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धरती मां का सपूत था युद्ध में नहीं हटा पीछे बृजांनद
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शहीद बृजानंद। (फाइल फोटो)
- फोटो : SITARGANJ
सितारगंज। कल की ही बात लगती है जब बृजानंद सेना में भर्ती हुए थे। देश सेवा करते हुए बेटे के सिर पर सेहरा भी सजाया। बहू और बेटे की जोड़ी देख दिल की सारी हसरतें पूरी हो गईं। लगा अब दोनोें का एक नया संसार बसेगा।
घर के आंगन में किलकारियां गूंजेगी लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। फिर एक दिन ऐसा आया जिसने सारी खुशियों को मातम में बदल दिया। अपने दिल के दर्द को बताते-बताते बृजानंद की मां पानमती भावुक हो जाती हैं।
शहर से सटे पूर्वांचल बहुल गांव लौका में गामा प्रसाद और उनकी पत्नी पानमती अपने पांच बेटों के साथ रहते थे, जिनमें तीसरे नंबर के बृजानंद थे। इंटरमीडिएट की पढ़ाई के बाद 22 नवंबर 2004 को बृजानंद सीआरपीएफ की 62 बटालियन में कांस्टेबल पद पर भर्ती हुए। बेटे की उपलब्धि पर माता-पिता और भाई खुशी से फूले नहीं समाए। धीरे-धीरे समय बीता तो मां पानमती ने बेटे की शादी का ख्वाब संजोया।
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मां की तलाश सलेमपुर जिला देवरिया (यूपी) निवासी अंजू पर जाकर रुकी और दो दिसंबर 2009 को अंजू और बृजानंद का विवाह हो गया। विवाह के 15 दिन बाद ही बृजानंद अपनी यूनिट पर चले गए। इसके बाद सीधे होली पर घर पहुंचे। एक माह की छुट्टी बिताने के बाद वह दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) पहुंचे। अपने आंसु पोंछते हुए पानमती कहती हैं कि तीन अप्रैल 2010 को उनकी अपने लाल से आखिरी बार बात हुई थी।
इस दौरान बृजानंद ने उन्हें बताया कि वह लालगंज दंतेवाड़ा के जंगल में है और यदि फोन न लगे तो वह परेशान न हों। जैसे ही सिग्नल मिलेंगे तो वह खुद फोन करेंगे। पानमती आज भी वह दिन याद करके फफक पड़ती हैं जब नियति ने उनसे उनके जिगर का टुकड़ा हमेशा के लिए छीन लिया।
तीन-चार दिन बाद बृजानंद के नकुलिया गांव निवासी साथी जवान घर पहुंचे। उन्होंने बताया कि छह अप्रैल 2010 को नक्सलियों के हमले में 76 सीआरपीएफ जवान शहीद हो गए, जिनमें बृजानंद भी शामिल थे। बृजानंद की शहादत की खबर सुनते ही घर में कोहराम मच गया।
पानमती कहती हैं हिम्मत कर घर के साथ ही बहू को संभाला। बेटे के जाने के बाद कोशिश की कि बहू अंजू को वहीं प्यार और सम्मान दें सकें जो बेटा दिया करता था। कुछ समय बाद उन्होंने अंजू का विवाह अपने छोटे बेटे कृष्णानंद से कर उसकी गृहस्थी को दोबारा बसाया।
इनसेट
शासन की अनदेखी से आहत हैं पानमती
पानमती कहती हैं कि जब बेटा शहीद हुआ तो मंत्रियों से लेकर क्षेत्रीय नेता तक उनके घर पहुंचे थे। शासन की ओर से बृजानंद के नाम से डेढ़ किमी सड़क बनवाने, लौका गांव में शहीद द्वार और गांव में राजकीय हाईस्कूल का नाम शहीद बृजानंद हाईस्कूल करने की घोषणा की गई थी। नौ साल बीतने के बाद भी न तो स्कूल का नाम बेटे के नाम पर रखा गया और न ही सड़क का नाम ही उसके नाम से जोड़ा गया। गांव में बृजानंद के नाम से मुख्य द्वार बनने का सपना तो बस सपना ही रह गया। बताती हैं कि शहीद बेटे बृजानंद को किसी भी सरकार से सम्मान नहीं मिल सका।
इनसेट
मां ने खुद बनाया बेटे की याद में समाधि स्थल
पानमती कहती हैं बेटे को अपनी आंखों से रोज देख सकूं, इसके लिए घर के पास बृजानंद की समाधि बनवाई। कहती हैं रोजाना सुबह मां दुर्गा की पूजा के बाद बेटे की समाधि पर धुनी लगाकर ईश्वर से उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करती हूं। उन्हें अपने लाल की शहादत पर गर्व है।
इनसेट
बृजानंद की शहादत के बाद भी अंजू ने नहीं हारी हिम्मत
नक्सली हमले में पति को खोने के बाद भी अंजू ने हिम्मत नहीं हारी और आज देश की सेवा कर रही हैं। मृतक आश्रित के रूप में अंजू को सीआरपीएफ में नौकरी मिली। वर्तमान में वह रांची में एएसआई के पद पर तैनात हैं। बृजानंद के भाई से शादी के बाद अंजू के दो बेटे हैं। अंजू कहती हैं कि वह अपने दोनों बेटों को फौज में उच्चाधिकारी बनाना चाहती हैं। ब्यूरो
सफरनामा
