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साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र भी गंगनहर देख हुए अभिभूत

Sun, 17 Apr 2022 12:19 AM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Sun, 17 Apr 2022 12:19 AM IST
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Litterateur Bhartendu Harishchandra was also overwhelmed to see Ganganahar
आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामाह कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र के यात्रा वृत्तांत के रूप में उनके कुछ संस्मरणों में 1871 में की गई हरिद्वार की यात्रा भी है। जिसमें उन्होंने गंगनहर के सौंदर्यीकरण का रोचक, रोमांचक और अनुपम वर्णन किया है। गंगनहर में नदी के ऊपर से गुजरती गंगनहर और उसमें चलती नाव का साहित्यिक विधा की गहराई में उतरकर शब्दों में उतारा है।
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उन्होंने यात्रा का वर्णन करते गंगनहर के विषय में लिखा है कि ‘यहां सबसे आश्चर्य श्री गंगा जी की नहर है, पुल के ऊपर से तो यह नहर बहती है और नीचे से नदी बहती है। यह एक बड़े आश्चर्य का स्थान है। इसको देखने से शिल्प-विद्या का बल और अंग्रेजों का चातुर्य और द्रव्य का व्यय प्रगट होता है। न जाने वह पुल कितना दृढ़ बना है कि उस पर से अनवरत कई लाख मन वरन करोड़ मन जल बहा करता है और वह तनिक नहीं हिलता। स्थल में जल कर रखा है और स्थानों में पुल के नीचे से नाव चलती है। यहां पुल के ऊपर नाव चलती है और उसके दोनों ओर गाड़ी जाने का मार्ग है और उसके परले सिरे पर चूने के सिंह बहुत ही बड़े बड़े बने हैं। हरिद्वार का एक मार्ग इसी नहर की पटरी पर से है और मैं इसी मार्ग से गया था। विदित हो कि यह श्री गंगा जी की नहर हरिद्वार से आई है और इसके लाने में यह चातुर्य किया है कि इसके जल का वेग रोकने के लिए इसको सीढ़ी की भांति लाए हैं। कोस कोस डेढ़ डेढ़ कोस पर बड़े बड़े पुल बनाए हैं वही मानों सीढ़ियां हैं और प्रत्येक पुल के ताखों से जल को नीचे उतारा है। जहां जहां जल को नीचे उतारा है वहां बड़े बड़े सीकड़ों में कसे हुए दृढ़ तख्ते पुल के ताखों के मुंह पर लगा दिए हैं और उनके खींचने के लिए ऊपर चक्कर रखे हैं। उन तख्तों से ठोकर खाकर पानी नीचे गिरता है वह शोभा देखने योग्य है। एक तो उसका महान शब्द दूसरे उसमें से फुहारे की भांति जल का उबलना और छींटों का उड़ना मन को बहुत लुभाता है और जब कभी जल विशेष लेना होता है तो तख्तों को उठा लेते हैं फिर तो इस वेग से जल गिरता है जिसका वर्णन नहीं हो सकता और ये मल्लाह दुष्ट वहां भी आश्चर्य करते हैं कि उस जल पर से नाव को उतारते हैं या चढ़ाते हैं। जो नाव उतरती है तो यह ज्ञात होता है कि नाव पाताल का गई पर वे बड़ी सावधानी से उसे बचा लेते हैं और क्षण मात्र में बहुत दूर निकल जाती है पर चढ़ाने में बड़ा परिश्रम होता है।
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यह नाव का उतरना चढ़ना भी एक कौतुक ही समझना चाहिए। इसके आगे और भी आश्चर्य है कि दो स्थान नीचे तो नहर है और ऊपर से नदी बहती है। वर्षा के कारण वे नदियां क्षण में तो बड़े वेग से बढ़ती थी और क्षण भर में सूख जाती है और भी मार्ग में जो नदी मिली उनकी यही दशा थी। उनके करारे गिरते थे तो बड़ा भयंकर शब्द होता था और वृक्षों को जड़ समेत उखाड़ के बहाये लाती थी। वेग ऐसा कि हाथी न संभल सके पर आश्चर्य यह कि जहां अभी डुबा था वहां थोड़ी देर पीछे सूखी रेत पड़ी है और आगे एक स्थान पर नदी और नहर को एक में मिला के निकाला है।
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यह भी देखने योग्य है। सीधी रेखा की चाल से नहर आई है और बड़ी रेखा की चाल से नदी गई है। जिस स्थान पर दोनों का संगम है वहां नहर के दोनों ओर पुल बने हैं और नदी जिधर गिरती है उधर कई द्वार बनाकर उसमें काठ के तख्ते लगाए हैं जिससे जितना पानी नदी में जाने देना चाहें उतना नदी में और जितना नहर में छोड़ना चाहें उतना नहर में छोड़ें। जहां से नहर श्री गंगाजी में से निकला है वहां भी ऐसा ही प्रबंध है और गंगाजी नहर में पानी निकल जाने से दुबली और छिछली हो गई है परंतु जहा नील धारा आ मिली है वहां फिर ज्यौं की त्यौं हो गई है।

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स्रोत : हिंदवी नामक वेबसाइट इस लेख के स्रोत के बारे में यह लिखा गया है -
पुस्तक : भारतेंदु के निबंध (पृष्ठ 67)
संपादक : केसरीनारायण शुक्ल
रचनाकार : भारतेंदु हरिश्चंद्र
प्रकाशन : सरस्वती मंदिर जतनबर, बनारस
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- भारतेंदु हरिश्चंद्र 1871 में रुड़की से होते हुए हरिद्वार गए थे। उनके अनुसार कई साहित्यिक लेखों में वर्णन है कि उन्होंने कहा था कि गंगा जी से पहले उन्होंने गंगनहर देख ली है। इतनी जलराशि बह रही है। जिसका वर्णन लोगों को बताना चाहिए। तब उन्होंने हरिद्वार की यात्रा का वृत्तांत लिखा था।
-- योगेंद्र नाथ शर्मा ‘अरुण’, साहित्यकार एवं पूर्व प्राचार्य
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