे गुरु नहीं चाहिए। अपनी ठोकरों, अपमान को अपना गुरु बनाएंगे। उनसे सीखिये कि कहां कमी रह गई, जिसे कल पूरा किया जाएगा। फिर देखिए पूर्णता स्वयं आ जाएगी।
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2- क्या कारण हैं कि कुमाऊंनी और गढ़वाली संगीत उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाया, जहां सूफी, पंजाबी और बांग्ला संगीत पहुंचा है?

 - भाषाओं और बोलियों को मुख्य धारा में लाने के लिए पहले अंग्रेजीकरण को नमस्ते कहना पड़ेगा। युवा कान्वेंट शिक्षा से आकर्षित होता है। किसी और संस्कृति को अपनाना गलत नहीं है। यह संस्कृति के संरक्षण कर्ताओं की विफलता है कि वे युवाओं को भाषा और बोली पर गर्व महसूस कराने में असफल रहे हैं। कान्वेंट और सरकारी शिक्षा के बीच यह चीजें फंसी हुई थीं, युवाओं को अपनी बोली-भाषा, अपनी जमीन को लेकर शर्म का भाव था। लेकिन, अब चीजें बदल रही हैं। हिंदी, उर्दू, संस्कृत, कुमाऊंनी, गढ़वाली को भी तरजीह मिलने लगी है। अभी इस ओर काम शुरू हुआ है। समय लगेगा लेकिन वह दिन आएगा।
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3- एक तरफ बॉलीवुड है दूसरी तरफ कुमाऊंनी और गढ़वाली फिल्में। आप किसी फिल्म या अलबम में कुमाऊंनी गाने गाएं, यह कैसे संभव होगा?

- देखिए आप गंभीर काम करेंगे, जुगाड़बाजी से बचेंगे और सिर्फ मेरे जरिये नैया पार करने से बचेंगे तो मैं काम करने को विवश हो जाऊंगा। मैं ही क्यों अन्य लोग भी आएंगे। हमने कई बार स्कूल, कॉलेज के छात्रों के साथ काम किया है। गंभीर और मौलिक काम के बूते हम कम मानदेय पर भी काम करते हैं। मजमून यह है कि सोच, विषय और इरादे दमदार चाहिए तो काम होगा ही। युवाओं को तो मैं स्वयं भी प्रोत्साहित करने के लिए कटिबद्ध हूं।

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