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केदारनाथ में रेतस, हवन और हंस कुंड के हो सकेंगे दर्शन
Updated Sat, 10 Nov 2018 09:48 PM IST
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रुद्रप्रयाग। आगामी वर्षों में बाबा केदार के भक्त प्राचीन हवन, रेतस व हंस कुंड के भी दर्शन कर सकेंगे। आपदा के मलबे में दबे इन कुंडों को वास्तविक स्वरूप में लाया जाएगा। इन कुंडों के पुनरोद्धार के लिए भारत सरकार की प्रसाद योजना-2 में पर्यटन विभाग को प्रस्ताव भेजा जा रहा है।
भगवान आशुतोष के 12 ज्योतिर्लिंगों में ग्यारहवें केदारनाथ धाम को पांच पर्वत, पांच नदी धाराओं और पांच कुंडों की भूमि कहा जाता है। वेद-पुराणों में भी इसका उल्लेख है। केदारनाथ के कुंडों का जल पवित्र माना गया है। 16/17 जून 2013 की आपदा में सभी पांचों कुंड मलबे में दब गए थे। चार वर्ष पूर्व श्रीबदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति व नेहरू पर्वतारोहण संस्थान द्वारा मलबे की सफाई कर मंदिर के पीछे अमृत कुंड और मंदिर मार्ग पर उदक कुंड को खोजा जा चुका है। अब, शेष तीन कुंडों को खोजने और उन्हें मूल स्वरूप में लाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई शुरू हो गई है। प्रसाद योजना में वैज्ञानिक विधि से मलबे में समा चुके रेतस, हंस और हवन कुंड को खोजकर कुंडों के जल का संरक्षण किया जाएगा। बीकेटीसी के सीईओ बीडी सिंह का कहना है कि धाम के कुंडों का विशेष महत्व है। श्रद्धालु पांचों कुंडों के भी दर्शन कर सकें, इससे बड़ी बात क्या हो सकती है। मलबे में दबे कुंडों को खोजने में प्रशासन व कार्यदायी संस्थाओं को हरसंभव सहयोग किया जाएगा।
हंस कुंड
मंदिर से करीब 100 मीटर दूर दायीं ओर हंस कुंड/तर्पण कुंड में श्रद्धालु अपने पितरों का श्राद्ध करते थे। साथ ही दिवंगत की आत्मा की शांति के लिए जन्म कुंडली और दाह संस्कार की राख को कुुंड में विसर्जित किया जाता था। मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने यहां पर हंस रुप धारण किया था।
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रेतस कुंड
यह कुंड मंदिर से करीब 500 मीटर दूर सरस्वती नदी के तट पर स्थित था। केदारखंड में इस कुंड की महिमा का वर्णन किया गया है। कहा जाता है कि यहां ओम नम: शिवाय का जप करने पर पानी के बुलबुुले उठते थे।
हवन कुंड
यह कुंड मंदिर परिसर में आगे की ओर स्थित था। आपदा से पूर्व यात्राकाल में श्रद्धालु इस पावन कुंड में घर-परिवार की सुख-समृद्धि के लिए हवन कराते थे।
इनका कहना है --
केदारनाथ में मलबे में दबे तीन कुंडों का अब पुनरोद्धार किया जाएगा। प्रसाद-योजना में सचिव, पर्यटन उत्तराखंड शासन को प्रस्ताव भेजा जा रहा है। प्रस्ताव को जल्द स्वीकृति मिलने की उम्मीद है।
-मंगेश घिल्डियाल, डीएम रुद्रप्रयाग
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भगवान आशुतोष के 12 ज्योतिर्लिंगों में ग्यारहवें केदारनाथ धाम को पांच पर्वत, पांच नदी धाराओं और पांच कुंडों की भूमि कहा जाता है। वेद-पुराणों में भी इसका उल्लेख है। केदारनाथ के कुंडों का जल पवित्र माना गया है। 16/17 जून 2013 की आपदा में सभी पांचों कुंड मलबे में दब गए थे। चार वर्ष पूर्व श्रीबदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति व नेहरू पर्वतारोहण संस्थान द्वारा मलबे की सफाई कर मंदिर के पीछे अमृत कुंड और मंदिर मार्ग पर उदक कुंड को खोजा जा चुका है। अब, शेष तीन कुंडों को खोजने और उन्हें मूल स्वरूप में लाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई शुरू हो गई है। प्रसाद योजना में वैज्ञानिक विधि से मलबे में समा चुके रेतस, हंस और हवन कुंड को खोजकर कुंडों के जल का संरक्षण किया जाएगा। बीकेटीसी के सीईओ बीडी सिंह का कहना है कि धाम के कुंडों का विशेष महत्व है। श्रद्धालु पांचों कुंडों के भी दर्शन कर सकें, इससे बड़ी बात क्या हो सकती है। मलबे में दबे कुंडों को खोजने में प्रशासन व कार्यदायी संस्थाओं को हरसंभव सहयोग किया जाएगा।
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हंस कुंड
मंदिर से करीब 100 मीटर दूर दायीं ओर हंस कुंड/तर्पण कुंड में श्रद्धालु अपने पितरों का श्राद्ध करते थे। साथ ही दिवंगत की आत्मा की शांति के लिए जन्म कुंडली और दाह संस्कार की राख को कुुंड में विसर्जित किया जाता था। मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने यहां पर हंस रुप धारण किया था।
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रेतस कुंड
यह कुंड मंदिर से करीब 500 मीटर दूर सरस्वती नदी के तट पर स्थित था। केदारखंड में इस कुंड की महिमा का वर्णन किया गया है। कहा जाता है कि यहां ओम नम: शिवाय का जप करने पर पानी के बुलबुुले उठते थे।
हवन कुंड
यह कुंड मंदिर परिसर में आगे की ओर स्थित था। आपदा से पूर्व यात्राकाल में श्रद्धालु इस पावन कुंड में घर-परिवार की सुख-समृद्धि के लिए हवन कराते थे।
इनका कहना है --
केदारनाथ में मलबे में दबे तीन कुंडों का अब पुनरोद्धार किया जाएगा। प्रसाद-योजना में सचिव, पर्यटन उत्तराखंड शासन को प्रस्ताव भेजा जा रहा है। प्रस्ताव को जल्द स्वीकृति मिलने की उम्मीद है।
-मंगेश घिल्डियाल, डीएम रुद्रप्रयाग