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बैमोसमी धान से किसानों का हुआ मोहभंग, मक्के की फसल को बनाया विकल्प
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काशीपुर में मक्का की फसल की प्रदशनी।
- फोटो : KASHIPUR
तराई में किसानों का बेमौसमी धान से मोहभंग होता जा रहा है। इसकी तस्दीक मक्के के बढ़ते रकबे ने की है। 2017 की तुलना में वर्तमान में मक्का का क्षेत्रफल बढ़कर 18 सौ हेक्टेयर हो गया है। इतना ही नहीं इस साल मक्का की अच्छी फसल भी हुई है। लेकिन लॉकडाउन से मक्का खरीदने वाले कारखाने ठीक से नहीं चले। जिससे मक्का का वाजिब मूल्य नहीं मिला है।
कृषि विज्ञान केंद्र प्रभारी कृषि वैज्ञानिक डॉ. जितेंद्र क्वात्रा ने कहा कि मक्का की फसल गर्मियों में उगाए जाने वाले धान का सही लाभदायक विकल्प है। इसलिए किसानों का रुझान गर्मियों में धान के बजाए मक्का की फसल उगाने में है। लगातार धान की खेती से तराई क्षेत्र में मिट्टी की उत्पादकता और पानी के जलस्तर में कमी आ रही है। मिट्टी से मिथेन गैस का अधिक उत्सर्जन होने से वायु मंडल को क्षति हो रही है। मिट्टी की सतह भी कड़ी हो रही है।
खरीफ की फसल में धान में कीड़े एवं बीमारियों का अधिक प्रकोप देखा गया है। इसी के चलते कृषि विज्ञान केंद्र काशीपुर एवं कृषि विभाग ने जिले में गर्मी में मक्का की फसल बुआई को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2018 से जिले के विभिन्न क्षेत्रों में प्रदर्शनी एवं किसानों को प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए। नतीजन मक्का के क्षेत्रफल में बढ़ोतरी हुई है।
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इसका मुख्य कारण मक्का की लागत में कमी का होना है। डॉ. क्वात्रा ने कहा कि ग्रीष्मकालीन धान की अपेक्षा मक्का की लागत में 25 प्रतिशत तक कमी आई है और मक्का की खेती से 40 प्रतिशत तक शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ। 40 प्रतिशत तक पानी की बचत हुई है। मक्का का रकबा वर्ष 2017 में कुल 450 हेक्टेयर था। जो अब बढ़कर 1800 हेक्टेयर है। किसान जागरूक हो गया। इसलिए गर्मी के धान के क्षेत्रफल में लगभग 2000 हेक्टेयर की कमी हुई है। इसकी वजह मक्का का उत्पादन धान के बराबर ही प्रति एकड़ 35 क्विंटल है।
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कृषि विज्ञान केंद्र प्रभारी कृषि वैज्ञानिक डॉ. जितेंद्र क्वात्रा ने कहा कि मक्का की फसल गर्मियों में उगाए जाने वाले धान का सही लाभदायक विकल्प है। इसलिए किसानों का रुझान गर्मियों में धान के बजाए मक्का की फसल उगाने में है। लगातार धान की खेती से तराई क्षेत्र में मिट्टी की उत्पादकता और पानी के जलस्तर में कमी आ रही है। मिट्टी से मिथेन गैस का अधिक उत्सर्जन होने से वायु मंडल को क्षति हो रही है। मिट्टी की सतह भी कड़ी हो रही है।
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खरीफ की फसल में धान में कीड़े एवं बीमारियों का अधिक प्रकोप देखा गया है। इसी के चलते कृषि विज्ञान केंद्र काशीपुर एवं कृषि विभाग ने जिले में गर्मी में मक्का की फसल बुआई को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2018 से जिले के विभिन्न क्षेत्रों में प्रदर्शनी एवं किसानों को प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए। नतीजन मक्का के क्षेत्रफल में बढ़ोतरी हुई है।
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इसका मुख्य कारण मक्का की लागत में कमी का होना है। डॉ. क्वात्रा ने कहा कि ग्रीष्मकालीन धान की अपेक्षा मक्का की लागत में 25 प्रतिशत तक कमी आई है और मक्का की खेती से 40 प्रतिशत तक शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ। 40 प्रतिशत तक पानी की बचत हुई है। मक्का का रकबा वर्ष 2017 में कुल 450 हेक्टेयर था। जो अब बढ़कर 1800 हेक्टेयर है। किसान जागरूक हो गया। इसलिए गर्मी के धान के क्षेत्रफल में लगभग 2000 हेक्टेयर की कमी हुई है। इसकी वजह मक्का का उत्पादन धान के बराबर ही प्रति एकड़ 35 क्विंटल है।