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ओबीसी आरक्षण से भड़की थी राज्य आंदोलन की ज्वाला
कालिका रावल/अमर उजाला, पिथौरागढ़
Updated Thu, 08 Nov 2018 10:40 PM IST
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वर्ष 1994 के राज्य आंदोलन के दौरान चंडाक मैग्नेसाइट फैक्ट्री के पास एकत्र आंदोलनकारी
- फोटो : अमर उजाला
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यूं तो राज्य गठन की लड़ाई बड़ी लंबी रही है, लेकिन वर्ष 1994 में जो ज्वाला भड़की, उसमें 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण ने अहम भूमिका निभाई। 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को लेकर भड़की आग ने राज्य आंदोलन की ज्वाला का रूप ले लिया था। 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण के खिलाफ चिंगारी भड़काने वाले थे निर्मल पंडित। अफसोस राज्य आंदोलन में 56 दिन तक फतेहगढ़ जेल में रहे निर्मल को राज्य आंदोलनकारी तक राज्य सरकार ने नहीं माना।
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वर्ष 1994 में राज्य की मुलायम सिंह सरकार ने ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण की घोषणा की। आरक्षण को लेकर लोगों में रोष पनप उठा। 27 जुलाई 1994 को छात्रनेता निर्मल जोशी पंडित ने पिथौरागढ़ महाविद्यालय में प्रवेश पत्र फाड़कर ओबीसी आरक्षण की मुखालफत की। ओबीसी आरक्षण के विरोध में पूरे राज्य में छात्रशक्ति और अन्य लोग लामबंद हो गए। आरक्षण की आग पूरे पर्वतीय क्षेत्र में फैली तो लोगों ने उत्तर प्रदेश में नहीं रहने का मन बना लिया और पृथक पर्वतीय राज्य की दशकों से उठ रही मांग को लेकर लोगों ने कमर कस ली।
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इसके बाद समूचे पर्वतीय क्षेत्र में कर्फ्यू जैसे हालात पैदा हो गए। राज्य आंदोलन की आग ने उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों को भी अपनी चपेट में ले लिया। छात्र, व्यापारी, युवा, मातृशक्ति, सरकारी कर्मचारी भी राज्य आंदोलन में कूद पड़े। हफ्तों तक बाजार बंद रहे।
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राज्य के लोगों ने खटीमा, मसूरी जैसे गोलीकांड देखे तो तत्कालीन मुलायम सरकार की बर्बरता मुजफ्फरनगर कांड के रूप में झेली। राज्य आंदोलनकारियों को गोलियों का शिकार होना पड़ा। 2 अक्तूबर 1994 की दिल्ली रैली ऐतिहासिक रही। 2 अक्तूबर की सुबह राज्य आंदोलनकारियों से भरे हजारों वाहन दिल्ली की सीमा में प्रवेश कर गए। राज्य आंदोलनकारियों की फौज को देखकर दिल्ली के बाजार बंद हो गए थे। आंदोलनकारियों की बसों को बुराड़ी नामक स्थान पर खड़ा किया गया, वहां से आंदोलनकारियों का सैलाब लालकिले की ओर कूच कर गया।
लालकिला मैदान में मंच पर उक्रांद के शीर्ष नेता इंद्रमणि बडोनी संबोधन कर रहे थे, तभी भीड़ की ओर से पत्थरबाजी शुरू हो गई, एक पत्थर बडोनी के सिर पर लगा, वह घायल हो गए। माइक की छीनाझपटी होने लगी। लालकिला मैदान में भगदड़ मच गई। उक्रांद कार्यकर्ता घायल बडोनी को अस्पताल ले जाने के लिए निकले। इसी दौरान दिल्ली पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। पुलिस की लाठियों से उक्रांद के शीर्ष नेता काशी सिंह ऐरी का हाथ फ्रैक्चर हो गया। दिल्ली रैली, मुजफ्फरनगर कांड ने राज्य प्राप्ति की पटकथा लिख दी और छह साल बाद 9 नवंबर 2000 को अलग राज्य प्राप्त हो गया।
रोडवेज की जिप्सी पर कब्जा पर राज्य में घूमे थे पंडित
पिथौरागढ़। शराब आंदोलन की भेंट चढ़े स्वर्गीय निर्मल पंडित का राज्य आंदोलन की शुरुआत करने से लेकर धार देने में अहम भूमिका रही। पंडित ने सितंबर 1994 में जब राज्य आंदोलन चरम पर था। पिथौरागढ़ रोडवेज डिपो के एआरएम की लाल रंग की जिप्सी पर कब्जा कर उसमें मुख्यमंत्री उत्तराखंड अंतरिम सरकार का बोर्ड और लाल बत्ती लगाकर समूचे राज्य का दौरा कर डाला।
हल्द्वानी में पीपल के पेड़ पर चढ़ गए थे आंदोलनकारी
पिथौरागढ़। एक अक्तूबर को दिल्ली रैली में शामिल होने जा रहे आंदोलनकारियों को प्रशासन ने हल्द्वानी में रोक लिया। इसके विरोध में आंदोलनकारी पीपल के पेड़ पर चढ़ गए और अनुमति न देने पर पेड़ से कूदने की धमकी दे डाली। इससे पुलिस, प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए। छात्र नेताओं ने हल्द्वानी के मुंसिफ कोर्ट में रैली में जाने की अनुमति देने के लिए प्रार्थना पत्र दिया। अदालत के आदेश पर आंदोलनकारी दिल्ली रवाना हो पाए।
गंगोलीहाट पुलिस चौकी में पंडित ने किया था आत्मदाह का प्रयास
पिथौरागढ़। निर्मल पंडित ने सितंबर 1994 में गंगोलीहाट पुलिस चौकी में तत्कालीन एसडीएम बीएस पुंडीर के सामने स्वयं को आग लगा दी। पुलिस और अन्य आंदोलनकारियों ने पंडित के शरीर पर लगी आग बुझाई। वह मामूली रूप से झुलसे थे।
धूमिल की राज्य गठन की अवधारणा : कापड़ी
पिथौरागढ़। उक्रांद के शीर्ष नेताओं में शुमार चंद्रशेखर कापड़ी राज्य के वर्तमान हालात से खासे व्यथित हैं। वह कहते हैं कि जिस अवधारणा के साथ उत्तराखंड के लोगों ने अपना घरबार छोड़कर राज्य आंदोलन की लड़ाई लड़ी, कुर्बानियां दी, वह सब आज व्यर्थ गंवाने जैसा प्रतीत होता है। राज्य बनने के बाद प्रदेश में बारी-बारी से सत्ता संचालन कर रहे राजनीतिक दल पहाड़ के पानी और जवानी का उपयोग तक नहीं कर पाए। राज्य गठन के मुद्दे हाशिये पर हैं।