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बंदरलीमा के आपदा प्रभावितों की नहीं ली सुध

Thu, 07 Jul 2016 10:22 PM IST
राजेंद्र सामंत/अमर उजाला, कनालीछीना
राजेंद्र सामंत/अमर उजाला, कनालीछीना Updated Thu, 07 Jul 2016 10:22 PM IST
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The disaster has not affected Bandrlima improvements
आपदा के दौरान टूटा मकान - फोटो : अमर उजाला

बादल फटने से एक जुलाई को बंदरलीमा में पांच मकान क्षतिग्रस्त हो गए थे। 17 मकानों में दरार आ गई थी। गांव की पहाड़ी बुरी तरह दरकी है। गांव रहने लायक नहीं रह गया है। गांव से आधे लोग अन्यत्र जा चुके हैं, लेकिन सरकार और उसके अमले का ध्यान बंदरलीमा की ओर अब तक नहीं गया। घटना के छठे दिन पटवारी क्षति का आकलन करने गांव पहुंचा। बंदरलीमा गांव जिले का प्रमुख केला उत्पादक गांव है। बादल फटने से केले के बागों को भी भारी नुकसान पहुंचा है।

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केला उत्पादन और सीमा सड़क संगठन में मजदूरी करने वाले बंदरलीमा के 30 परिवार इस समय भारी मुसीबत में हैं। गांव की पहाड़ी कई जगह से दरक गई है। गांव रहने लायक नहीं रह गया है। गांव के नवीन भट्ट, भाष्कर भट्ट कहते है कि घटना के दिन ही जिला प्रशासन को सूचना दे दी थी। छठे दिन छह जुलाई को पटवारी महेश प्रसाद गांव पहुंचा।
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बताते हैं कि हादसे में गांव के गोविंद भट्ट, घनश्याम भट्ट, प्रदीप चंद्र भट्ट, ऊर्बा दत्त और सरस्वती देवी का मकान ध्वस्त हो गया था। महेश चंद्र, जमुना दत्त, भुवन चंद्र, लीलाधर, कैलाश चंद्र, भाष्कर भट्ट, महादेव भट्ट, कृष्णानंद, घनश्याम, जगदीश चंद्र, रमेश चंद्र, धर्मानंद, जीवन चंद्र, नवीन भट्ट, दिनेश भट्ट, जगदीश चंद्र, चंद्रा देवी के मकानों में दरार आ गई है। मकान रहने लायक नहीं रह गए हैं। इन लोगों ने भाष्कर भट्ट, हरी दत्त भट्ट और श्याम दत्त भट्ट के मकान में शरण ले रखी है। 
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उनकी भी सुध तंत्र को लेनी चाहिए थी
बंदरलीमा के लोग कहते हैं कि उनकी भी सुध सरकारी तंत्र को लेनी चाहिए थी। प्रभावित लोग दूसरे के मकानों में रह रहे हैं। कई लोग गांव छोड़ चुके हैं। पांच दिन तक सरकारी अमला गांव न पहुंचा। छठे दिन पटवारी गांव पहुंचा। क्षति के आकलन के सिवा कोई मदद प्रभावितों को नहीं मिली।

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