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परंपरागत आवास को बढ़ावा देकर गौरैया के संरक्षण में जुटे हुए यशपाल नेगी
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पक्षी विशेषज्ञ यशपाल सिंह नेगी।
- फोटो : RUDRAPRYAG
मक्कूमठ गांव निवासी व राष्ट्रीय स्तरीय पक्षी विशेषज्ञ यशपाल सिंह नेगी दस वर्षों से गौरैया पक्षी के संरक्षण में जुटे हैं। उन्होंने जहां अपने आवासीय घर में 33 घोंसले बनाए हैं। वहीं, गांव के लोगों को भी प्रेरित कर 125 से अधिक घोंसले बनवाए। नेगी के अनुसार, गौरैया विलुप्त नहीं हुई है, अगर गांवों में लोग उसके परंपरागत आवास को बढ़ावा दें तो पुराने दिनों की तरह यह पक्षी आंगन में फिर से चहचहाहट करने लगेगी।
घरेलू गौरैया (पासर डोमेस्टिकस) यूरोप व एशिया में पाई जाती है। पहाड़ में इसे घिनोड़ या घ्यंदुड़ी नाम से भी जाना जाता है। इस पक्षी का आवास गांवों में पठाल वाले मकानों के छज्जे, जंगले व कोनों पर रहता था, लेकिन बीते कई कुछ वर्षों से यह पक्षी गांवों से मानों गायब सी हो गई है, जिसका प्रमुख कारण परंपरागत आवासीय मकानों को तोड़करआधुनिक शैली के भवनों का निर्माण और गांवों में लग रहे मोबाइल टावर को माना जा रहा है। टावर से निकलने वाले विकिरण किरणें इस पक्षी की दिशा को प्रभावित करने का काम करती है। वहीं, रुद्रप्रयाग जिले के मक्कूमठ गांव में गौरैया पक्षी की चहचहाहट आज भी सुनाई देती है। यहां कई घरों में इस पक्षी ने अपने घोंसले बना रखे हैं। स्थानीय निवासी व पक्षी विशेषज्ञ यशपाल सिंह नेगी का कहना है कि लेंटर वाले मकानों की बढ़ती संख्या ने इस पक्षी को हम से दूर कर दिया है। अगर इन आधुनिक मकानों में भी गौरैया के लिए सिर्फ साढ़े चार इंच गोलाई के घोंसले बना दिए जाए, तो यह पक्षी बीते वर्षों की तरह गांवों की रौनक बन जाएगी। नेगी ने अपने लेंटर वाले आवासीय मकान में गौरैया के लिए 33 घोंसले बना रहे हैं, जिसमें यह पक्षी इन दिनों नेस्टिंग कर रही है। उनके आंगन में प्रतिदिन 20 से 25 गौरैया दाना चुगने आती हैं।
गौरैया की छह प्रजातियां
घरेलू गौरैया (पासर डोमेस्टिकस) की छह प्रजातियां हैं, जिसमें स्पैरो, स्पेनिश स्पैरो, सिंड स्पैरो, रसेट स्पैरो, डेड सी स्पैरो और ट्री स्पैरो शामिल है। इन प्रजातियों में हाउस स्पैरो ही ग्रामीण क्षेत्रों में पाई जाती है, जो आवासीय घरों व आसपास अपना घोंसला बनाती है। पक्षी विशेषज्ञ यशपाल सिंह नेगी ने वर्ष 2000 में बर्ड वॉचिंग का कार्य शुरू किया था। वे, देश-विदेश के नामचीन फोटाग्राफर व पर्यटकों को गौंडार-मद्महेश्वर, मक्कूमठ-चोपता-तुंगनाथ-चंद्रशिला, काकड़ागाड़-चोपता सहित पंचकेदार के प्राचीन ट्रेक पर बर्ड वॉचिंग करा चुके हैं। नेगी ने बताया कि देशभर में पक्षियों की 12 सौ से अधिक प्रजातियां हैं, जिसमें उत्तराखंड में 710 प्रजातियां शामिल हैं। खास यह है कि इनमें 300 से अधिक रुद्रप्रयाग जिले में हैं, जो चिरबटिया, चोपता, तुंगनाथ, काकड़ागाड़ आदि जगहों पर पाई जाती हैं।
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घरेलू गौरैया (पासर डोमेस्टिकस) यूरोप व एशिया में पाई जाती है। पहाड़ में इसे घिनोड़ या घ्यंदुड़ी नाम से भी जाना जाता है। इस पक्षी का आवास गांवों में पठाल वाले मकानों के छज्जे, जंगले व कोनों पर रहता था, लेकिन बीते कई कुछ वर्षों से यह पक्षी गांवों से मानों गायब सी हो गई है, जिसका प्रमुख कारण परंपरागत आवासीय मकानों को तोड़करआधुनिक शैली के भवनों का निर्माण और गांवों में लग रहे मोबाइल टावर को माना जा रहा है। टावर से निकलने वाले विकिरण किरणें इस पक्षी की दिशा को प्रभावित करने का काम करती है। वहीं, रुद्रप्रयाग जिले के मक्कूमठ गांव में गौरैया पक्षी की चहचहाहट आज भी सुनाई देती है। यहां कई घरों में इस पक्षी ने अपने घोंसले बना रखे हैं। स्थानीय निवासी व पक्षी विशेषज्ञ यशपाल सिंह नेगी का कहना है कि लेंटर वाले मकानों की बढ़ती संख्या ने इस पक्षी को हम से दूर कर दिया है। अगर इन आधुनिक मकानों में भी गौरैया के लिए सिर्फ साढ़े चार इंच गोलाई के घोंसले बना दिए जाए, तो यह पक्षी बीते वर्षों की तरह गांवों की रौनक बन जाएगी। नेगी ने अपने लेंटर वाले आवासीय मकान में गौरैया के लिए 33 घोंसले बना रहे हैं, जिसमें यह पक्षी इन दिनों नेस्टिंग कर रही है। उनके आंगन में प्रतिदिन 20 से 25 गौरैया दाना चुगने आती हैं।
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गौरैया की छह प्रजातियां
घरेलू गौरैया (पासर डोमेस्टिकस) की छह प्रजातियां हैं, जिसमें स्पैरो, स्पेनिश स्पैरो, सिंड स्पैरो, रसेट स्पैरो, डेड सी स्पैरो और ट्री स्पैरो शामिल है। इन प्रजातियों में हाउस स्पैरो ही ग्रामीण क्षेत्रों में पाई जाती है, जो आवासीय घरों व आसपास अपना घोंसला बनाती है। पक्षी विशेषज्ञ यशपाल सिंह नेगी ने वर्ष 2000 में बर्ड वॉचिंग का कार्य शुरू किया था। वे, देश-विदेश के नामचीन फोटाग्राफर व पर्यटकों को गौंडार-मद्महेश्वर, मक्कूमठ-चोपता-तुंगनाथ-चंद्रशिला, काकड़ागाड़-चोपता सहित पंचकेदार के प्राचीन ट्रेक पर बर्ड वॉचिंग करा चुके हैं। नेगी ने बताया कि देशभर में पक्षियों की 12 सौ से अधिक प्रजातियां हैं, जिसमें उत्तराखंड में 710 प्रजातियां शामिल हैं। खास यह है कि इनमें 300 से अधिक रुद्रप्रयाग जिले में हैं, जो चिरबटिया, चोपता, तुंगनाथ, काकड़ागाड़ आदि जगहों पर पाई जाती हैं।
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