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आजादी के लिए छोड़ी पढ़ाई और सही यातनाएं
Updated Sun, 13 Aug 2017 12:47 AM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
रुड़की। स्वतंत्रता सेनानी बाबू रतन सिंह के दिलोदिमाग में आजादी की भावना इस तरह कदर हावी थी कि वह कक्षा दस की परीक्षा छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। इस दौरान उन्हें सात बार जेल जाना पड़ा और अंग्रेजों की यातनाएं भी सहनी पड़ी, लेकिन हार नहीं मानी। आजादी के बाद पंडित नेहरू ने बाबू रतन सिंह को राजनीति में लाने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने इससे इंकार कर दिया। आजादी के बाद गांव की खेतीबाड़ी करते हुए उन्होंने बाकी जीवन बिताया था।
स्वतंत्रता सेनानी बाबू रतन सिंह के बेटे रामपाल सिंह बताते हैं कि उनके पिता का जन्म लक्सर क्षेत्र के बसेड़ी गांव में 1910 में हुआ था, जिसके बाद उनका परिवार क्षेत्र के ही लक्सरी गांव में जाकर बस गया था। उन्होंने बताया कि बाबू रतन सिंह 1930 में कक्षा दस की परीक्षा दे रहे थे, तो वह चरथावल के आचार्य अभयदेव आर्य से इतने प्रभावित हुए कि परीक्षा छोड़ आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। उन्होंने बताया कि वह 1930 से 1942 तक सात बार जेल गए। एक घटना को लेकर 1938 में बाबू रतन सिंह को अंग्रेजों ने डाग बैरक यानी कुत्ता ग्रह में रख दिया था, लेकिन अंग्रेजों की यातनाओं के साथ ही रतन सिंह और मजबूत होते चले गए और आजादी मिलने तक कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। रामपाल सिंह बताते हैं कि 1977 में उन्होंने गांव में ही अंतिम सांस ली थी।
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रुड़की। स्वतंत्रता सेनानी बाबू रतन सिंह के दिलोदिमाग में आजादी की भावना इस तरह कदर हावी थी कि वह कक्षा दस की परीक्षा छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। इस दौरान उन्हें सात बार जेल जाना पड़ा और अंग्रेजों की यातनाएं भी सहनी पड़ी, लेकिन हार नहीं मानी। आजादी के बाद पंडित नेहरू ने बाबू रतन सिंह को राजनीति में लाने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने इससे इंकार कर दिया। आजादी के बाद गांव की खेतीबाड़ी करते हुए उन्होंने बाकी जीवन बिताया था।
स्वतंत्रता सेनानी बाबू रतन सिंह के बेटे रामपाल सिंह बताते हैं कि उनके पिता का जन्म लक्सर क्षेत्र के बसेड़ी गांव में 1910 में हुआ था, जिसके बाद उनका परिवार क्षेत्र के ही लक्सरी गांव में जाकर बस गया था। उन्होंने बताया कि बाबू रतन सिंह 1930 में कक्षा दस की परीक्षा दे रहे थे, तो वह चरथावल के आचार्य अभयदेव आर्य से इतने प्रभावित हुए कि परीक्षा छोड़ आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। उन्होंने बताया कि वह 1930 से 1942 तक सात बार जेल गए। एक घटना को लेकर 1938 में बाबू रतन सिंह को अंग्रेजों ने डाग बैरक यानी कुत्ता ग्रह में रख दिया था, लेकिन अंग्रेजों की यातनाओं के साथ ही रतन सिंह और मजबूत होते चले गए और आजादी मिलने तक कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। रामपाल सिंह बताते हैं कि 1977 में उन्होंने गांव में ही अंतिम सांस ली थी।
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