{"_id":"5bc4c97cbdec2269a842772e","slug":"tired-of-the-compensation","type":"story","status":"publish","title_hn":"मुआवजे की राह तकते थक गई आमा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मुआवजे की राह तकते थक गई आमा
ब्यूरो् /अमर उजाला, पिथौरागढ़।
Updated Mon, 15 Oct 2018 10:38 PM IST
विज्ञापन
ध्वस्त पनचक्की के पास बैठी लछिमा देवी।
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मदकोट (पिथौरागढ़)। दो जुलाई की आपदा में 80 वर्षीय बेसहारा आमा लछिमा देवी का मकान और पनचक्की भी बर्बाद हो गई। आमा को आज तक मुआवजा नहीं मिल पाया।
आमा लछिमा देवी गोरी पुल के पास बने मकान में ही पनचक्की चलाती थीं। इसमें गेहूं पिसाने आने वाले लोग आमा को उसका हिस्सा भी दे जाते थे। इसी से आमा का खर्चा चलता था। आपदा ने आमा को इस कदर जख्म दिए कि उनकी सूनी आंखें आज भी मलबे में अपनी पनचक्की को ढूंढती हैं। उनकी तीन शादीशुदा बेटियां हैं। एक बेटा था जिसकी कई साल पहले मौत हो गई। पति की 15 वर्ष पूर्व ही मौत हो गई थी। तब से पनचक्की ही आमा का सहारा थी। उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिल पाया।
पनचक्की आपदा राहत में नहीं आती है। मुख्यमंत्री राहत कोष से सहायता दिलाने के लिए प्रस्ताव भेजा गया है।
- डॉ. ललित मोहन तिवारी, तहसीलदार मुनस्यारी।
विज्ञापन
आमा लछिमा देवी गोरी पुल के पास बने मकान में ही पनचक्की चलाती थीं। इसमें गेहूं पिसाने आने वाले लोग आमा को उसका हिस्सा भी दे जाते थे। इसी से आमा का खर्चा चलता था। आपदा ने आमा को इस कदर जख्म दिए कि उनकी सूनी आंखें आज भी मलबे में अपनी पनचक्की को ढूंढती हैं। उनकी तीन शादीशुदा बेटियां हैं। एक बेटा था जिसकी कई साल पहले मौत हो गई। पति की 15 वर्ष पूर्व ही मौत हो गई थी। तब से पनचक्की ही आमा का सहारा थी। उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिल पाया।
पनचक्की आपदा राहत में नहीं आती है। मुख्यमंत्री राहत कोष से सहायता दिलाने के लिए प्रस्ताव भेजा गया है।
- डॉ. ललित मोहन तिवारी, तहसीलदार मुनस्यारी।