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पटाखे छोड़ें तो बरतें सावधानी
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डॉ. मणिंद्र मोहन शर्मा, वैज्ञानिक, उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद।
- फोटो : RUDRAPUR
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पंतनगर। रोशनी के पर्व दीपावली पर यदि आप पटाखे छोड़ें तो सावधानी बरतें। पटाखा जलाते समय मामूली असावधानी जीवन पर भारी पड़ सकती है। मनुष्य ही नहीं पेड़, पौधे, पक्षी और जानवर भी पटाखों के प्रदूषण और शोर से अछूते नहीं रह पाते। कुत्ते और बिल्ली जैसे जानवरों की सुनने की क्षमता मनुष्यों से तेज होती है, इसलिए इन्हें पटाखों की आवाज से अधिक नुकसान पहुंचता है।
जैव प्रौद्योगिकी परिषद के वैज्ञानिक डॉ. मणिंद्र मोहन शर्मा के अनुसार शोध बताते हैं कि पटाखों से ओजोन परत को भी नुकसान पहुंचता है। कई बार आतिशबाजी से निकला धुआं वायुमंडल में घूमता रहता है, जो अस्थमा के रोगियों के लिए घातक साबित होता है। वैज्ञानिक तथ्य है कि 80 डेसीबल से ज्यादा का शोर मनुष्यों के कानों को नुकसान पहुंचाता है। दो लोगों के बीच बातचीत के दौरान लगभग 45 डेसीबल की ध्वनि होती है। 55 डेसीबल से ज्यादा ध्वनि से शोर शुरू हो जाता है। 80 डेसीबल से ज्यादा शोर मनुष्यों और जीव-जंतुओं के लिए नुकसानदायक साबित होता है। हालांकि, पटाखों की ध्वनि अक्सर 65 डेसीबल से ज्यादा होती है। पटाखों की तेज ध्वनि बारूद के महीन कणों से पशु-पक्षियों व इंसानो में बहरापन, नाक व कान की विभिन्न बीमारियों का कारण बनता है। पटाखों में मुख्य रसायन कॉपर, लेड, कैडमियम, मैग्नीशियम, सोडियम, जिंक व नाइट्रेट इत्यादि के मिश्रण पाए जाते हैं। जिनसे श्वांस, गुर्दे एवं हार्ट अटैक जैसी बीमारियों के होने की संभावना बढ़ जाती है और अस्थमा व श्वास के मरीजों के लिए बेहद खतरनाक साबित होता है। इसलिए दीवाली पर पटाखे कम और दीये ज्यादा से ज्यादा जलाएं।
इनसेट में
एक दीया उनकी याद में
पंतनगर। उत्तराखंड ने इस साल आपदा की जो वेदना झेली है, उसके घाव आसानी से नहीं भरे जा सकते। हजारों लोग आपदा और अतिवृष्टि के शिकार हो गए। कई घरों में इस साल दिवाली नहीं मनेगी। जो लोग अचानक हमारे बीच से चले गए, उनकी याद में भी एक दीप जरूर जलाएं।
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जैव प्रौद्योगिकी परिषद के वैज्ञानिक डॉ. मणिंद्र मोहन शर्मा के अनुसार शोध बताते हैं कि पटाखों से ओजोन परत को भी नुकसान पहुंचता है। कई बार आतिशबाजी से निकला धुआं वायुमंडल में घूमता रहता है, जो अस्थमा के रोगियों के लिए घातक साबित होता है। वैज्ञानिक तथ्य है कि 80 डेसीबल से ज्यादा का शोर मनुष्यों के कानों को नुकसान पहुंचाता है। दो लोगों के बीच बातचीत के दौरान लगभग 45 डेसीबल की ध्वनि होती है। 55 डेसीबल से ज्यादा ध्वनि से शोर शुरू हो जाता है। 80 डेसीबल से ज्यादा शोर मनुष्यों और जीव-जंतुओं के लिए नुकसानदायक साबित होता है। हालांकि, पटाखों की ध्वनि अक्सर 65 डेसीबल से ज्यादा होती है। पटाखों की तेज ध्वनि बारूद के महीन कणों से पशु-पक्षियों व इंसानो में बहरापन, नाक व कान की विभिन्न बीमारियों का कारण बनता है। पटाखों में मुख्य रसायन कॉपर, लेड, कैडमियम, मैग्नीशियम, सोडियम, जिंक व नाइट्रेट इत्यादि के मिश्रण पाए जाते हैं। जिनसे श्वांस, गुर्दे एवं हार्ट अटैक जैसी बीमारियों के होने की संभावना बढ़ जाती है और अस्थमा व श्वास के मरीजों के लिए बेहद खतरनाक साबित होता है। इसलिए दीवाली पर पटाखे कम और दीये ज्यादा से ज्यादा जलाएं।
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एक दीया उनकी याद में
पंतनगर। उत्तराखंड ने इस साल आपदा की जो वेदना झेली है, उसके घाव आसानी से नहीं भरे जा सकते। हजारों लोग आपदा और अतिवृष्टि के शिकार हो गए। कई घरों में इस साल दिवाली नहीं मनेगी। जो लोग अचानक हमारे बीच से चले गए, उनकी याद में भी एक दीप जरूर जलाएं।
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