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राष्ट्रीय धरोहर घोषित होने से गोविषाण को मिलेगी  विशिष्ट पहचान

Sat, 08 Sep 2018 12:01 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो  काशीपुर।
अमर उजाला ब्यूरो  काशीपुर। Updated Sat, 08 Sep 2018 12:01 AM IST
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Govishan will get special recognition after diclared as National Haritage
काशीपुर में गोविषाण टीला। - फोटो : amar ujala
औद्योगिक एवं धार्मिक नगरी काशीपुर पर्यटन की दृष्टि से समृद्ध है। ऐतिहासिक गोविषाण टीले के उत्खनन में मिले अवशेषों से ज्ञात हुआ है कि गोविषाण क्षेत्र खुद में पांच काल खंडों का इतिहास अपने में समेटे हुए है। हाईकोर्ट के गोविषाण क्षेत्र को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने से इसके विकास की उम्मीद जागी है। साथ ही चैती मेला मंदिर, मोटेश्वर महादेव व द्रोणासागर क्षेत्र को भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग के अधिकार क्षेत्र में दिए जाने से इन धार्मिक स्थलों की पहचान को ख्याति मिलेगी। 
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काशीपुर में महाभारत काल से लेकर सल्तनत काल तक के प्रमाण मौजूद हैं। यदि यहां उत्खनन किया जाए तो मिट्टी में दबी यह विरासत विश्व मानचित्र पर अंकित हो सकती है। काशीपुर से लगभग एक किमी दूर पूर्व की ओर द्रोण सागर टीला है। इतिहास में इसे गोविषाण नाम से जाना जाता है। ये दो शब्दो गो (गाय) और विषाण (सींग) से बना है। इसका अर्थ गाय का सींग है। प्राचीन समय में गोविषाण को तत्कालीन समय की राजधानी व समृद्ध नगर कहा गया है। सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अपनी भारत यात्रा के दौरान इस स्थान का वर्णन किया है। वर्ष-2002 में पुरातत्व विभाग के अधीक्षक धर्मवीर शर्मा के निर्देशन में इस स्थान का उत्खनन कार्य कराया गया।
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गौराया पेपर मिल की ओर उत्तरी भाग वाले हिस्से में, किले के बीच में और किले के दक्षिण भाग वाले हिस्से में उत्खनन हुआ। इसके अलावा किले से बाहर चैती मोड़ पर जागेश्वर मंदिर के पास व डमरू वाले बाबा के पीछे भी उत्खनन किया गया। इन स्थानों पर कराए गए उत्खनन में महाभारत काल, कुषाण काल, गुप्त काल व सल्तनत काल के अवशेष मिले हैं। गौराया मिल की तरफ किले की 12 फुट मोटी सुंदर दीवार मिली तो दक्षिणी भाग में किले के अवशेष मिले। जागेश्वर मंदिर के पास खुदाई में मिले अवशेष दर्शनीय है।
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इसका ढांचा देखने में स्तूप जैसा है। आठ फुट लंबे और आठ फुट चौड़े गर्भगृह को पुरातत्वविद् मंदिर मानते हैं। डमरु वाले बाबा के पीछे भी उत्खनन में एक और मंदिर के अवशेष मिले हैं। यहां मिले स्मारक एक राजनैतिक केंद्र की ओर संकेत करते हैं। उत्खनन के दौरान मिले विभिन्न सभ्यताओं के बर्तनों, घरेलू उपयोग की चीजों, धातु के आभूषणों से यहां मानव जीवन होने के संकेत मिले हैं। जानकार मानते हैं कि इस ऐतिहासिक स्थल का उत्खनन करा यहां की संस्कृति व सभ्यता को उजागर किया जा सकता है। इससे काशीपुर को विकसित पर्यटन स्थल का मुकाम मिल सकता है। 


उत्खनन में निकला आठवीं शताब्दी का शिवलिंग   
काशीपुर। जागेश्वर मंदिर की खुदाई के दौरान आठवीं शताब्दी का अनूठा शिवलिंग भी निकला। इसे गन्ना संस्थान के सामने एक छोटे से मंदिर में स्थापित कर दिया गया। शिवलिंग के मानकीकरण का कार्य आठवीं से दसवीं शताब्दी के बीच प्रतिहार राजाओं, गूजर्जों और चंदेलों के बीच किया गया था। 1861 में जब पुरातत्वविद् कनिंघम काशीपुर आए तो उन्होंने खड़कपुर में दो और क्षेत्र में 14 टीले होने का वर्णन किया।  
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