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मुनस्यारी के मैसरकुंड क्षेत्र में दिखा बियर्डेड वल्चर
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बियर्डेड वल्चर ।
- फोटो : PITHORAGARH
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पिथौरागढ़। मुनस्यारी के मैसरकुंड क्षेत्र में पक्षी प्रेमियों को लैम्गेर्जियर (बियर्डेड गिद्ध) दिखा है। इससे पक्षी प्रेमी काफी उत्साहित हैं। इसे दाढ़ी वाला और हड्डी तोड़ गिद्ध भी कहते हैं।
ये मरे जानवरों की हड्डियों को काफी ऊंचाई पर ले जाकर गिराता है। नीचे गिरकर हड्डी टूटने के बाद अंदर से निकली अस्थि मज्जा (बोन मैरो) को खा जाता है। हिमालयी क्षेत्रों में अभी सिर्फ ग्रिफान गिद्ध और लैम्गेर्जियर गिद्ध ही देखे जाते हैं।
बियर्डेड गिद्ध समुद्र तल से पांच सौ मीटर से चार हजार मीटर तक ऊंचाई तक पाए जाते हैं। इनकी लंबाई करीब 94 से 120 सेमी तक होती है। ये हिमालयन ग्रिफान के साथ बचे हुए अंतिम गिद्ध हैं। इन्हें संरक्षण की जरूरत है।
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बियर्डेड गिद्ध के आहार का 80 प्रतिशत हिस्सा अस्थि और अस्थि मज्जा होता है। इनके पेट के एसिड का पीएच स्तर करीब एक होता है, जिसकी वजह से ये हड्डी तक को 24 घंटे के भीतर पचा लेते हैं।
लैम्गेर्जियर और ग्रिफान गिद्ध पर्यावरण को साफ रखते हैं। अन्य गिद्धों की संख्या कम होने से इनके ऊपर पर्यावरण को साफ रखने की जिम्मेदारी अधिक बढ़ी है।
एक दवा की वजह से संकट में आए गिद्ध
पिथौरागढ़। पर्यावरण प्रेमी मनोज मटवाल बताते हैं कि नब्बे के दशक से पहले देश में गिद्धों की आबादी 40 लाख के करीब थी, लेकिन पिछले 15 से 20 वर्षों के दौरान डाइक्लोफिनेक नामक दवा ने भारत से गिद्धों की 85 से 95 फीसदी आबादी को साफ कर दिया।
दरअसल, इस दवा का इंजेक्शन बीमारी में पशुओं का लगाया जाता है और ऐसे पशुओं के मरने पर उसका मांस खाने से गिद्धों की मौत हो रही है।
कई गिद्धों की प्रजातियां हैं संकटग्रस्त
पिथौरागढ़। पर्यावरण प्रेमियों के अनुसार पिछले कुछ सालों गिद्धों की संख्या में काफी गिरावट दर्ज की गई है। अब सिर्फ लैम्गेर्जियर और ग्रिफॉन गिद्ध ही देखे जाते हैं।
इनकी संख्या भी पहले की तुलना में काफी कम हुई है। लाल सिर वाला गिद्ध, सफेद पीठ वाला गिद्ध, इजिपिशियन, व्हाइट रंपैड, लौंग बिल्ड संकट ग्रस्त प्रजातियों में शामिल हो चुकी है। इसके बाद भी इनके संरक्षण संबंधी प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।
लैम्गेर्जियर या जटायु गिद्ध दिखना अच्छा संकेत है। पहले ये बड़ी संख्या में पाए जाते थे, लेकिन कुछ सालों में इनकी संख्या में कमी दर्ज की गई है।
-त्रिलोक राणा, पक्षी प्रेमी
पिछले कुछ सालों में लैम्गेर्जियर और अन्य गिद्धों की संख्या में गिरावट आई है। पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने के गिद्धों की बड़ी भूमिका होती है। सरकार को इनके संरक्षण के लिए कार्य करने की जरूरत है। ताकि आने वाली पीढ़ी भी गिद्धों को देख सके।
- मनोज मटवाल, पर्यावरण प्रेमी।
