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ऐतिहासिक जौलजीबी को इतिहास बनने से बचाने के लिए कब होंगे सुरक्षा के प्रबंध

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Fri, 04 Feb 2022 11:42 PM IST
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No Devlopment in Jauljibi
काली-गोरी के संगम पर बसा जौलजीबी। - फोटो : PITHORAGARH
भक्त दर्शन पांडेय
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जौलजीबी (पिथौरागढ़)। भारत-नेपाल और तिब्बत तीन देशों की संस्कृति की झलक दिखाने वाला जौलजीबी आज भी उपेक्षित हाल में है। लोग कहते हैं शासन प्रशासन को ऐतिहासिक जौलजीबी की याद केवल हर साल व्यापारिक मेले में ही आती है, फिर इसे इसी के हाल पर छोड़ दिया जाता है। दो-दो नदियों काली और गोरी के संगम पर बसे इस ऐतिहासिक स्थल की सुरक्षा के प्रबंध नहीं हुए तो कभी भी यह इतिहास बन सकता है।
टनकपुर-तवाघाट नेशनल हाइवे पर स्थित जौलजीबी की पहचान यहां लगने वाले व्यापारिक महत्व के जौलजीबी मेले से है। अस्कोट के पाल राजाओं का स्थापित किया हुआ प्रसिद्ध ज्वालेश्वर महादेव मंदिर यहां स्थित है। जौलजीबी के बायीं ओर से काली तो दाईं ओर से गोरी नदी बहती है। इन दोनों नदियों के नजदीक ढाई सौ परिवार रहते हैं। साल 2013 की आपदा में यहां के मेला स्थल सहित कई घरों में मलबा भर गया था। तटबंध के पत्थरों को भी नदी बहा ले गई थी।
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लोग कहते हैं बरसात में दोनों नदियां उफान पर आती हैं तो हर समय डर लगा रहता है। जब भी क्षेत्र में कोई अधिकारी या नेता आता है हर बार उनसे सुरक्षा का प्रबंध करने की मांग जनता करती है। आज तक वादे तो बहुत हुए लेकिन काम नहीं हुआ।
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लोगों की मांग मेला स्थल तक बने सड़क
जौलजीबी। जौलजीबी मेले की शुरुआत साल 1871 में अस्कोट के पाल राजा पुष्कर पाल ने की थी। अंग्रेजों ने भी 15 वर्षों तक मेले का संचालन किया। 1962 में जौलजीबी कस्बे से नेशनल हाइवे बना लेकिन इस हाइवे के बनने के छह दशक बाद भी मेला स्थल तक सड़क नहीं पहुंचाई जा सकी। स्थानीय लोगों ने ऐतिहासिक मेला स्थल तक सड़क निर्माण कराने की मांग है। लोगों का कहना है कि जौलजीबी में गोरी नदी पर बने मोटर पुल से मेला स्थल तक नदी किनारे तटबंध के साथ ही उस पर सड़क बनायी जानी चाहिए।
इससे गांव, मेला स्थल और बाजार की नदी के कटाव से सुरक्षा तो होगी ही, साथ ही हर साल मेले में आने वाले व्यापारियों को भी सुविधा मिलेगी। स्थानीय व्यापारियों ने बताया कि मेला स्थल तक झूले चरखे लाने, ले जाने का खर्च ही एक लाख रुपये के करीब लग जाता है। इसलिए झूले-चरखे वाले व्यापारी मेले में आने से कतराते हैं। ऑनलाइन व्यापार, जगह-जगह मॉल खुलने आदि से व्यापारिक मेले भी प्रभावित हुए हैं। खरीदारी के अलावा मनोरंजन के लिए भी लोग आते हैं ऐसे में सुविधाओं का विस्तार तो करना ही चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय झूला पुल शाम सात बजे तक खुलना चाहिए
