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इस्लाम की बुनियाद में से एक है जकात

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Mon, 03 May 2021 12:13 AM IST
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Cultural activities.
बेशक अल्लाह तआला ने जकात को इस्लाम की बुनियादों में से एक बुनियाद करार दिया है। अल्लाह का फरमान है कि नमाज कायम रखने के साथ ही जकात अदा करें। अल्लाह के नबी अलैहिस्सलाम फरमाते हैं कि इस्लाम की बुनियाद पांच चीजों पर है। इनमें अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं है।
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मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहह वसल्लम अल्लाह के बंदे और रसूल हैं। नमाज कायम करना, जकात अदा करना, माहे रमजान में रोजे रखना और हज करना माना गया है।
जामा मस्जिद के खतीब मौलाना मो. कासिम मिस्वाही बताते हैं कि अल्लाह तआला फरमाता है जकात अदा करने वाले की रोजी में कभी कमी नहीं आएगी। नबी अलैहिस्सलाम ने फरमाया जिसने अपने माल की जकात दी तो बेशक अल्लाह तआला ने उससे शर, (बुराई) से दूर फरमा दिया।
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बताया कि जिसके पास साढ़े 52 तोला चांदी यानी 653.183 मिली ग्राम चांदी हो या साढ़े सात तोला सोना यानी (93.332मिली ग्राम) हो या 653.183 मिली ग्राम के बराबर रुपये हों या फिर सोना, चांदी और पैसों को मिलाकर साढ़े 52 तोला चांदी के बराबर माल पर जकात वाजिब है। अल्लाह ताला फरमाता है सोना चांदी जमा कर जकात न देने वालों परेशानियां रहेंगी और जहन्नम की आग में तपाए जाएंगे।
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-इन पर जकात वाजिब
मुसलमान, अक्लमंद और बालिग।
मालिक-ए-निसाब (मालदार)।
सोने-चांदी पर जकात वाजिब है
माल व नगदी पर कब्जा हो।
बैंक में जमा धनराशि पर वाजिब।
-इन पर जकात वाजिब नहीं।
नाबालिग और मानसिक रूप से बीमार।
कर्जदार, जो कर्ज में डूबा हो।
गिरवीं रखे सामान पर जकात नहीं देनी।
-जकात के हकदार।
गरीब, विधवाओं और यतीमों को जकात दें।
गरीब रिश्तेदारों को भी जकात दी जा सकती है।
दीनी मदरसों में जकात दी जा सकती है।
फकीर, मिस्कीन व मोहताज को जकात दी जा सकती है।
मुसाफिर को जकात देना वाजिब है।
-इन्हें जकात देना जायज नहीं।
सय्यद (आले रसूल) को नहीं दी जा सकती।
मां-बाप व बेटा-बेटी को जकात नहीं दी जा सकती।
मस्जिद के इमाम या मुअज्जिन की तनख्वाह।
एतकाफ में दो हज और दो उमरे का सवाब
अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहो तआला अलैहवसल्लम रमजान के तीसरे अशरे (आखिरी दस दिन) में एतकाफ करते थे। नबी ने फरमाया कि एतकाफ करने वाला गुनाहों से दूर रहता है और नेकियों के साथ बेहिसाब सवाब मिलता है। एतकाफ करने वाले को दो हज और दो उमरे का सवाब मिलता है।

एतकाफ तीन तरह का होता है। सुन्नते मुअक्कदा, जो रमजान के तीसरे अशरे में होता है। इसके अलावा मुस्तहब एतकाफ व सुन्नते गैर मुअक्कदा और को किसी वक्त में किया जा सकता है और तीसरा वाजिब, जो मन्नत मांगने पर किया जाता है।
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