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आपदाग्रस्त लुमती वन पंचायत में पौधरोपण से भूकटाव को रोकने की पहल
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पिथौरागढ़ के आपदा क्षे लुमती में स्थापित नर्सरी के बारे में जानकारी देते विशेषज्ञ। (संवाद न्यूज ?
- फोटो : PITHORAGARH
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पिथौरागढ़। वन अनुसंधान रेंज ने लुमती वन पंचायत में पौधरोपण में भूकटाव को रोकने के लिए पहल शुरू कर दी है। पौधरोपण से भूकटाव रोकने में मदद मिलेगी। इसके लिए यहां पर एक नर्सरी बनाई गई है। वहीं क्षेत्र में आर्किड की होस्ट (मेजबान) प्रजातियों के पौधों का रोपण कर आर्किड संरक्षण के लिए कार्य किया जाएगा।
अनुसंधान के रेंजर शैलेश घिल्डियाल ने बताया कि लुमती क्षेत्र भूस्खलन की दृष्टि से खतरनाक जोन में है। पौधरोपण से यहां मिट्टी के कटाव को रोका जा सकता है। यहां पर एक वन अनुसंधान रेंज बनाई जा रही है। जीबी पंत इंस्टीट्यूट कटारमल अल्मोड़ा की ओर से इसी अभियान के तहत एक नर्सरी प्रशिक्षण देकर ग्रामीणों को तकनीकी जानकारी दी गई है।
आर्किड संरक्षण क्षेत्र में भी बांज, तुन आदि आर्किड की होस्ट प्रजातियों का रोपण किया गया है। इस अभियान में विशेषज्ञ भी ग्रामीणों को जानकारियां दे रहे हैं। एलएसएम महाविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राचार्य फर्न विशेषज्ञ डॉ. एन पुनेठा ने इलाके में पाए जाने वाली टेरिडोफाइटा की विभिन्न प्रजातियों, पौधरोपण और नर्सरी के फायदे बताए।
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वनस्पति विज्ञान के डॉ. कमलेश भाकुनी ने भी हिस्सा लिया। ग्रामीणों को गोरी घाटी की स्थानीय उपयोगी वनस्पतियों के बारे में बताया। जीबी पंत इंस्टीट्यूट से आए शोधार्थियों नरेंद्र परिहार, विभाष ध्यानी, अमित बहुखंडी, कुलदीप जोशी, दीपक ने भी कई जानकारियां दीं।
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अनुसंधान के रेंजर शैलेश घिल्डियाल ने बताया कि लुमती क्षेत्र भूस्खलन की दृष्टि से खतरनाक जोन में है। पौधरोपण से यहां मिट्टी के कटाव को रोका जा सकता है। यहां पर एक वन अनुसंधान रेंज बनाई जा रही है। जीबी पंत इंस्टीट्यूट कटारमल अल्मोड़ा की ओर से इसी अभियान के तहत एक नर्सरी प्रशिक्षण देकर ग्रामीणों को तकनीकी जानकारी दी गई है।
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आर्किड संरक्षण क्षेत्र में भी बांज, तुन आदि आर्किड की होस्ट प्रजातियों का रोपण किया गया है। इस अभियान में विशेषज्ञ भी ग्रामीणों को जानकारियां दे रहे हैं। एलएसएम महाविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राचार्य फर्न विशेषज्ञ डॉ. एन पुनेठा ने इलाके में पाए जाने वाली टेरिडोफाइटा की विभिन्न प्रजातियों, पौधरोपण और नर्सरी के फायदे बताए।
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वनस्पति विज्ञान के डॉ. कमलेश भाकुनी ने भी हिस्सा लिया। ग्रामीणों को गोरी घाटी की स्थानीय उपयोगी वनस्पतियों के बारे में बताया। जीबी पंत इंस्टीट्यूट से आए शोधार्थियों नरेंद्र परिहार, विभाष ध्यानी, अमित बहुखंडी, कुलदीप जोशी, दीपक ने भी कई जानकारियां दीं।