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Udham Singh Nagar News: 35 साल बाद फर्जीवाड़े का पर्दाफाश
Sat, 29 Jul 2023 11:48 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊधम सिंह नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊधम सिंह नगर
Updated Sat, 29 Jul 2023 11:48 PM IST
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रईस अहमद
जसपुर। विवाह से पूर्व सीडीपीओ लक्ष्मी टम्टा का नाम लक्ष्मी पंत था। उनका विवाह 1982 में अनूसूचित जाति के मुकेश टम्टा से हुआ तो उन्होंने अपना नाम लक्ष्मी टम्टा रख लिया और अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र बनवाकर नौकरी पा ली।
आठ अप्रैल 1988 में उत्तर प्रदेश के समय बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार निदेशालय से लक्ष्मी टम्टा की मुख्य सेविका (सुपरवाइजर) के पद तैनाती हुई थी। उत्तराखंड गठन के तीन वर्ष बाद वर्ष 2003 में बाल विकास परियोजना (सीडीपीओ) के पद पर टम्टा की पदोन्नति भी हो गई। शिकायत पर जांच उपरांत वर्ष 2019 के सितंबर में तत्कालीन विभागीय निदेशक झरना कमठान ने सीडीपीओ को निलंबित कर दिया। इसे चैलेंज करते हुए 2023 के फरवरी में टम्टा ने फिर से नौकरी ज्वाइन कर ली। एडीएम नजूल की रिपोर्ट पर निदेशक ने टम्टा को फिर से निलंबित कर दिया। अप्रैल में वह अपनी 31 वर्ष की नौकरी भी पूर्ण कर चुकी हैं। 31 जुलाई को उनका रिटायरमेंट था। लक्ष्मी ने कभी सोचा भी नही होगा कि रिटायरमेंट से चंद तीन दिन पहले 70 साल की उम्र में उनकी किस्मत के सितारे इस तरह गर्त में चले जाएंगे।
विवाह करने पर नही मिलता अनुसूचित जाति का लाभ
जसपुर। उत्तर प्रदेश के शासनादेश संख्या 22-39,1984 में स्पष्ट है कि यदि कोई सवर्ण स्त्री किसी अनुसूचित जाति, जनजाति के पुरुष से विवाह करती है, तो उस स्त्री को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। इसी कानून के तहत लक्ष्मी टम्टा फंस गईं। उन्होंने अपने पति के अनुसूचित जाति का होने का लाभ लिसा लेकिन कानून की नजर में यह जुर्म साबित हुआ।
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कार्रवाई पूर्ण होने में लगे सात साल
जसपुर। छह जनवरी 2016 की शिकायत पर महिला सशक्तीकरण एवं बाल विकास के निदेशक ने ऊधम सिंह नगर के सीडीओ से प्रकरण की जांच के लिए कहा था। सीडीपीओ का मूूल निवास अल्मोड़ा के दन्यां गांव में होने से सीडीओ ऊधमसिंह नगर को कई पत्र भेजने के बाद भी जांच में सहयोग नहीं मिला। तब निदेशक ने सीधे डीएम अल्मोड़ा को निर्देशित कर प्रकरण की जांच के लिए लिखा। अल्मोड़ा डीएम की जांच में मामला पूरी तरह उजागर हो गया। अधिकारियों की इस पत्राचार कार्रवाई में सात साल लग गए।
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जसपुर। विवाह से पूर्व सीडीपीओ लक्ष्मी टम्टा का नाम लक्ष्मी पंत था। उनका विवाह 1982 में अनूसूचित जाति के मुकेश टम्टा से हुआ तो उन्होंने अपना नाम लक्ष्मी टम्टा रख लिया और अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र बनवाकर नौकरी पा ली।
आठ अप्रैल 1988 में उत्तर प्रदेश के समय बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार निदेशालय से लक्ष्मी टम्टा की मुख्य सेविका (सुपरवाइजर) के पद तैनाती हुई थी। उत्तराखंड गठन के तीन वर्ष बाद वर्ष 2003 में बाल विकास परियोजना (सीडीपीओ) के पद पर टम्टा की पदोन्नति भी हो गई। शिकायत पर जांच उपरांत वर्ष 2019 के सितंबर में तत्कालीन विभागीय निदेशक झरना कमठान ने सीडीपीओ को निलंबित कर दिया। इसे चैलेंज करते हुए 2023 के फरवरी में टम्टा ने फिर से नौकरी ज्वाइन कर ली। एडीएम नजूल की रिपोर्ट पर निदेशक ने टम्टा को फिर से निलंबित कर दिया। अप्रैल में वह अपनी 31 वर्ष की नौकरी भी पूर्ण कर चुकी हैं। 31 जुलाई को उनका रिटायरमेंट था। लक्ष्मी ने कभी सोचा भी नही होगा कि रिटायरमेंट से चंद तीन दिन पहले 70 साल की उम्र में उनकी किस्मत के सितारे इस तरह गर्त में चले जाएंगे।
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विवाह करने पर नही मिलता अनुसूचित जाति का लाभ
जसपुर। उत्तर प्रदेश के शासनादेश संख्या 22-39,1984 में स्पष्ट है कि यदि कोई सवर्ण स्त्री किसी अनुसूचित जाति, जनजाति के पुरुष से विवाह करती है, तो उस स्त्री को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। इसी कानून के तहत लक्ष्मी टम्टा फंस गईं। उन्होंने अपने पति के अनुसूचित जाति का होने का लाभ लिसा लेकिन कानून की नजर में यह जुर्म साबित हुआ।
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कार्रवाई पूर्ण होने में लगे सात साल
जसपुर। छह जनवरी 2016 की शिकायत पर महिला सशक्तीकरण एवं बाल विकास के निदेशक ने ऊधम सिंह नगर के सीडीओ से प्रकरण की जांच के लिए कहा था। सीडीपीओ का मूूल निवास अल्मोड़ा के दन्यां गांव में होने से सीडीओ ऊधमसिंह नगर को कई पत्र भेजने के बाद भी जांच में सहयोग नहीं मिला। तब निदेशक ने सीधे डीएम अल्मोड़ा को निर्देशित कर प्रकरण की जांच के लिए लिखा। अल्मोड़ा डीएम की जांच में मामला पूरी तरह उजागर हो गया। अधिकारियों की इस पत्राचार कार्रवाई में सात साल लग गए।