{"_id":"5d4877da8ebc3e6d0806a97a","slug":"now-will-marry-the-son-only-from-kashmir-kashipur-news-hld351813389","type":"story","status":"publish","title_hn":"‘अब तो बेटे की शादी कश्मीर से ही करेंगे’","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
‘अब तो बेटे की शादी कश्मीर से ही करेंगे’
विज्ञापन
सुल्तानपुर पट्टी के ग्राम पिपलिया में खुशी मनाते कश्मीरी पंडित।
- फोटो : KASHIPUR
काशीपुर। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने से ग्राम पिपलिया में बसे करीब 96 परिवारों की आंखों में चमक लौट आई है। खुशी का इजहार करते हुए इन कश्मीरी पंडितों ने मोदी सरकार के इस फैसले को देश के इतिहास का सबसे बड़ा कदम बताया।
कश्मीरी पंडितों का कहना है कि केंद्र सरकार के इस फैसले से अब फिर से उनके रोटी-बेटी के रिश्ते बहाल होंगे। यहां पिपलियां में रह रहे कश्मीरी पंडित हरदेव शर्मा ने कहा कि उनका बेटा अविवाहित है। अब वह कश्मीर से ही अपने बेटे की शादी करना पसंद करेंगे।
आजादी के बाद जम्मू-कश्मीर में पाक परस्त लोगों की ज्यादतियों के चलते बड़ी तादात में कश्मीरी मूल के पंडितों को वहां से पलायन करना पड़ा था। तब पं. गोविंद बल्लभ पंत यूपी संयुक्त प्रांत के प्रधानमंत्री थे। उस समय तराई के जंगलों को काटकर आबाद किया जा रहा था। पंत के बुलावे पर जम्मू के पूंछ, राजौर आदि क्षेत्रों से पलायन करने वाले दर्जनों कश्मीरी परिवारों को तराई की खाम लैंड पर बसाया गया।
विज्ञापन
उन्हें यहां दस-दस एकड़ भूमि आवंटित की गई। अपने सगे रिश्तेदारों को वहीं छोड़कर रोजी-रोटी की तलाश में आए इन परिवारों का अपनी पैतृक भूमि से नाता टूट गया। इसके बाद उन्हें अनुच्छेद 370 के चलते जम्मू-कश्मीर में अपने हक हकूकों से वंचित कर दिया गया।
अपनों से मिलना इनके लिए इतना ही दुष्कर रहा, जैसे विदेश में रहने वाले किसी रिश्तेदार अथवा परिचित से मिलना। करीब 70 बसंत देख चुके वेदप्रकाश शर्मा कहते हैं कि पंजाब और पूर्वी बंगलादेश के बंटवारे की आड़ में कश्मीरी पंडितों पर बहुत जुल्म ढाए गए। वर्ष 1948 में पाक समर्थकों ने उनके घरों को आग लगा दी। उनके परिवार के कई सदस्यों को जला दिया गया। वह उस वक्त अपनी मां की गोद में थे। मां ने पहाड़ी से कूदकर जान बचाई। आज भी उनके नाते रिश्तेदार जम्मू में हैं।
वेदप्रकाश कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के इस कदम ने 70 वर्षों का कलंक धो दिया है। अब उन्हें अपनों से मिलने की आस जागी है। दुर्गा शर्मा (75) भी इस फैसले से बेहद खुश हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए कहा कि यह काम बहुत बड़े कलेजे का था। बलवीर सिंह का कहना है कि इस फैसले से हमारा अधूरा परिवार अब पूरा हो गया है।
चचेरे, फुफेरे, ममेरे भाइयों से मिलने और उनसे रिश्ते रखने की सारी बंदिशें अब खत्म हो गई हैं। इसी तरह कश्मीरी पंडित चमनलाल शर्मा और रमेश चंद्र शर्मा ने इसे एतिहासिक निर्णय बताते हुए कहा कि अब जम्मू-कश्मीर को लेकर किसी के साथ भी धर्म और संप्रदाय का भेदभाव नहीं होगा।
विज्ञापन
कश्मीरी पंडितों का कहना है कि केंद्र सरकार के इस फैसले से अब फिर से उनके रोटी-बेटी के रिश्ते बहाल होंगे। यहां पिपलियां में रह रहे कश्मीरी पंडित हरदेव शर्मा ने कहा कि उनका बेटा अविवाहित है। अब वह कश्मीर से ही अपने बेटे की शादी करना पसंद करेंगे।
विज्ञापन
आजादी के बाद जम्मू-कश्मीर में पाक परस्त लोगों की ज्यादतियों के चलते बड़ी तादात में कश्मीरी मूल के पंडितों को वहां से पलायन करना पड़ा था। तब पं. गोविंद बल्लभ पंत यूपी संयुक्त प्रांत के प्रधानमंत्री थे। उस समय तराई के जंगलों को काटकर आबाद किया जा रहा था। पंत के बुलावे पर जम्मू के पूंछ, राजौर आदि क्षेत्रों से पलायन करने वाले दर्जनों कश्मीरी परिवारों को तराई की खाम लैंड पर बसाया गया।
विज्ञापन
उन्हें यहां दस-दस एकड़ भूमि आवंटित की गई। अपने सगे रिश्तेदारों को वहीं छोड़कर रोजी-रोटी की तलाश में आए इन परिवारों का अपनी पैतृक भूमि से नाता टूट गया। इसके बाद उन्हें अनुच्छेद 370 के चलते जम्मू-कश्मीर में अपने हक हकूकों से वंचित कर दिया गया।
अपनों से मिलना इनके लिए इतना ही दुष्कर रहा, जैसे विदेश में रहने वाले किसी रिश्तेदार अथवा परिचित से मिलना। करीब 70 बसंत देख चुके वेदप्रकाश शर्मा कहते हैं कि पंजाब और पूर्वी बंगलादेश के बंटवारे की आड़ में कश्मीरी पंडितों पर बहुत जुल्म ढाए गए। वर्ष 1948 में पाक समर्थकों ने उनके घरों को आग लगा दी। उनके परिवार के कई सदस्यों को जला दिया गया। वह उस वक्त अपनी मां की गोद में थे। मां ने पहाड़ी से कूदकर जान बचाई। आज भी उनके नाते रिश्तेदार जम्मू में हैं।
वेदप्रकाश कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के इस कदम ने 70 वर्षों का कलंक धो दिया है। अब उन्हें अपनों से मिलने की आस जागी है। दुर्गा शर्मा (75) भी इस फैसले से बेहद खुश हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए कहा कि यह काम बहुत बड़े कलेजे का था। बलवीर सिंह का कहना है कि इस फैसले से हमारा अधूरा परिवार अब पूरा हो गया है।
चचेरे, फुफेरे, ममेरे भाइयों से मिलने और उनसे रिश्ते रखने की सारी बंदिशें अब खत्म हो गई हैं। इसी तरह कश्मीरी पंडित चमनलाल शर्मा और रमेश चंद्र शर्मा ने इसे एतिहासिक निर्णय बताते हुए कहा कि अब जम्मू-कश्मीर को लेकर किसी के साथ भी धर्म और संप्रदाय का भेदभाव नहीं होगा।