जौलजीबी। जौलजीबी कस्बे का बाजार भारत के साथ ही नेपाल से आने वाले ग्राहकों पर भी निर्भर है। साल 2013 की आपदा में झूलापुल बहने से यहां का व्यापार प्रभावित हुआ था। इसके बाद डेढ़ साल बाद पुल बना तो कुछ वर्षों तक व्यापार ठीक रहा। साल 2020 से कोरोना के कारण फिर झूलापुल बंद होने से नेपाल से आना-जाना ठप हो गया। पिछले साल तमाम प्रतिबंधों के बीच झूलापुल खुला तो सही लेकिन इसका बंद होने का समय शाम पांच बजे रखा गया है। इस कारण व्यापार बढ़ नहीं पा रहा है। व्यापारियों का कहना है कि जौलजीबी में भी झूलापुल को धारचूला की तरह शाम सात बजे तक खुला रखा जाना चाहिए।
बीएसएनएल के सिग्नल नहीं आते
जौलजीबी। नेपाल से लगे लगभग 1200 की आबादी वाले जौलजीबी कस्बे में बीएसएनएल के सिग्नल नहीं आते हैं। भारत की ओर टावर लगाया गया है लेकिन सामने नेपाल तक सिग्नल न जाएं इसके लिए सुरक्षा कारणों को देखते हुए रेंज कम की गई है। टावर की रेंज कम होने से स्थानीय लोगों के मोबाइल तक सिग्नल नहीं पहुंच पाते हैं। इस समय यहां के लोग जिओ के नेटवर्क के सहारे हैं। जिन घरों तक सिग्नल नहीं पहुंचते हैं वहां बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई में भी परेशानी होती है।
दार्चुला-गोकुल्या सड़क बनने से व्यापार पर पड़ा है असर
जौलजीबी। भारत-नेपाल का व्यापारिक स्थल रहे जौलजीबी का व्यापार अब सिमट गया है। इसका बड़ा कारण नेपाल के दार्चुला से गोकुल्या तक सड़क लिंक होना है। नेपाल ने दार्चुला- बलुवाकोट-दत्तू-मेलखेत-पस्ती-गोकुल्या-महेंद्रनगर-धनगढ़ी-काठमांडू तक सड़क लिंक कर दी है। बलुवाकोट के बाद यह सड़क नेपाल की ओर काफी भीतर बनने से जौलजीबी कट गया। इसके बाद नेपाल के लोगों ने जौलजीबी के बजाय धारचूला या बलुवाकोट से आवाजाही करनी शुरू कर दी है, जिस कारण व्यापार प्रभावित हुआ है।

बुखार आने पर लगानी होती है पिथौरागढ़ की दौड़
जौलजीबी। जौलजीबी को भले ही ऐतिहासिक स्थल कहा जाता हो लेकिन सुविधाओं के नाम पर यहां एक अस्पताल तक नहीं है। एकमात्र आयुर्वेदिक अस्पताल है। वह भी पुराने भवन में संचालित हो रहा है। बुखार से लेकर अन्य कोई समस्या होने पर 25 किमी दूर धारचूला या फिर जिला मुख्यालय पिथौरागढ़ जाना पड़ता है।
क्या कहते हैं स्थानीय लोग
- पूर्व व्यापार संघ अध्यक्ष भूपाल चंद कहते हैं कि असुविधाओं के अभाव में काफी संख्या में लोगों ने पलायन कर दिया है।
- व्यापार संघ अध्यक्ष धीरेंद्र धर्मशक्तू का कहना है गोरी नदी से सुरक्षा के लिए तटबंध बनाया जाना चाहिए। मेला स्थल को भी सड़क से जोड़ा जाना जरूरी है।
- वरिष्ठ समाजसेवी शकुंतला दताल भी जौलजीबी की सुरक्षा के लिए तटबंध और जौलजीबी पुल से मेला स्थल तक सड़क निर्माण की पक्षधर हैं।
- समाजसेवी ललित लबेला ने बताया कि जौलजीबी में सबसे बड़ी समस्या नेटवर्क की है। अच्छी संचार सेवा न होने से बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई प्रभावित होती है।
- वरिष्ठ व्यापारी सुरेंद्र सिंह पतियाल कहते हैं कि जौलजीबी के ऐतिहासिक मेला स्थल और नदी किनारे बसी आबादी की सुरक्षा जरूरी है।
- व्यापार संघ संरक्षक संजय दताल ने बताया कि जौलजीबी में स्वास्थ्य की सुविधा नहीं है। यहां के व्यापारी बंदरों की समस्या से भी परेशान हैं।
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