पिछले कुछ सालों में गिद्धों की संख्या में कमी दर्ज की गई है। इनके सरंक्षण को लेकर कार्य किए जा रहे हैं, लोगों को जागरूक किया जा रहा है।
- डॉ. विनय भार्गव, डीएफओ पिथौरागढ़।
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ये मरे जानवरों की हड्डियों को काफी ऊंचाई पर ले जाकर गिराता है। नीचे गिरकर हड्डी टूटने के बाद अंदर से निकली अस्थि मज्जा (बोन मैरो) को खा जाता है। हिमालयी क्षेत्रों में अभी सिर्फ ग्रिफान गिद्ध और लैम्गेर्जियर गिद्ध ही देखे जाते हैं।
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बियर्डेड गिद्ध समुद्र तल से पांच सौ मीटर से चार हजार मीटर तक ऊंचाई तक पाए जाते हैं। इनकी लंबाई करीब 94 से 120 सेमी तक होती है। ये हिमालयन ग्रिफान के साथ बचे हुए अंतिम गिद्ध हैं। इन्हें संरक्षण की जरूरत है।
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बियर्डेड गिद्ध के आहार का 80 प्रतिशत हिस्सा अस्थि और अस्थि मज्जा होता है। इनके पेट के एसिड का पीएच स्तर करीब एक होता है, जिसकी वजह से ये हड्डी तक को 24 घंटे के भीतर पचा लेते हैं।
लैम्गेर्जियर और ग्रिफान गिद्ध पर्यावरण को साफ रखते हैं। अन्य गिद्धों की संख्या कम होने से इनके ऊपर पर्यावरण को साफ रखने की जिम्मेदारी अधिक बढ़ी है।
एक दवा की वजह से संकट में आए गिद्ध
पिथौरागढ़। पर्यावरण प्रेमी मनोज मटवाल बताते हैं कि नब्बे के दशक से पहले देश में गिद्धों की आबादी 40 लाख के करीब थी, लेकिन पिछले 15 से 20 वर्षों के दौरान डाइक्लोफिनेक नामक दवा ने भारत से गिद्धों की 85 से 95 फीसदी आबादी को साफ कर दिया।
दरअसल, इस दवा का इंजेक्शन बीमारी में पशुओं का लगाया जाता है और ऐसे पशुओं के मरने पर उसका मांस खाने से गिद्धों की मौत हो रही है।
कई गिद्धों की प्रजातियां हैं संकटग्रस्त
पिथौरागढ़। पर्यावरण प्रेमियों के अनुसार पिछले कुछ सालों गिद्धों की संख्या में काफी गिरावट दर्ज की गई है। अब सिर्फ लैम्गेर्जियर और ग्रिफॉन गिद्ध ही देखे जाते हैं।
इनकी संख्या भी पहले की तुलना में काफी कम हुई है। लाल सिर वाला गिद्ध, सफेद पीठ वाला गिद्ध, इजिपिशियन, व्हाइट रंपैड, लौंग बिल्ड संकट ग्रस्त प्रजातियों में शामिल हो चुकी है। इसके बाद भी इनके संरक्षण संबंधी प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।
लैम्गेर्जियर या जटायु गिद्ध दिखना अच्छा संकेत है। पहले ये बड़ी संख्या में पाए जाते थे, लेकिन कुछ सालों में इनकी संख्या में कमी दर्ज की गई है।
-त्रिलोक राणा, पक्षी प्रेमी
पिछले कुछ सालों में लैम्गेर्जियर और अन्य गिद्धों की संख्या में गिरावट आई है। पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने के गिद्धों की बड़ी भूमिका होती है। सरकार को इनके संरक्षण के लिए कार्य करने की जरूरत है। ताकि आने वाली पीढ़ी भी गिद्धों को देख सके।
- मनोज मटवाल, पर्यावरण प्रेमी।
पिछले कुछ सालों में गिद्धों की संख्या में कमी दर्ज की गई है। इनके सरंक्षण को लेकर कार्य किए जा रहे हैं, लोगों को जागरूक किया जा रहा है।
- डॉ. विनय भार्गव, डीएफओ पिथौरागढ़।