देवी को अर्पित जंगलों का कायाकल्प हो गया
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उत्तराखंड में जहां देवी-देवताओं की बहुत ज्यादा आराधना होती है, वहीं लोग देवी-देवताओं के कोप का भाजन बनने से भी घबराते हैं। लोगों को आज भी विश्वास है कि जब कहीं न्याय नहीं मिलेगा तो देवी के दरबार से जरूर समाधान हो जाएगा। इसी धारण को देखते हुए डेढ़ दशक पहले लोगों ने जंगलों को बचाने के लिए देवी को अर्पित करने का मन बनाया। जब इस तरह के कदम के सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे तो कई जंगलों को देवी को अर्पित किया जाने लगा। डीडीहाट के पास धौलेत, हाटथर्प, कैणी के जंगल पांच वर्ष पहले कोटगाड़ी देवी को अर्पित किए गए। इन वर्षों में इन जंगलों में आए बदलाव से न केवल गांव वाले वरन वन विभाग के अधिकारी भी हैरान हैं।
धौलेत के जंगल को तो पहले अवैध कटान के कारण भारी नुकसान पहुंचा था। पांच वर्ष पहले गांव के लोगों ने मीटिंग की और सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया कि यह जंगल कोटगाड़ी देवी को अर्पित किया जाता है। इस आशय का एक बोर्ड भी जंगल की सीमा पर लगा दिया गया। जिस दिन जंगल को देवी को अर्पित किया गया, उसी दिन से जंगल में अवैध कटान रुक गया। देवी के कोप के भय से अवैध कटान करने वाले जंगल में जाने का साहस नहीं कर पाए। धौलेत निवासी प्रकाश बोरा ने बताया कि पांच वर्ष में जंगल इतना घना हो गया है कि उसमें अब जंगली जानवर भी दिखने लगे हैं। उन्होंने बताया कि मार्च 2017 में जंगल को देवी को अर्पित किए हुए पांच साल पूरे हो रहे हैं। तब एक बैठक और की जाएगी। इसमें तय किया जाएगा कि भविष्य में भी जंगल को देवी को अर्पित करने की इस परंपरा को जारी रखा जाए या नहीं।
इधर, हाटथर्प और कैणी के जंगलों में भी कटान चार साल से बंद है। जंगल में अब लोग चारे की घास लाने या फिर गिरी लकड़ियों को बीनने के लिए तक नहीं जाते। जंगलों को बढ़ते देख लोग इसे देवी की ही कृपा मानकर चलते हैं। यह दोनों जंगल भी कोटगाड़ी मंदिर को ही अर्पित किए गए हैं। वन रेंजर पूरन सिंह देउपा ने बताया कि देवी को अर्पित जंगलों में पेड़ों और वनस्पति की बढ़ोतरी अप्रत्याशित रूप से हो रही है। उन्होंने कहा कि जंगलों को नुकसान पहुंचाने वालों को रोकने के लिए इस कदम के परिणाम बेहतर ढंग से सामने आए हैं। खास बात यह है कि इन जंगलों की रक्षा के लिए वन विभाग को गश्त की जरूरत नहीं पड़ती। एक सर्वोच्च शक्ति और मनोवैज्ञानिक भय से लकड़ी काटने कोई नहीं जाता।