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बिना चुनाव लड़े पुरखों की प्रधानी हाथ से गई

Thu, 08 Sep 2022 12:57 AM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Thu, 08 Sep 2022 12:57 AM IST
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Without contesting the election, the head of the ancestors was lost.
आजादी के बाद से लगातार प्रधान पद पर काबिज जलालपुर गांव के एक परिवार को बिना चुनाव लड़े ही पुश्तैनी सीट गंवानी पड़ी। वर्ष 1990 और 2000 में प्रधानी दो बार जरूर दूसरे के पाले में गई लेकिन तब ये परिवार हार गया था। इसबार आरक्षण के कारण ऐसा हुआ है।
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1949 में उत्तराखंड, यूपी का ही हिस्सा था। उस दौरान पहली बार लागू हुए पंचायती राज में ग्राम पंचायत सीट के लिए चुनाव हुए। तब जलालपुर गांव में लोगों ने हाथ खड़े करके गांव के जिम्मेदार बरकत को गांव का प्रधान चुन लिया था। इसके बाद उन्होंने चार योजनाओं तक जनता के दिलों पर राज किया। इसके बाद इनके बेटे असरफ ने लगातार चार योजनाओं तक प्रधानी की बागडोर संभाली।
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हालांकि वर्ष 1990 में गांव के दूसरे पक्ष युसूफ ने चुनाव जीता था लेकिन अगली ही योजना में इस परिवार ने फिर सीट पर कब्जा कर लिया। वर्ष 2000 में दूसरी बार गांव के दूसरे पक्ष जावेद इकबाल ने चुनाव जीता लेकिन वर्ष 2005 में गांव की जनता ने अन्य प्रधानों को नकारते हुए इसी परिवार के शहीद हसन को चुना।
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इसके बाद महराना और फिर उनके पति अफजाल प्रधान पद को संभालते आ रहे हैं लेकिन इस बार आरक्षण के कारण बिना चुनाव लड़े ही इस परिवार को ये सीट गंवानी पड़ी। इस बार यह सीट एससी में चली गई है। निर्वतमान ग्राम प्रधान अफजाल हसन का कहना है कि उनके परिवार ने कभी चुनाव में अनायास खर्च नहीं किया है। इस बार अफसोस इसी बात का है कि बिना चुनाव लड़े ही मैदान से बाहर हैं।
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