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बिखरा सामान कह रहा बर्बादी की दास्तां
कालिका रावल/अमर उजाला, बस्तड़ी
Updated Tue, 05 Jul 2016 10:49 PM IST
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बिखरा सामान
- फोटो : अमर उजाला
कभी खुशहाल माने जाने वाला बस्तड़ी गांव आज पूरी तरह बर्बाद हो चुका है। इधर-उधर बिखरे बर्तन, कपड़े, बच्चों के कापी-किताब गांव की बर्बादी की कहानी कह रहे हैं। 30 जून की रात और एक जुलाई की सुबह बस्तड़ी गांव के ऊपर की पहाड़ी पर बादल फटने से जमीन कई स्थानों से दरकी है। बस्तड़ी के ठीक ऊपर स्थित सिंघाली के पास तक बादल फटने से तबाही के निशान साफ दिख रहे हैं। पहाड़ी से पानी, मलबे के कई नाले फूटे हैं। बस्तड़ी अब इतना असुरक्षित हो गया है कि लोग पूर्वजों की माटी को छोड़ने को मजबूर हैं। बस्तड़ी से नीचे पत्थरकोट, उड़मा और दिगरा का नाम भी असुरक्षित गांवों में शुमार हो गया है।
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27 परिवारों की चहल-पहल से गुलजार रहने वाले उपजाऊ माने जाने बस्तड़ी गांव में आज सन्नाटा है। खोजबीन के काम में लगे सुरक्षा बलों के जवानों के फावड़े, गैंती, बेलचे, और मशीनों की आवाज ही सन्नाटे को चीरती है। सोमवार को बस्तड़ी में मोहन चंद्र भट्ट के मकान से चार जानवर जिंदा निकले तो किसी मानव के भी जिंदा होने की हल्की सी उम्मीद दिखाई दी। जानवरों के जिंदा मिलने के बाद सेना, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, आईटीबीपी, एसएसबी और पुलिस के जवानों ने और तेजी दिखाई। एक मकान के मलबे को काफी नीचे तक साफ किया गया। हादसे को ज्यों-ज्यों दिन गुजरते जा रहे हैं। मलबे में दबे लोगों के जिंदा होने की संभावनाएं उतनी ही कम होती जा रही हैं।
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बस्तड़ी हादसे की चश्मदीद बस्तड़ी निवासी रंजना भट्ट ने इस हादसे में अपने देवर को खोया है। वह अब भी हादसे को याद कर सिहर उठती हैं। बताती हैं कि 30 जून की रात करीब डेढ़ बजे गांव के दाहिने छोर पर भूस्खलन हुआ। मलबा चंद्र बल्लभ पुत्र हरी दत्त के मकान को बहा ले गया। गांव के लोग राहत, बचाव के कार्य में जुटे थे। एक जुलाई की सुबह साढ़े छह बजे गांव के बाएं छोर से जबरदस्त आवाज के साथ धूल का गुबार उठा। पहाड़ी का सारा मलबा गांव की ओर बढ़ने लगा। पलक झपकते ही पांच और मकान जमीदोज हो गए। इसके साथ ही राहत, बचाव के काम में लगे गांव के युवा, बुजुर्ग मलबे में दफन हो गए।
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जानवरों को भी ले जा रहे हैं गांव से
प्रकृति के कोप की मार झेल रहे बस्तड़ी के जीवित बचे 35 लोगों ने गांव से एक किमी ऊपर सिंघाली के जीआईसी और प्राथमिक स्कूल में बनाए गए राहत शिविर में शरण ली है। कुछ लोग सिंघाली में अपने रिश्तेदारों के वहां पनाह लिए हैं। जीवित बचे पालतू जानवरों को भी लोग गांव से निकाल रहे हैं। ओगला से बस्तड़ी पहुंची बुजुर्ग महिला गंगा पाठक आईटीबीपी के जवानों की मदद से कुछ जानवरों को सिंघाली की ओर ले जा रहीं थीं। गंगा ने इस हादसे में भाई दामोदर भट्ट और बहू को खोया है। रुंधे गले से कहा कि घर में जानवरों की देखरेख करने वाला कोई नहीं रह गया है।