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मुश्किलों को पार कर राजेंद्र ने पाई मंजिल
दीपक सिंह नेगी/अमर उजाला ब्यूरो, ऊध्ामसिंह नगर
Updated Thu, 04 Jan 2018 12:57 AM IST
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Rajendra dhami
- फोटो : अमर उजाला
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दृढ़ निश्चय से इंसान बड़ी से बड़ी चुनौती को पार कर सकता है। इसे चरितार्थ किया है पिथौरागढ़ के कनालीछीना ब्लॉक के गांव रैकोठ निवासी राजेंद्र धामी ने। कमर से नीचे लकवा ग्रस्त होने के बावजूद राजेंद्र ने हिम्मत नहीं हारी और कड़ी मेहनत के बल पर भारतीय व्हीलचेयर क्रिकेट टीम में जगह बनाई। वह मार्च में होने वाली त्रिकोणीय शृंखला में भारतीय टीम का हिस्सा होंगे।
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राजेंद्र धामी ने बताया कि जब वह ढाई साल के थे, तब लकवे के चलते उनके शरीर के निचले हिस्से ने काम करना बंद कर दिया था। इसके चलते वह कई साल तक स्कूल नहीं गए। गांव के ही पोस्टमैन खीम सिंह बिष्ट के कहने पर पिता महेंद्र सिंह धामी और मां कलावती ने उन्हें सात साल की उम्र में स्कूल भेजना शुरू किया। एमए, बीएड करने के बाद वर्तमान में वह कनालीछीना के एक निजी स्कूल में अध्यापक के पद पर तैनात हैं। इसके अलावा खाली समय में वह तहसील में अरायजनवीस का काम भी करते हैं। उन्होंने बताया कि उनका गांव रैकोठ मोटर मार्ग से करीब सात किमी दूर है। इस कारण उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। सड़क नहीं होने के चलते उन्हें घोड़े के सहारे गांव तक का रास्ता तय करना पड़ता है।
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सचिन तेंदुलकर को आदर्श मानने वाले राजेंद्र ने बताया कि उन्हें बचपन से ही क्रिकेट खेलने का शौक है। बचपन में वह साथियों के साथ घुटनों के बल पर क्रिकेट खेला करते थे। एक एनजीओ की सहायता से उन्हें लखनऊ में क्रिकेट खेलने का मौका मिला। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इससे पहले वह नेपाल में आयोजित अंतरराष्ट्रीय व्हीलचेयर क्रिकेट प्रतियोगिता में भी भाग ले चुके हैं। उन्होंने कहा इंसान को अपनी कमजोरियों का पूरे जज्बे के साथ सामना करना चाहिए। दृढ़ निश्चय और मेहनत से इंसान जो चाहे कर सकता है।
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भाई-बहन ने दिया अक्षर ज्ञान
दिव्यांग होने के चलते परिजनों ने उनका स्कूल में दाखिला नहीं कराया। उन्हें चिंता थी कि वह कहीं गिरकर चोटिल न हो जाए। राजेंद्र को स्कूल नहीं जाने का मलाल रहता था। रोजाना शाम को जब उनके भाई-बहन स्कूल से आते तो वह उनसे पढ़ना-लिखना सीखते थे।