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पलायन से वीरान हुआ मिलम गांव
अमर उजाला ब्यूराे पिथौरागढ़।
Updated Fri, 11 May 2018 11:24 PM IST
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वीरान मिलम गांव।
- फोटो : अमर उजाला
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भारत-तिब्बत व्यापार के जोहार घाटी का मुख्य पड़ाव मिलम गांव अब वीरान होने लगा है। यहां से जा चुके ग्रामीण कई वर्षों बाद भी अपने गांव में वापस ही नहीं आए। देखरेख के अभाव में इनके घर खंडहर होने की कगार पर आ गए हैं।
वर्ष 1962 से पहले जोहार घाटी के लोग तिब्बत व्यापार करने के लिए मिलम गांव से आवागमन करते थे। उस समय मिलम गांव व्यापार का मुख्य केंद्र था। हजारों की संख्या में जोहार घाटी के लोग मिलम से तिब्बत को आते-जाते थे। भारत-चीन युद्ध के बाद यहां से भारत तिब्बत व्यापार खत्म हो गया। इसके बाद ग्रामीणों ने यहां जाना शुरू कर दिया। 90 के दशक तक ग्रामीण हर साल अपने गांवों में आते रहते थे, लेकिन सीमांत के विकास की ठोस नीति न होने से अब लोगों ने गांवों में आना ही छोड़ दिया है। इससे इन लोगों के घर खंडहर होने की कगार पर आ गए हैं। एक ओर चीन भारत-तिब्बत सीमा पर सुविधाएं लगातार बढ़ा रहा है। वहीं, भारत में सीमा पर बसे लोग अंतिम गांव तक पहुंचने के लिए 80 से 100 किमी की पैदल दूरी तय कर रहे हैं।
जोहार, दारमा, व्यास घाटी के अंतिम गांव के लोग आज भी सड़क, संचार, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से पूरी तरह वंचित हैं। संचार के नाम पर भारत सरकार सुरक्षा का हवाला देकर न तो मोबाइल टावर और न ही फाइबर लाइनों को बिछाने की अनुमति दे रही है, जबकि चीन और नेपाल की सीमा पर मोबाइल टावर हैं। सीमांत क्षेत्र के विकास पर चीन भारत से काफी आगे है। आईटीबीपी से मिली सूचना के अनुसार अब दो-तीन माह में इक्का-दुक्का लोग ही मिलम गांव आते हैं।
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वर्ष 1962 से पहले जोहार घाटी के लोग तिब्बत व्यापार करने के लिए मिलम गांव से आवागमन करते थे। उस समय मिलम गांव व्यापार का मुख्य केंद्र था। हजारों की संख्या में जोहार घाटी के लोग मिलम से तिब्बत को आते-जाते थे। भारत-चीन युद्ध के बाद यहां से भारत तिब्बत व्यापार खत्म हो गया। इसके बाद ग्रामीणों ने यहां जाना शुरू कर दिया। 90 के दशक तक ग्रामीण हर साल अपने गांवों में आते रहते थे, लेकिन सीमांत के विकास की ठोस नीति न होने से अब लोगों ने गांवों में आना ही छोड़ दिया है। इससे इन लोगों के घर खंडहर होने की कगार पर आ गए हैं। एक ओर चीन भारत-तिब्बत सीमा पर सुविधाएं लगातार बढ़ा रहा है। वहीं, भारत में सीमा पर बसे लोग अंतिम गांव तक पहुंचने के लिए 80 से 100 किमी की पैदल दूरी तय कर रहे हैं।
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जोहार, दारमा, व्यास घाटी के अंतिम गांव के लोग आज भी सड़क, संचार, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से पूरी तरह वंचित हैं। संचार के नाम पर भारत सरकार सुरक्षा का हवाला देकर न तो मोबाइल टावर और न ही फाइबर लाइनों को बिछाने की अनुमति दे रही है, जबकि चीन और नेपाल की सीमा पर मोबाइल टावर हैं। सीमांत क्षेत्र के विकास पर चीन भारत से काफी आगे है। आईटीबीपी से मिली सूचना के अनुसार अब दो-तीन माह में इक्का-दुक्का लोग ही मिलम गांव आते हैं।
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