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निकाला जाने लगा भेड़ों से ऊन
ब्यूरो/अमर उजाला, डीडीहाट
Updated Sat, 24 Sep 2016 10:53 PM IST
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भेड़ से ऊन निकालते भेड़पालक गंभीर सिंह
- फोटो : अमर उजाला
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उच्च हिमालयी क्षेत्रों के बुग्यालों में भेड़ों के साथ गए लोग अब घाटियों में उतरने की तैयारी करने लगे हैं। घाटियों में जाने से पहले हर भेड़ से ऊन निकाल लिया जाता है, ताकि भेड़ों को घाटियों में गर्मी का असर न हो और उनको लंबी दूरी तय करने में परेशानी न हो। अब उच्च हिमालयी बुग्यालों से भेड़पालक निचले इलाकों पर उतर आए हैं। अक्तूबर प्रथम सप्ताह से इनका माइग्रेशन शुरू हो जाएगा।
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बिर्थी निवासी गंभीर सिंह कोरंगा ने बताया कि भेड़ों का मुख्य महत्व ऊन के लिए ही है। भेड़ों से वर्ष में दो बार ऊन निकालना जरूरी होता है। बड़ी भेड़ से कम से कम एक किलोग्राम ऊन प्राप्त हो जाता है। कच्चे ऊन की कताई करने के बाद धागा तैयार होता है। उसी धागे से स्वेटर, दन, पंखी, मफलर, टोपी तैयार की जाती हैं। उन्होंने बताया कि कच्चे ऊन की बिक्री भी हो जाती है। यह 200 रुपये किलो तक बिक जाता है।
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उन्होंने जानकारी दी कि भेड़ों से एक बार ऊन माइग्रेशन पर जाने से पहले और एक बार माइग्रेशन से लौटने के बाद निकाला जाता है। माइग्रेशन वाले मूल गांवों में यह लोग छह महीने तक रहते हैं। अब ऊंचाई वाले इलाकों में ठंड शुरू हो गई है। इस कारण धीरे-धीरे भेड़पालक निचले इलाकों की ओर आने लगे हैं।
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