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ब्रह्मकमल का अस्तित्व खतरे में

Fri, 26 Aug 2016 10:37 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, रुद्रप्रयाग
ब्यूरो/अमर उजाला, रुद्रप्रयाग Updated Fri, 26 Aug 2016 10:37 PM IST
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bramkamal Vulnerable.
केदारनाथ क्षेत्र में स्थित वासुकीताल में बीते वर्ष सितंबर में यूं खिले हुए थे ब्रह्मकमल। - फोटो : Amar Ujala

मध्य हिमालय के ऊपरी क्षेत्र में खिलने वाले ब्रह्मकमल के अस्तित्व पर खंतरा मंडरा रहा है। भेड़-बकरियों के झुंड जहां इस पुष्प को चुगकर पूरी तरह से तहस-नहस कर रहे हैं। वहीं, यात्रियों द्वारा भी इसका जमकर दोहन किया जा रहा है। बावजूद इस दिशा में शासन, प्रशासन व मंदिर समिति कोई सुध नहीं ले रही है।

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समुद्रतल से करीब 15500 फीट की ऊंचाई पर स्थित वासुकीताल को ब्रह्मकमल (ससोरिया ओबवालाटा) की घाटी भी कहा जाता है। यहां पूरे क्षेत्र में सावन-भादौ माह में यह देव पुष्प चारों तरफ अपनी खुशबू बिखेरे रहता है, लेकिन इस बार यहां का नजारा, कुछ अलग है।
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गिनती के ब्रह्मकमल दिख रहे हैं। पूरे क्षेत्र में नजर जहां तक पहुंचे, इस पुष्प की गिनी चुनी पत्तियां या डंठल नजर आ रहे हैं। कारण, यहां पहुंच रहे पर्यटक इसका दोहन कर रहे हैं। दूसरी तरफ केदारनाथ क्षेत्र में इन दिनों मौजूद डेढ़ हजार भेड़-बकरियों के झुंड इस ऊंचाई वाले क्षेत्र में पहुंचकर इस पुष्प को नुकसान पहुंचा रहे हैं। यही स्थिति रही तो राज्य पुष्प ब्रह्मकमल का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा।
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दो दिन पूर्व वासुकीताल से लौटे केदारनाथ पुलिस चौकी प्रभारी विपिन चंद्र पाठक बताते हैं कि वहां इस बार सिर्फ पांच-छह ब्रह्मकमल दिख रहे हैं। बीते वर्ष दो सितंबर को पूरे क्षेत्र में दो हजार से अधिक पुष्प थे, जिसमें अधिकांश खिले हुए थे। वे बताते हैं जहां पुष्प उगे रहते थे, वहां मिट्टी की उखड़ी परत दिखाई दे रही है।

ब्रह्मकमल से बनती है कैंसर की दवा
ब्रह्मकमल औषधीय गुणों से भी भरपूर पुष्प है। इसे सूखाकर कैंसर की दवा बनाई जाती है। पुष्प का पानी पीने से थकान मिटने के साथ ही पुरानी खांसी भी ठीक होती है।


वासुकीताल तक मानवीय हस्तक्षेप शुभ लक्षण नहीं हैं। ब्रह्मकमल पुष्प का अंधाधुंध दोहन चिंता का कारण है। इस दिशा में शासन, प्रशासन को धरातल पर ठोस कार्य करने की जरूरत है। अन्यथा भविष्य में यह पुष्प पूरी तरह से लुप्त हो जाएगा।
-जगत सिंह जंगली, पर्यावरणविद्, रुद्रप्रयाग

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