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मजदूर बने मजबूर
Updated Fri, 19 Jan 2018 12:53 AM IST
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रुड़की। भले ही मजदूरों की स्थिति सुधारने के लिए सरकार की ओर से लाख वादे किए जाते हों, लेकिन वादे कभी धरातल पर नहीं उतरते। आज हालत यह है कि प्रदेश की फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों को महज 7 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन मिल रहा है। जबकि आज इतने कम वेतन में घर चलाना बेहद मुश्किल है।
वर्ष-2005 से भगवानपुर, रामनगर, रोशनाबाद (सिडकुल), कोटद्वार सहित पंतनगर, रुद्रपुर, काशीपुर में सैकड़ों फैक्ट्रियां स्थापित हुई हैं। इनमें स्थानीय सहित बाहरी प्रदेश के युवाओं को रोजगार मिला है, लेकिन श्रम विभाग की मजदूरों की दिहाड़ी बढ़ाने वाली समिति की सिफारिशें मजदूरों के हितों के खिलाफ गई। राज्य गठन के 18 साल बाद भी प्रदेश के मजदूरों को न्यूनतम वेतन 6510 रुपये मिल रहा है। पांच साल से मजदूर इसी न्यूनतम वेतन लेने को मजबूर है।
पांच साल बाद बढ़ती है दिहाड़ी
मजदूरों का न्यूनतम वेतन तय करने के लिए श्रम विभाग की ओर से एक समिति का गठन किया जाता है। यह समिति आगामी पांच साल में बढ़ने वाली महंगाई के अनुरूप न्यूनतम वेतन तय करती है, लेकिन अभी तय तक जो समिति बैठी उसने महंगाई के अनुरूप वेतन तय नहीं किया। इससे प्रदेश में मजदूरों की स्थिति बद से भी बदतर है।
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कैबिनेट बैठकों में मजदूरों का जिक्र नहीं
प्रदेश सरकार की ओर से प्रतिमाह कैबिनेट की बैठकें आयोजित की जाती हैं। अभी तक लगभग 16 कैबिनेट बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन एक भी बैठक में मजदूरों का न्यूनतम वेतन बढ़ाने का प्रस्ताव नहीं आया।
यह है मजदूरों का वेतन
>> अकुशल - 6510
>> अर्द्धकुशल- 6670
>> कुशल - 7070
फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों की पीड़ा
मैं भगवानपुर की एक फैक्ट्री में काम करता हूं। जो वेतन मिलता है वह आज की महंगाई के हिसाब से पर्याप्त नहीं है। आठ घंटे ड्यूटी करने के बाद भी उनके हाथ में छह हजार हाते हैं। अमित कुमार, मजदूर
फैक्ट्रियों में इतना कम वेतन मिलता है कि मजबूरी में 12 घंटे ड्यूटी करनी पड़ रही है। उससे भी परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है। बच्चों के लिए जरूरी चीजें तक नहीं खरीद पा रहे हैं। उन्हें अच्छे सेंटर में कोचिंग तक नहीं दिला पा रहे हैं। ओवरटाइम करके 8 हजार मिल पा रहे हैं।
ओमपाल, मजदूर
दिल्ली में न्यूनतम वेतन 13500
केरल, गोवा और दिल्ली में मजदूरों का न्यूनतम वेतन 13500 है। जबकि उत्तराखंड में मात्र 6510 रुपये है। जबकि केंद्र सरकार ने मजदूरों का न्यूनतम वेतन 15 हजार रुपये तय करने के आदेश जारी किए हैं। प्रदेश सरकार इस आदेश पर कब तक अमल करती है यह भविष्य के गर्त में है।
श्रम विभाग की ओर से श्रमिकों के वेतन बढ़ाने के लिए एक समिति का गठन किया जाता है। यह समिति जितना भी वेतन तय करती है वह वेतन पांच साल तक लागू रहता है। अब 18 मार्च 2018 के बाद नई समिति का गठन किया जाएगा। उसके बाद मजदूरों का वेतन रिवाइज्ड हो पाएगा।- सिरताज सिंह रांगड़, श्रम प्रवर्तन अधिकारी
श्रमिकों का वेतन श्रम विभाग की ओर से तय किया जाता है। वेतन बढ़ाने को लेकर शासन से निर्णय होता है, लेकिन वर्तमान में फैक्ट्रियों और अन्य संस्थानों में जो वेतन दिया जा रहा है वह बेहद कम है।
अंजली रावत, महाप्रबंधक जिला उद्योग केंद्र रुड़की
