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Pithoragarh: हिलजात्रा के लिए सजने लगे मुखौटे, लखिया भूत के आगमन पर होता है समापन; 500 साल पुराना है इतिहास

Mon, 19 Aug 2024 03:50 PM IST
हीरा मेहरा अमर उजाला नेटवर्क, पिथौरागढ़
अमर उजाला नेटवर्क, पिथौरागढ़ Published by: हीरा मेहरा Updated Mon, 19 Aug 2024 03:50 PM IST
सार

हिलजात्रा की असल शुरुआत पिथौरागढ़ जिले के कुमौड़ गांव से हुई है, इसका इतिहास करीब 500 साल पुराना है। इस पर्व पर बैल, हिरण, चीतल और लखिया भूत जैसे दर्जनों पात्र मुखौटों के साथ मैदान में उतरकर दर्शकों को रोमांचित करते हैं। 

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Masks started getting decorated for Hiljatra festival in Pithoragarh
हिलजात्रा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

 

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आस्था, विश्वास और रोमांच का प्रतीक हिलजात्रा पर्व नजदीक है। युवा, बुजुर्ग इसकी तैयारी में जुट गए हैं। कुमौड़ के साथ ही सतगढ़, देवलथल, खतीगांव, सिरोली सहित विभिन्न हिस्सों में मनाया जाने वाला हिलजात्रा पर्व जिले में विशिष्ट पहचान रखता जो आस्था से जुड़ा मुखौटा नृत्य शैली का उदाहरण है। मुखौटों के साथ मनाए जाने वाले इस उत्सव में लोक जीवन के साथ आस्था और हास्य का भी समावेश मिलता है। लखिया भूत, महाकाली, हिरण, शिव बारात, और बैलों की जोड़ी हिलाजात्रा पर्व का मुख्य आकर्षण रहते हैं। बड़ी संख्या में इन क्षेत्रों में पहुंचकर लोग अद्भुत कलाकारी के दीदार करते हैं। हिलजात्रा में स्वांग रचने के लिए मुखौटे सजने लगे हैं। 

लखिया भूत के आगमन पर होता है हिलजात्रा का समापन
हिलजात्रा की असल शुरुआत पिथौरागढ़ जिले के कुमौड़ गांव से हुई है, इसका इतिहास करीब 500 साल पुराना है। मान्यता के अनुसार इंद्रजाता में शामिल होने गए इस गांव के चार महर भाईयों की बहादुरी से खुश होकर नेपाल नरेश ने यश और समृद्धि के प्रतीक मुखौटे उन्हें इनाम में दिए थे। तभी से नेपाल की ही तर्ज पर यह पर्व सोर घाटी पिथौरागढ़ में भी हिलजात्रा के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है।

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इस पर्व पर बैल, हिरण, चीतल और लखिया भूत जैसे दर्जनों पात्र मुखौटों के साथ मैदान में उतरकर दर्शकों को रोमांचित करते हैं। लखिया भूत के आगमन के साथ हिलजात्रा पर्व का समापन होता है। भगवान शिव का गण लखिया भूत लोगों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देता है।

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सतगढ़ गांव के हिरन और महाकाली को मिली प्रसिद्धि
पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से 20 किमी दूर सतगढ़ गांव में मनाये जाने वाले हिलजात्रा पर्व की महाकाली और हिरण विशेष पहचान हैं। यहां के हिरण को इतनी प्रसिद्धि मिली कि गांव के युवाओं को हिरण का मंचन करने देहरादून के राजभवन आमंत्रित किया गया। राजभवन में भी युवाओं ने अपनी कलाकारी की अमिट छाप छोड़ी। इसके अलावा जिला मुख्यालय में होने वाले हिलाजात्रा महोत्सव में हर वर्ष हिरण और महाकाली का मंचन करने गांव के युवाओं को बुलाया जाता है।


पिथौरागढ़ की हिलजात्रा को यूनेस्को की धरोहर में शामिल करने की कवायद शुरू

र्वतीय प्रदेश में हिलजात्रा पर्व सिर्फ सीमांत जनपद पिथौरागढ़ में मनाया जाता है जो अपने आप में विशिष्ट है। यही कारण है कि इस पर्व को यूनोस्को की धरोहर में शामिल करने की कवायद शुरू हुई है। संस्कृति विभाग इसे यूनेस्को की धरोहर में शामिल करने के लिए पर्व की डाक्यूमेंट्री तैयार कर इसका प्रस्ताव भेजेगा। कुमौड़, सतगढ़, खतीगांव, देवलथल सहित अन्य हिस्सों में पहुंचकर संस्कृति विभाग की टीम डाक्यूमेंट्री तैयार करेगी।

पिथौरागढ़ की हिलजात्रा की डाक्यूमेंट्री तैयार होगी। इसे यूनेस्को की धरोहर में शामिल करने की योजना है। निश्चित तौर पर पिथौरागढ़ की हिलजात्रा विशिष्ट है।
 - डॉ. चंद्र सिंह चौहान, प्रभारी निदेशक, राजकीय संग्रहालय, अल्मोड़ा।

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