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रसोईगैस की बुकिंग के लिए आना पड़ता है धारचूला
ब्यूरो/अमर उजाला, पिथौरागढ़।
Updated Mon, 28 Nov 2016 10:48 PM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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इस तहसील के खेला, रांथी, जुम्मा, जम्कू, गर्गुवा समेत आसपास के अन्य गांवों के लोगों को रसोईगैस का सिलेंडर बुक कराने के लिए 30 किलोमीटर दूर धारचूला आना पड़ता है। ये लोग नेपाली सिम का अन्य संवाद के लिए प्रयोग तो करते हैं, लेकिन रसोईगैस की बुकिंग के लिए नेपाली सिम को वैधता नहीं मिली है। ठीक इसी तरह इलाके में कोई दुर्घटना हो जाए तो 108 सेवा को सूचना देने के लिए भी धारचूला आना पड़ता है।
नोटबंदी के बाद सरकार बार बार कैशलेस व्यवस्था शुरू करने, डेविट और क्रेडिट कार्ड से शॉपिंग करने, पेटीएम का प्रयोग करने का प्रचार कर रही है, लेकिन उसे यह मालूम नहीं है कि इसी देश के एक हिस्से में लोगों को किसी भारतीय संचार कंपनी ने अपनी सेवाएं नहीं दी हैं।
सीमावर्ती क्षेत्रों में लचर संचार सेवाओं का प्रमुख कारण सरकारी उपेक्षा भी रही है। संचार सेवाओं की आस लगाए सीमांत वासियों को सरकारी उपेक्षा का भी दंश झेलना पड़ रहा है। धारचूला क्षेत्र में संचार सेवाओं की अनदेखी अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विगत लगभग दो वर्षों से खड़ा निजी कंपनी एयरटेल का टॉवर अभी तक चालू नहीं हो पाया है।
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2014 अंतिम माह में जब एयरटेल का टॉवर लगाया गया तो बार बार प्राइवेट टॉवरों की मांग कर रहे लोगों को बेहतर सेवाओं की उम्मीद जगी थी, अब तक न तो सरकार ने और न कंपनियों इस दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया है। जनता बार-बार वही पुराना राग अलापती रही मगर संबंधित महकमों ने कोई रुचि नहीं दिखाई। संचार सेवा न होने से और नेपाल के सिम का प्रयोग करने से न केवल राजस्व का घाटा हो रहा है वरन लोगों को देश का नागरिक के नाते जो सुविधा मिलनी चाहिए उससे भी वह वंचित होते जा रहे हैं। इतने गंभीर मसले पर अब तक किसी भी जनप्रतिनिधि ने कोई आवाज नहीं उठाई। अब चुनाव का समय नजदीक आ रहा है और लोगों को बेहतर संचार सेवाओं का सब्जबाग दिखाने वालों की भी कमी नहीं है।
नोटबंदी के बाद सरकार बार बार कैशलेस व्यवस्था शुरू करने, डेविट और क्रेडिट कार्ड से शॉपिंग करने, पेटीएम का प्रयोग करने का प्रचार कर रही है, लेकिन उसे यह मालूम नहीं है कि इसी देश के एक हिस्से में लोगों को किसी भारतीय संचार कंपनी ने अपनी सेवाएं नहीं दी हैं।
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सीमावर्ती क्षेत्रों में लचर संचार सेवाओं का प्रमुख कारण सरकारी उपेक्षा भी रही है। संचार सेवाओं की आस लगाए सीमांत वासियों को सरकारी उपेक्षा का भी दंश झेलना पड़ रहा है। धारचूला क्षेत्र में संचार सेवाओं की अनदेखी अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विगत लगभग दो वर्षों से खड़ा निजी कंपनी एयरटेल का टॉवर अभी तक चालू नहीं हो पाया है।
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2014 अंतिम माह में जब एयरटेल का टॉवर लगाया गया तो बार बार प्राइवेट टॉवरों की मांग कर रहे लोगों को बेहतर सेवाओं की उम्मीद जगी थी, अब तक न तो सरकार ने और न कंपनियों इस दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया है। जनता बार-बार वही पुराना राग अलापती रही मगर संबंधित महकमों ने कोई रुचि नहीं दिखाई। संचार सेवा न होने से और नेपाल के सिम का प्रयोग करने से न केवल राजस्व का घाटा हो रहा है वरन लोगों को देश का नागरिक के नाते जो सुविधा मिलनी चाहिए उससे भी वह वंचित होते जा रहे हैं। इतने गंभीर मसले पर अब तक किसी भी जनप्रतिनिधि ने कोई आवाज नहीं उठाई। अब चुनाव का समय नजदीक आ रहा है और लोगों को बेहतर संचार सेवाओं का सब्जबाग दिखाने वालों की भी कमी नहीं है।