वर्तमान में फैक्ट्रियों में जो वेतन मजदूरों को दिया जाता है वह आज की महंगाई के हिसाब से बेहद कम है। श्रमिक यूनियनों की ओर से मजदूरों का न्यूनतम वेतन 18 हजार करने की मांग प्रदेश सरकार के सामने रखी है, लेकिन अभी तक कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला।
एमपी जखमोला, जिला महामंत्री सीटू हरिद्वार
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वर्ष-2005 से भगवानपुर, रामनगर, रोशनाबाद (सिडकुल), कोटद्वार सहित पंतनगर, रुद्रपुर, काशीपुर में सैकड़ों फैक्ट्रियां स्थापित हुई हैं। इनमें स्थानीय सहित बाहरी प्रदेश के युवाओं को रोजगार मिला है, लेकिन श्रम विभाग की मजदूरों की दिहाड़ी बढ़ाने वाली समिति की सिफारिशें मजदूरों के हितों के खिलाफ गई। राज्य गठन के 18 साल बाद भी प्रदेश के मजदूरों को न्यूनतम वेतन 6510 रुपये मिल रहा है। पांच साल से मजदूर इसी न्यूनतम वेतन लेने को मजबूर है।
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पांच साल बाद बढ़ती है दिहाड़ी
मजदूरों का न्यूनतम वेतन तय करने के लिए श्रम विभाग की ओर से एक समिति का गठन किया जाता है। यह समिति आगामी पांच साल में बढ़ने वाली महंगाई के अनुरूप न्यूनतम वेतन तय करती है, लेकिन अभी तय तक जो समिति बैठी उसने महंगाई के अनुरूप वेतन तय नहीं किया। इससे प्रदेश में मजदूरों की स्थिति बद से भी बदतर है।
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कैबिनेट बैठकों में मजदूरों का जिक्र नहीं
प्रदेश सरकार की ओर से प्रतिमाह कैबिनेट की बैठकें आयोजित की जाती हैं। अभी तक लगभग 16 कैबिनेट बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन एक भी बैठक में मजदूरों का न्यूनतम वेतन बढ़ाने का प्रस्ताव नहीं आया।
यह है मजदूरों का वेतन
>> अकुशल - 6510
>> अर्द्धकुशल- 6670
>> कुशल - 7070
फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों की पीड़ा
मैं भगवानपुर की एक फैक्ट्री में काम करता हूं। जो वेतन मिलता है वह आज की महंगाई के हिसाब से पर्याप्त नहीं है। आठ घंटे ड्यूटी करने के बाद भी उनके हाथ में छह हजार हाते हैं। अमित कुमार, मजदूर
फैक्ट्रियों में इतना कम वेतन मिलता है कि मजबूरी में 12 घंटे ड्यूटी करनी पड़ रही है। उससे भी परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है। बच्चों के लिए जरूरी चीजें तक नहीं खरीद पा रहे हैं। उन्हें अच्छे सेंटर में कोचिंग तक नहीं दिला पा रहे हैं। ओवरटाइम करके 8 हजार मिल पा रहे हैं।
ओमपाल, मजदूर
दिल्ली में न्यूनतम वेतन 13500
केरल, गोवा और दिल्ली में मजदूरों का न्यूनतम वेतन 13500 है। जबकि उत्तराखंड में मात्र 6510 रुपये है। जबकि केंद्र सरकार ने मजदूरों का न्यूनतम वेतन 15 हजार रुपये तय करने के आदेश जारी किए हैं। प्रदेश सरकार इस आदेश पर कब तक अमल करती है यह भविष्य के गर्त में है।
श्रम विभाग की ओर से श्रमिकों के वेतन बढ़ाने के लिए एक समिति का गठन किया जाता है। यह समिति जितना भी वेतन तय करती है वह वेतन पांच साल तक लागू रहता है। अब 18 मार्च 2018 के बाद नई समिति का गठन किया जाएगा। उसके बाद मजदूरों का वेतन रिवाइज्ड हो पाएगा।- सिरताज सिंह रांगड़, श्रम प्रवर्तन अधिकारी
श्रमिकों का वेतन श्रम विभाग की ओर से तय किया जाता है। वेतन बढ़ाने को लेकर शासन से निर्णय होता है, लेकिन वर्तमान में फैक्ट्रियों और अन्य संस्थानों में जो वेतन दिया जा रहा है वह बेहद कम है।
अंजली रावत, महाप्रबंधक जिला उद्योग केंद्र रुड़की
वर्तमान में फैक्ट्रियों में जो वेतन मजदूरों को दिया जाता है वह आज की महंगाई के हिसाब से बेहद कम है। श्रमिक यूनियनों की ओर से मजदूरों का न्यूनतम वेतन 18 हजार करने की मांग प्रदेश सरकार के सामने रखी है, लेकिन अभी तक कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला।
एमपी जखमोला, जिला महामंत्री सीटू हरिद्वार