दंतेवाड़ा नक्सली हमले में शहीद बृजानंद सागर का जन्म तीन मई 1982 को हुआ था। वर्ष 2003 में इंटरमीडिएट की शिक्षा ग्रहण की। फिर 25 नवंबर 2004 को 62 बटालियन सीआरपीएफ में कांस्टेबल के पद पर भर्ती हो गए। पांच वर्ष चार माह 11 दिन तक देश की रक्षा करने के बाद छह अप्रैल 2010 को शहीद हो गए।
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घर के आंगन में किलकारियां गूंजेगी लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। फिर एक दिन ऐसा आया जिसने सारी खुशियों को मातम में बदल दिया। अपने दिल के दर्द को बताते-बताते बृजानंद की मां पानमती भावुक हो जाती हैं।
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शहर से सटे पूर्वांचल बहुल गांव लौका में गामा प्रसाद और उनकी पत्नी पानमती अपने पांच बेटों के साथ रहते थे, जिनमें तीसरे नंबर के बृजानंद थे। इंटरमीडिएट की पढ़ाई के बाद 22 नवंबर 2004 को बृजानंद सीआरपीएफ की 62 बटालियन में कांस्टेबल पद पर भर्ती हुए। बेटे की उपलब्धि पर माता-पिता और भाई खुशी से फूले नहीं समाए। धीरे-धीरे समय बीता तो मां पानमती ने बेटे की शादी का ख्वाब संजोया।
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मां की तलाश सलेमपुर जिला देवरिया (यूपी) निवासी अंजू पर जाकर रुकी और दो दिसंबर 2009 को अंजू और बृजानंद का विवाह हो गया। विवाह के 15 दिन बाद ही बृजानंद अपनी यूनिट पर चले गए। इसके बाद सीधे होली पर घर पहुंचे। एक माह की छुट्टी बिताने के बाद वह दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) पहुंचे। अपने आंसु पोंछते हुए पानमती कहती हैं कि तीन अप्रैल 2010 को उनकी अपने लाल से आखिरी बार बात हुई थी।
इस दौरान बृजानंद ने उन्हें बताया कि वह लालगंज दंतेवाड़ा के जंगल में है और यदि फोन न लगे तो वह परेशान न हों। जैसे ही सिग्नल मिलेंगे तो वह खुद फोन करेंगे। पानमती आज भी वह दिन याद करके फफक पड़ती हैं जब नियति ने उनसे उनके जिगर का टुकड़ा हमेशा के लिए छीन लिया।
तीन-चार दिन बाद बृजानंद के नकुलिया गांव निवासी साथी जवान घर पहुंचे। उन्होंने बताया कि छह अप्रैल 2010 को नक्सलियों के हमले में 76 सीआरपीएफ जवान शहीद हो गए, जिनमें बृजानंद भी शामिल थे। बृजानंद की शहादत की खबर सुनते ही घर में कोहराम मच गया।
पानमती कहती हैं हिम्मत कर घर के साथ ही बहू को संभाला। बेटे के जाने के बाद कोशिश की कि बहू अंजू को वहीं प्यार और सम्मान दें सकें जो बेटा दिया करता था। कुछ समय बाद उन्होंने अंजू का विवाह अपने छोटे बेटे कृष्णानंद से कर उसकी गृहस्थी को दोबारा बसाया।
इनसेट
शासन की अनदेखी से आहत हैं पानमती
पानमती कहती हैं कि जब बेटा शहीद हुआ तो मंत्रियों से लेकर क्षेत्रीय नेता तक उनके घर पहुंचे थे। शासन की ओर से बृजानंद के नाम से डेढ़ किमी सड़क बनवाने, लौका गांव में शहीद द्वार और गांव में राजकीय हाईस्कूल का नाम शहीद बृजानंद हाईस्कूल करने की घोषणा की गई थी। नौ साल बीतने के बाद भी न तो स्कूल का नाम बेटे के नाम पर रखा गया और न ही सड़क का नाम ही उसके नाम से जोड़ा गया। गांव में बृजानंद के नाम से मुख्य द्वार बनने का सपना तो बस सपना ही रह गया। बताती हैं कि शहीद बेटे बृजानंद को किसी भी सरकार से सम्मान नहीं मिल सका।
इनसेट
मां ने खुद बनाया बेटे की याद में समाधि स्थल
पानमती कहती हैं बेटे को अपनी आंखों से रोज देख सकूं, इसके लिए घर के पास बृजानंद की समाधि बनवाई। कहती हैं रोजाना सुबह मां दुर्गा की पूजा के बाद बेटे की समाधि पर धुनी लगाकर ईश्वर से उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करती हूं। उन्हें अपने लाल की शहादत पर गर्व है।
इनसेट
बृजानंद की शहादत के बाद भी अंजू ने नहीं हारी हिम्मत
नक्सली हमले में पति को खोने के बाद भी अंजू ने हिम्मत नहीं हारी और आज देश की सेवा कर रही हैं। मृतक आश्रित के रूप में अंजू को सीआरपीएफ में नौकरी मिली। वर्तमान में वह रांची में एएसआई के पद पर तैनात हैं। बृजानंद के भाई से शादी के बाद अंजू के दो बेटे हैं। अंजू कहती हैं कि वह अपने दोनों बेटों को फौज में उच्चाधिकारी बनाना चाहती हैं। ब्यूरो
सफरनामा
दंतेवाड़ा नक्सली हमले में शहीद बृजानंद सागर का जन्म तीन मई 1982 को हुआ था। वर्ष 2003 में इंटरमीडिएट की शिक्षा ग्रहण की। फिर 25 नवंबर 2004 को 62 बटालियन सीआरपीएफ में कांस्टेबल के पद पर भर्ती हो गए। पांच वर्ष चार माह 11 दिन तक देश की रक्षा करने के बाद छह अप्रैल 2010 को शहीद हो गए।