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सरकार, तीर्थाटन से कब जुड़ेंगे रुद्रप्रयाग जिले के मंदिर समूह
Updated Sun, 22 Oct 2017 10:43 PM IST
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रुद्रप्रयाग। प्राचीन धार्मिक धरोहरों का संरक्षण और उन्हें तीर्थाटन से जोड़ने के लिए सरकार कुछ नहीं कर रही है। रुद्रप्रयाग जनपद के नारायणकोटी मंदिर समूह, बसुकेदार मंदिर समूह, फलासी मंदिर समूह सहित कई धार्मिक स्थल उत्तराखंड राज्य निर्माण के 17 वर्षों में भी तीर्थाटन का हिस्सा नहीं बन पाए हैं।
रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड राजमार्ग पर रुद्रप्रयाग से 45 किमी की दूरी पर स्थित नारायणकोटी का विशेष धार्मिक महत्व है। यहां प्राचीन मंदिर समूह है, जो शिल्प कला का अद्भुत नमूना है। इस मंदिर समूह का उल्लेख केदारखंड में भी मिलता है। मंदिर समूह को 9वीं ईसवी से पूर्व निर्मित बताया जाता है। समय-समय पर आपदाओं के प्रभाव और देखरेख के अभाव में यहां अब सिर्फ 20 मंदिर रह गए हैं, जबकि पूर्व में यहां 360 मंदिर समूहों में थे। इस मंदिर समूह परिसर में मौजूद मंदिरों में नौ ग्रह मंदिर भी विराजमान हैं, जो ग्रहों के प्रतीक के रूप में स्थापित हैं। प्रत्येक दीवार पर ग्रहों के मंत्र गढ़े अक्षरों में लिखे हैं। श्रद्धालु ग्रह पूजा और व्रतों की शांति के लिए यहां आते हैं। परिसर में लक्ष्मीनारायण, वीरभद्र और सत्यनारायण भगवान के मंदिर शामिल हैं। परिसर में पत्थरों से बना कुंड है। इसे वीरभद्र कुंड कहते हैं। कुंड में गंगा-यमुना की दो जलधाराएं बहती हैं, लेकिन केदारनाथ यात्रा मार्ग से जुड़ा होने के बावजूद यह धार्मिक स्थल आज भी श्रद्धालुओं से दूर है।
ग्राम प्रधान जमुना देवी, जबर सिंह और सच्चिदानंद पुजारी ने बताया कि प्रचार-प्रसार के अभाव में यात्राकाल में भी यहां श्रद्धालु नहीं पहुंचते हैं। अगर, प्रयास हों तो बारामासी तीर्थाटन का मुख्य केंद्र बन सकता है। कई बार पुरातत्व विभाग को मंदिरों के संरक्षण के लिए कहा गया, लेकिन सुध नहीं ली जा रही है।
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जिले में अन्य मंदिर समूह
साणेश्वर महाराज मंदिर समूह सिल्ला, बसुकेदार शिवालय मंदिर समूह, फलासी तुंगनाथ देवता मंदिर समूह, फेगू दुर्गा माता मंदिर समूह, त्रियुगीनारायण मंदिर समूह प्रमुख हैं, जिनके प्रचार-प्रसार की दरकार है।
इनका कहना
गढ़वाल में 35 मठ-मंदिरों के संरक्षण की जिम्मेदारी विभाग के पास है, लेकिन शासन स्तर पर इनकी मरम्मत और सौंदर्य के लिए पर्याप्त धन नहीं मिल पा रहा है। इस कारण नारायणकोट मंदिर समूह सहित अन्य मंदिरों की देखरेख में दिक्कत हो रही है। - अनिल नेगी, अनुश्रवण सहायक भारतीय पुरातत्व विभाग पौड़ी।
रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड राजमार्ग पर रुद्रप्रयाग से 45 किमी की दूरी पर स्थित नारायणकोटी का विशेष धार्मिक महत्व है। यहां प्राचीन मंदिर समूह है, जो शिल्प कला का अद्भुत नमूना है। इस मंदिर समूह का उल्लेख केदारखंड में भी मिलता है। मंदिर समूह को 9वीं ईसवी से पूर्व निर्मित बताया जाता है। समय-समय पर आपदाओं के प्रभाव और देखरेख के अभाव में यहां अब सिर्फ 20 मंदिर रह गए हैं, जबकि पूर्व में यहां 360 मंदिर समूहों में थे। इस मंदिर समूह परिसर में मौजूद मंदिरों में नौ ग्रह मंदिर भी विराजमान हैं, जो ग्रहों के प्रतीक के रूप में स्थापित हैं। प्रत्येक दीवार पर ग्रहों के मंत्र गढ़े अक्षरों में लिखे हैं। श्रद्धालु ग्रह पूजा और व्रतों की शांति के लिए यहां आते हैं। परिसर में लक्ष्मीनारायण, वीरभद्र और सत्यनारायण भगवान के मंदिर शामिल हैं। परिसर में पत्थरों से बना कुंड है। इसे वीरभद्र कुंड कहते हैं। कुंड में गंगा-यमुना की दो जलधाराएं बहती हैं, लेकिन केदारनाथ यात्रा मार्ग से जुड़ा होने के बावजूद यह धार्मिक स्थल आज भी श्रद्धालुओं से दूर है।
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ग्राम प्रधान जमुना देवी, जबर सिंह और सच्चिदानंद पुजारी ने बताया कि प्रचार-प्रसार के अभाव में यात्राकाल में भी यहां श्रद्धालु नहीं पहुंचते हैं। अगर, प्रयास हों तो बारामासी तीर्थाटन का मुख्य केंद्र बन सकता है। कई बार पुरातत्व विभाग को मंदिरों के संरक्षण के लिए कहा गया, लेकिन सुध नहीं ली जा रही है।
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जिले में अन्य मंदिर समूह
साणेश्वर महाराज मंदिर समूह सिल्ला, बसुकेदार शिवालय मंदिर समूह, फलासी तुंगनाथ देवता मंदिर समूह, फेगू दुर्गा माता मंदिर समूह, त्रियुगीनारायण मंदिर समूह प्रमुख हैं, जिनके प्रचार-प्रसार की दरकार है।
इनका कहना
गढ़वाल में 35 मठ-मंदिरों के संरक्षण की जिम्मेदारी विभाग के पास है, लेकिन शासन स्तर पर इनकी मरम्मत और सौंदर्य के लिए पर्याप्त धन नहीं मिल पा रहा है। इस कारण नारायणकोट मंदिर समूह सहित अन्य मंदिरों की देखरेख में दिक्कत हो रही है। - अनिल नेगी, अनुश्रवण सहायक भारतीय पुरातत्व विभाग पौड़ी।