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तीन सौ एकड़ से अधिक वन भूमि पर अवैध कब्जा
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सितारगंज बाराकोली जंगल में अरविंदनगर सीमा पर अवैध रूप से कब्जाई गई वन भूमि।
- फोटो : SITARGANJ
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बाराकोली वन क्षेत्र की करीब तीन सौ एकड़ से अधिक जमीन पर अवैध कब्जे का मामला प्रकाश में आया है। गांव के लोगों ने वन भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए रेंजर के माध्यम से प्रभागीय वनाधिकारी को शिकायती पत्र भेजा। कहा कि यदि मामले में सप्ताह भर के भीतर कार्रवाई न की गई तो वह हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करेंगे।
ब्लॉक क्षेत्र की अरविंदनगर ग्रामसभा के सुखरंजन विश्वास, जयदेव दास और देवदास मंडल ने तराई पूर्वी वन प्रभाग के डीएफओ को लिखे पत्र में कहा है कि हाईकोर्ट की ओर से राज्य के सभी विभागों को अपनी-अपनी भूमि अतिक्रमण मुक्त कराने के आदेश हैं। लेकिन वन विभाग की ओर से अरविंदनगर ग्रामसभा की सीमा पर स्थित नर्सरी, सात, आठ व नौ नंबर गांव में बाहरी लोगों की ओर से अवैध तरीके से कब्जाई गई करीब तीन सौ एकड़ से अधिक भूमि को अतिक्रमण मुक्त नहीं कराया गया है।
आरोप लगाया कि वन भूमि से अतिक्रमण न हटाने से वहां काबिज लोग वन संपदा को क्षति पहुंचा रहे हैं। यहां तक कि कब्जेदार वन भूमि पर खेती भी कर रहे हैं, जो वन्य जीवों और पर्यावरण के लिए हानिकारक है। वन भूमि पर पक्के निर्माण भी खड़े कर दिए हैं। कच्चे और पक्के मकान बनने से अब यह क्षेत्र आबादी में बदलने लगा है।
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उन्होंने कहा कि अतिक्रमण हटाने को लेकर पूर्व में कई बार पत्राचार किया गया लेकिन अभी तक कोई सुनवाई नहीं हुई। वन विभाग की ओर से कार्रवाई न करना हाईकोर्ट के आदेश की अवमानना की श्रेणी में आता है। सप्ताह भर के भीतर कार्रवाई न की गई तो वे हाईकोर्ट की शरण लेंगे और विभाग की ओर से की जा रही आदेश की अवहेलना को न्यायालय के समक्ष रखते हुए याचिका दायर करेंगे। इधर, इस संबंध में रेंजर जितेंद्र प्रसाद डिमरी से उनका पक्ष जानने के लिए फोन किया गया तो उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया।
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ब्लॉक क्षेत्र की अरविंदनगर ग्रामसभा के सुखरंजन विश्वास, जयदेव दास और देवदास मंडल ने तराई पूर्वी वन प्रभाग के डीएफओ को लिखे पत्र में कहा है कि हाईकोर्ट की ओर से राज्य के सभी विभागों को अपनी-अपनी भूमि अतिक्रमण मुक्त कराने के आदेश हैं। लेकिन वन विभाग की ओर से अरविंदनगर ग्रामसभा की सीमा पर स्थित नर्सरी, सात, आठ व नौ नंबर गांव में बाहरी लोगों की ओर से अवैध तरीके से कब्जाई गई करीब तीन सौ एकड़ से अधिक भूमि को अतिक्रमण मुक्त नहीं कराया गया है।
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आरोप लगाया कि वन भूमि से अतिक्रमण न हटाने से वहां काबिज लोग वन संपदा को क्षति पहुंचा रहे हैं। यहां तक कि कब्जेदार वन भूमि पर खेती भी कर रहे हैं, जो वन्य जीवों और पर्यावरण के लिए हानिकारक है। वन भूमि पर पक्के निर्माण भी खड़े कर दिए हैं। कच्चे और पक्के मकान बनने से अब यह क्षेत्र आबादी में बदलने लगा है।
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उन्होंने कहा कि अतिक्रमण हटाने को लेकर पूर्व में कई बार पत्राचार किया गया लेकिन अभी तक कोई सुनवाई नहीं हुई। वन विभाग की ओर से कार्रवाई न करना हाईकोर्ट के आदेश की अवमानना की श्रेणी में आता है। सप्ताह भर के भीतर कार्रवाई न की गई तो वे हाईकोर्ट की शरण लेंगे और विभाग की ओर से की जा रही आदेश की अवहेलना को न्यायालय के समक्ष रखते हुए याचिका दायर करेंगे। इधर, इस संबंध में रेंजर जितेंद्र प्रसाद डिमरी से उनका पक्ष जानने के लिए फोन किया गया तो उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया।