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मध्य हिमालय के बुग्यालों से विलुप्त हो जाएंगी 15 औषधीय प्रजातियां
Updated Fri, 24 Nov 2017 10:38 PM IST
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रुद्रप्रयाग। उत्तराखंड में मध्य हिमालय क्षेत्र से लगे जनपदों में समुद्रतल से 9000 से 12000 फीट से ऊपर बुग्यालों में पाई जाने वाली औषधीय प्रजातियों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। प्रतिवर्ष हो रहे दोहन और मौसम परिवर्तन से हिमालय के मध्य क्षेत्र में 15 से अधिक औषधीय प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं।
हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के उच्च शिखरीय पादप शोध केंद्र (हैप्रेक) के वैज्ञानिकों के अनुसार अगर यहीं स्थिति रही तो आने वाले 5-6 वर्षों में मध्य हिमालय के बुग्यालों से कुटकी, ब्रह्मकमल, मीठा विष पूरी तरह गायब हो जाएगा, जो पर्यावरण और मानव जीवन के लिए शुभ नहीं है।
पर्यटन के नाम पर बुग्यालों में बढ़ रहा मानवीय हस्तक्षेप वहां के पर्यावरण को प्रभावित करने के साथ वनस्पतियों को भी नुकसान पहुंच रहा है। रुद्रप्रयाग के चोपता, बनियाकुंड, तुंगनाथ सहित चमोली के घाट, रमणी और वांण सहित बागेश्वर जनपद के कपकोट, उत्तरकाशी के मोरी और हरकीदून, नई टिहरी और चंपावत जिले में मध्य हिमालय क्षेत्र के बुग्यालों के निचले और ऊपरी क्षेत्रों में सैकड़ों औषधीय प्रजातियां हैं, लेकिन बीते कुछ वर्षों से पर्यटन के नाम पर बुग्यालों में प्रतिवर्ष बढ़ रहे मानवीय हस्तक्षेप और पालसियों के मवेशियों की पहुंच ने स्थानीय पर्यावरण को प्रदूषित कर बुग्याली घास को नष्ट किया है। जड़ी-बूटियों का अवैध करोबार करने वाले तस्कर बुग्यालों को औषधी प्रजातियों का जमकर दोहन कर रहे हैं। कई जगहों पर तो तस्करों ने खोदकर जड़ी-बूटियां निकाल ली हैं, जिससे औषधीय पादपों के नष्ट होने के साथ वहां की घास और मिट्टी को भी व्यापक नुकसान पहुंचा है।
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हैप्रेक के वैज्ञानिकों की मानें तो मध्य हिमालय से लगे जनपदों के अधिकांश बुग्यालों में जड़ी-बूटियों के असीमित विदोहन से वहां पाई जाने वाली अतीश, दूधिया अतीश, कुटकी, कड़वी कुटकी, अर्चा गड़नी, मीठा विष, जटामासी, वन ककड़ी, चिरैता, ककोली, गूगल धूप, सतवा, दूधिया सतवा, जीवक रसबक, शिल्पाहरी, हथजड़ी, पुष्करमोल, चोरु, कपूरकचरी, दौलू अरचा, ब्रह्मकमल विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। इन जड़ी-बूटियों से बुखार, खांसी, दर्द, अल्सर, अस्थमा और टीबी की दवा बनती है। कुछ जड़ी बूटियां धूप और इत्र बनाने में भी काम आती हैं। इन जड़ी बूटियों में कुछ तो दो-तीन वर्षों में ही खत्म हो जाएंगी।
पर्यावरणविद् जगत सिंह जंगली भी बुग्यालों के संरक्षण के लिए ठोस नीति की पैरवी करते हैं। उनका कहना है कि मध्य हिमालय में मानवीय हस्तक्षेप खत्म होना चाहिए, जिससे बुग्याल भी सुरक्षित रहे।
बुग्यालों में बढ़ रहा तापमान
बुग्यालों में तामपान बढ़ रहा है, जो ग्लोबल वार्मिंग का सीधा असर है। रुद्रप्रयाग के चोपता और तुंगनाथ क्षेत्र में वर्ष 2012-13 में नवंबर-दिसंबर में सुबह और शाम के समय जहां तापमान 4 से 5 डिग्री सेल्सियस रहता था वहीं, वर्ष 2015-16 में 6 से 8 डिग्री और इस वर्ष नवंबर में 12 डिग्री तक तापमान दर्ज किया गया है, जबकि दोपहर में 15 से 18 के बीच रहने वाला पारा 25 डिग्री तक पहुंच रहा है, जिससे वहां उगने वाली जड़ी-बूटी और अन्य वनस्पतियों पर असर पड़ रहा है।
इनका कहना है --
मध्य हिमालय में बीते कुछ वर्षों से मौसम परिवर्तन के साथ ही बुग्यालों में औषधीय पादपों का जमकर विदोहन हो रहा है। इससे 15 प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। पर्यटन के नाम पर बढ़ रहे मानवीय हस्तक्षेप से हालात दिनोंदिन गंभीर हो रहे हैं, जिस पर नियंत्रण के लिए धरातल पर ठोस प्रयासों की जरूरत है।-डा. बीएस मिंगवाल, वरिष्ठ वैज्ञानिक हैप्रेक श्रीनगर गढ़वाल
हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के उच्च शिखरीय पादप शोध केंद्र (हैप्रेक) के वैज्ञानिकों के अनुसार अगर यहीं स्थिति रही तो आने वाले 5-6 वर्षों में मध्य हिमालय के बुग्यालों से कुटकी, ब्रह्मकमल, मीठा विष पूरी तरह गायब हो जाएगा, जो पर्यावरण और मानव जीवन के लिए शुभ नहीं है।
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पर्यटन के नाम पर बुग्यालों में बढ़ रहा मानवीय हस्तक्षेप वहां के पर्यावरण को प्रभावित करने के साथ वनस्पतियों को भी नुकसान पहुंच रहा है। रुद्रप्रयाग के चोपता, बनियाकुंड, तुंगनाथ सहित चमोली के घाट, रमणी और वांण सहित बागेश्वर जनपद के कपकोट, उत्तरकाशी के मोरी और हरकीदून, नई टिहरी और चंपावत जिले में मध्य हिमालय क्षेत्र के बुग्यालों के निचले और ऊपरी क्षेत्रों में सैकड़ों औषधीय प्रजातियां हैं, लेकिन बीते कुछ वर्षों से पर्यटन के नाम पर बुग्यालों में प्रतिवर्ष बढ़ रहे मानवीय हस्तक्षेप और पालसियों के मवेशियों की पहुंच ने स्थानीय पर्यावरण को प्रदूषित कर बुग्याली घास को नष्ट किया है। जड़ी-बूटियों का अवैध करोबार करने वाले तस्कर बुग्यालों को औषधी प्रजातियों का जमकर दोहन कर रहे हैं। कई जगहों पर तो तस्करों ने खोदकर जड़ी-बूटियां निकाल ली हैं, जिससे औषधीय पादपों के नष्ट होने के साथ वहां की घास और मिट्टी को भी व्यापक नुकसान पहुंचा है।
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हैप्रेक के वैज्ञानिकों की मानें तो मध्य हिमालय से लगे जनपदों के अधिकांश बुग्यालों में जड़ी-बूटियों के असीमित विदोहन से वहां पाई जाने वाली अतीश, दूधिया अतीश, कुटकी, कड़वी कुटकी, अर्चा गड़नी, मीठा विष, जटामासी, वन ककड़ी, चिरैता, ककोली, गूगल धूप, सतवा, दूधिया सतवा, जीवक रसबक, शिल्पाहरी, हथजड़ी, पुष्करमोल, चोरु, कपूरकचरी, दौलू अरचा, ब्रह्मकमल विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। इन जड़ी-बूटियों से बुखार, खांसी, दर्द, अल्सर, अस्थमा और टीबी की दवा बनती है। कुछ जड़ी बूटियां धूप और इत्र बनाने में भी काम आती हैं। इन जड़ी बूटियों में कुछ तो दो-तीन वर्षों में ही खत्म हो जाएंगी।
पर्यावरणविद् जगत सिंह जंगली भी बुग्यालों के संरक्षण के लिए ठोस नीति की पैरवी करते हैं। उनका कहना है कि मध्य हिमालय में मानवीय हस्तक्षेप खत्म होना चाहिए, जिससे बुग्याल भी सुरक्षित रहे।
बुग्यालों में बढ़ रहा तापमान
बुग्यालों में तामपान बढ़ रहा है, जो ग्लोबल वार्मिंग का सीधा असर है। रुद्रप्रयाग के चोपता और तुंगनाथ क्षेत्र में वर्ष 2012-13 में नवंबर-दिसंबर में सुबह और शाम के समय जहां तापमान 4 से 5 डिग्री सेल्सियस रहता था वहीं, वर्ष 2015-16 में 6 से 8 डिग्री और इस वर्ष नवंबर में 12 डिग्री तक तापमान दर्ज किया गया है, जबकि दोपहर में 15 से 18 के बीच रहने वाला पारा 25 डिग्री तक पहुंच रहा है, जिससे वहां उगने वाली जड़ी-बूटी और अन्य वनस्पतियों पर असर पड़ रहा है।
इनका कहना है --
मध्य हिमालय में बीते कुछ वर्षों से मौसम परिवर्तन के साथ ही बुग्यालों में औषधीय पादपों का जमकर विदोहन हो रहा है। इससे 15 प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। पर्यटन के नाम पर बढ़ रहे मानवीय हस्तक्षेप से हालात दिनोंदिन गंभीर हो रहे हैं, जिस पर नियंत्रण के लिए धरातल पर ठोस प्रयासों की जरूरत है।-डा. बीएस मिंगवाल, वरिष्ठ वैज्ञानिक हैप्रेक श्रीनगर गढ़वाल