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उतराखंड के 17 वर्षो में रुद्रप्रयाग को मिला पलायन का दर्द
Updated Wed, 08 Nov 2017 10:38 PM IST
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रुद्रप्रयाग। जिले में चालीस फीसदी से अधिक गांव पलायन की मार झेल रहे है। जरूरी सुविधाओं के अभाव में पलायन लगातार बढ़ता जा रहा है। हाल यह है कि जिला मुख्यालय से चार किमी की दूरी पर स्थित बर्सू गांव राज्य निर्माण के शुरूआती 5-6 वर्षों में जनशून्य हो गया। 90 के दशक तक यहां 40 से अधिक परिवार रहते थे। कभी वर्षभर नगदी फसलों से लहलहाते खेत आज बंजर पड़े हैं, जिनमें घास उगी है। यहां, घर, गौशाला टूटकर खंडहर हो गए हैं।
अगस्त्यमुनि ब्लाक के ग्राम पंचायत कोटी में दस वर्ष पूर्व 75 परिवार थे। वहां अब सिर्फ 6 परिवार रहे गए हैं। पोला गांव में 40 औंर चौंड में 35 परिवारों में मात्र मात्र 5-5 परिवार रह गए हैं। बच्छणस्यूं पट्टी के ग्राम पंचायत नवासू में कई परिवार अपने घरों को छोड़ चुके हैं। खिंगासारी, सारगड्डी, मोल्ठा में गिनती के परिवार रह गए हैं जबकि कफलखील में मात्र 8 और डांडरा में 5 लोग रह गए हैं। ग्राम पंचायत निषणी के 35 परिवारों वाले चॉम्यू गांव में आज तीन बुजुर्ग ही रह रहे हैं। 80 वर्षीय बुजुर्ग आलम सिंह कहते हैं कि कभी उम्मीद नहीं की थी कि उम्र के इस दौर में यूं घरों की चौकीदारी करनी पड़ेगी। आजादी के बाद से गांव सड़क तक नहीं जुड़ पाया है। कलेथ, पणधारा, मरगांव, फतेहपुर, खांकरा आदि गांव भी पलायन की मार झेल रहे हैं। बंगोली, डिंगणी में भी कुछ ही परिवार रह गए हैं।
डेढ़ दशक पूर्व तक 250 परिवारों वाले बेंजी गांव में पिछले 12 वर्षों में पलायन इस कदर हुआ कि यहां मात्र 35 परिवार रह गए हैं। इसी के निकट भटगांव में सिर्फ एक परिवार रह रहा है। धनपुर पट्टी के कांडा, सिमतोली, गढ़सारी, टिमरिया, चौंड, स्यूंड, पोला, रॉलखेत, बंडरी, बरसिल, बमोली, कर्णधार, बेंजी-कांडई गांव भी पलायन से खाली होने के कगार पर हैं। सामाजिक प्रकृति संस्था के गजेंद्र सिंह रौतेला बताते हैं कि वर्ष वर्ष 2011 से 2014 तक रुद्रप्रयाग में एक सर्वे किया गया था, जिसमें जिले से 35 फीसदी पलायन राज्य से बाहर के लिए हो चुका था।
अगस्त्यमुनि ब्लाक के ग्राम पंचायत कोटी में दस वर्ष पूर्व 75 परिवार थे। वहां अब सिर्फ 6 परिवार रहे गए हैं। पोला गांव में 40 औंर चौंड में 35 परिवारों में मात्र मात्र 5-5 परिवार रह गए हैं। बच्छणस्यूं पट्टी के ग्राम पंचायत नवासू में कई परिवार अपने घरों को छोड़ चुके हैं। खिंगासारी, सारगड्डी, मोल्ठा में गिनती के परिवार रह गए हैं जबकि कफलखील में मात्र 8 और डांडरा में 5 लोग रह गए हैं। ग्राम पंचायत निषणी के 35 परिवारों वाले चॉम्यू गांव में आज तीन बुजुर्ग ही रह रहे हैं। 80 वर्षीय बुजुर्ग आलम सिंह कहते हैं कि कभी उम्मीद नहीं की थी कि उम्र के इस दौर में यूं घरों की चौकीदारी करनी पड़ेगी। आजादी के बाद से गांव सड़क तक नहीं जुड़ पाया है। कलेथ, पणधारा, मरगांव, फतेहपुर, खांकरा आदि गांव भी पलायन की मार झेल रहे हैं। बंगोली, डिंगणी में भी कुछ ही परिवार रह गए हैं।
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डेढ़ दशक पूर्व तक 250 परिवारों वाले बेंजी गांव में पिछले 12 वर्षों में पलायन इस कदर हुआ कि यहां मात्र 35 परिवार रह गए हैं। इसी के निकट भटगांव में सिर्फ एक परिवार रह रहा है। धनपुर पट्टी के कांडा, सिमतोली, गढ़सारी, टिमरिया, चौंड, स्यूंड, पोला, रॉलखेत, बंडरी, बरसिल, बमोली, कर्णधार, बेंजी-कांडई गांव भी पलायन से खाली होने के कगार पर हैं। सामाजिक प्रकृति संस्था के गजेंद्र सिंह रौतेला बताते हैं कि वर्ष वर्ष 2011 से 2014 तक रुद्रप्रयाग में एक सर्वे किया गया था, जिसमें जिले से 35 फीसदी पलायन राज्य से बाहर के लिए हो चुका था।
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